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युवाओं ने एक बार फिर Gen Z शब्द को चर्चा का विषय बना दिया है. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने आज यानी 10 अक्तूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की कॉल दी थी. हालांकि, प्रशासन ने पहले ही सख्ती बरतते हुए, फिलहाल आवाज को शांत कर दिया है. CJP संस्थापक अभिजीत दीपके उनके अन्य साथियों को दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट से ही पुलिस ने हिरासत में ले लिया. इसके अलावा यूट्यूबर ध्रुव राठी को गुरुग्राम से डिटेन किया गया. यह प्रदर्शन चुनाव आयोग में चल रही कथित गड़बड़ियों के चलते हो रहा है. कॉकरोच जनता पार्टी का यह प्रदर्शन भले ही सीधे तौर पर सियासी ना हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायनों को बिल्कुल भी हल्के में नहीं आंका जा सकता. क्योंकि ये प्रदर्शन अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब समेत 7 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हो रहे हैं. ऐसे में इनकी अहमियत और ज्यादा बढ़ रही है.
युवा वोटरों पर नजर डालें, तो 2026 की अनुमानित जनसंख्या के मुताबिक, बिहार में GEN-Z वोटर्स की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है, जहां 18-29 साल की उम्र के लोगों की आबादी 36.8 प्रतिशत है. इसके बाद उत्तर प्रदेश (33.9 प्रतिशत), झारखंड (33.8 प्रतिशत), राजस्थान (32.3 प्रतिशत) और मध्य प्रदेश (31.4 प्रतिशत) का स्थान आता है.
फिलहाल हम उन राज्यों की बात करते हैं, जिनमें अगले साल चुनाव होने हैं. इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं. सिर्फ इन राज्यों पर फोकस करें तो इन सभी राज्यों में 18 से 29 साल के वोटर्स की तादाद तकरीबन 22 फीसदी के आसपास है. इनकी अहमियत इसलिए और बढ़ जाती है, क्योंकि पिछले चुनावों के नतीजों के मुताबिक, इन सातों राज्यों की 940 में से 257 विधानसभा सीटें ऐसी रही हैं, जिनपर हार/जीत अंतर महज 5 फीसद या उससे भी कम बताया गया है.

युवाओं की इसी ताकत को देखते हुए राजनीतिक पार्टियां लगातार, इन्हें अपनी तरफ खींचने की कोशिशों में लगी हुई हैं. भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और RSS सभी युवाओं पर फोकस रखते हुए अपनी अलग-अलग रणनीतियां बना रहे हैं. भाजपा ने युवाओं को साधने के लिए अपनी एक अलग टीम बनाई है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के नेतृत्व में बनी इस टीम में स्मृति ईरानी, विनोद तावड़े जैसे नेता शामिल हैं. भाजपा की यह टीम युवाओं को रोजगार, शिक्षा और उनकी बाकी चिंताओं को समझेगी. साथ ही उनके साथ संवाद करके उनकी चिंताओं को दूर करने का काम करेगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बीच-बीच में युवाओं के साथ संवाद कर रहे हैं.

इसके अलावा कांग्रेस की तरफ से खास तौर पर राहुल गांधी युवाओं से जुड़े मुद्दों को उठा रहे हैं. राहुल खुद 'छात्रों की गूंज' जैसे कार्यक्रम अलग-अलग शहरों में कर रहे है. अभी तक वो इंदौर और पुणे में कार्यक्रम कर चुके हैं. जबकि, आज यानी 10 अक्तूबर को चेन्नई में उन्होंने यह प्रोग्राम किया. इस प्रोग्राम में वो सीधे युवाओं के संवाद करते हैं. इसके अलावा राहुल गांधी ने पिछले दिनों नीट पेपर लीक और रोजगार जैसे मुद्दों पर भी सरकार को घेरा है.
इस संबंध में जब हमने जब वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेंद्र शर्मा से बातचीत की तो, उन्होंने बताया,'आज का युवा बेसिक मुद्दों को लेकर बहुत जागरुक हो चुका है. वो अब शिक्षा, बेरोजगारी और सिस्टम में मौजूद भ्रष्टाचार को लेकर अपनी आवाज उठाने लगा है, साथ ही उसे ठीक करने की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर लेकर चल रहा है.' उन्होंने आगे कहा,'आज का यूथ सिर्फ नौकरी-शिक्षा की ही बात नहीं कर रहा, वह ऐसा सिस्टम चाहता है, जिसमें पारदर्शी तरीके से अवसर मिलें.'
जब हमने पुष्पेंद्र शर्मा से पूछा कि क्या आज का युवा स्वतंत्र तौर पर वोट करेगा या फिर अपने परिवार की परंपरा के अनुसार वोट करेगा? सवाल के जवाब में कहा कि आज का युवा मुद्दों के आधार पर वोट करेगा, नाकि परिवार के चली आ रही परंपरा के मुताबिक. उन्होंने यह भी बताया कि ये युवा किसी राजनीतिक पार्टी, किसी खास नेता या फिर विचारधारा से प्रभावित नहीं लगता, बल्कि यह एक खराब सिस्टम के खिलाफ है. ये युवा अपने लिए सिर्फ पारदर्शिता की मांग कर रहा है.

संयुक्त राष्ट्र के विश्व जनसंख्या पूर्वानुमान 2024 के मुताबिक, भारत में दुनिया की सबसे बड़ी जनरेशन Z आबादी है, जिसमें 2026 में 14-29 वर्ष की उम्र के लगभग 40.7 करोड़ लोग होंगे, जो चीन (26.4 करोड़), पाकिस्तान (7.9 करोड़) और नाइजीरिया (7.6 करोड़) से आगे है. हालांकि, यह उम्मीद के मुताबिक ही है.
भारत में भले ही GEN-Z सबसे बड़ी वयस्क पीढ़ी बन गई है, लेकिन वोटरों में युवा मतदाताओं का कुल हिस्सा लगातार घट रहा है, क्योंकि भारत की आबादी धीरे-धीरे बूढ़ी हो रही है. 1988 में भारत की मतदान योग्य आबादी में 18 से 29 वर्ष की आयु के लोगों की हिस्सेदारी 38.3 प्रतिशत थी. 2024 तक यह हिस्सेदारी घटकर 30.1 प्रतिशत हो गई थी, और संयुक्त राष्ट्र के औसत अनुमानों के मुताबिक, 2029 तक यह और घटकर 27.8 प्रतिशत हो जाएगी.

चुनावों के लिए GEN Z सिर्फ भारत में चर्चा का विषय नहीं बने हुए, बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी यह आयु वर्ग राजनीतिक पार्टियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है. अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां भी अपनी रणनीतियों में बदलाव कर रही हैं. पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.