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How 'Gateway to Hell' Formed? क्या आप यकीन कर सकते हैं कि दुनिया के किसी कोने में नर्क का दरवाजा है. सोच विचार करने वाला इंसान पहले तो इस पर यकीन नहीं करेगा और ऐसे सवालों को बेबुनियाद बताएगा. फिर भी अगर यकीन करेगा भी तो सबूत मांगेगा.
लेकिन आज हम आपको बता दें कि यह दावा हवा हवाई बातें नहीं हैं. नर्क का द्वार किसे कहते हैं, ये आज हम आपको बताते हैं, जिसके बाद आप भी इस पर यकीन कर पाएंगे.
दरअसल, नर्क का द्वार कहा जाने वाला यह आग का ऐसा गोला है, जो न कभी शांत होता है और भविष्य में ना ही उसके ठंडे पड़ने की उम्मीद है. मौसम का कोई भी मिजाज हो, उस पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है. ये कुदरत का एक अजूबा है, जो बेहद ही खौफनाक और रोमांचकारी है.
मध्य एशिया के देश तुर्कमेनिस्तान की राजधानी अश्गाबात से लगभग 260 किलोमीटर उत्तर में काराकुम रेगिस्तान है. इसी जगह पर मौजूद है दुनिया का सबसे बड़ा चमत्कार. जिसकी कुदरती कहानी बेहद दिलचस्प है. यह दुनिया की सबसे अजीब और रहस्यमयी जगहों में से एक है. इसे पृथ्वी पर 'गेट्स ऑफ हेल' यानी 'नरक का द्वार' भी कहा जाता है.
विश्व में ये एक ऐसी जगह है, जिसे देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं. खुद को तुर्रम खां समझने वाला भी यहां आने से कतराता है. रेगिस्तान के सन्नाटे के बीच जब आप इस गड्ढे के करीब पहुंचते हैं, तो दूर से ही आग की गर्जना और मीथेन गैस की गंध महसूस होने लगती है.
रेत के थपेड़ों के बीच ये एक विशालकाय गड्ढा पिछले 55 सालों से लगातार आग उगल रहा है. इसकी खौफनाक लपटें पिछले 5 दशक से लगातार धधक रही है. रात के अंधेरे में जब मीलों दूर तक सिर्फ इस गड्ढे की नारंगी चमक दिखाई देती है, तब ऐसा लगता है मानो धरती फाड़कर पाताल का रास्ता खुल गया हो. इस कारण स्थानीय लोगों ने इसका नाम नरक का द्वार रख दिया है.
सवाल ये है कि इस विशालकाय गड्ढा में ऐसा क्या है, जो आग को बुझने नहीं देता. आखिरकार पिछले 55 साल से लगातार जलती आग के पीछे का रहस्य क्या है? क्या दुनिया के वैज्ञानिकों ने इस आग को बुझाने की कभी कोशिश नहीं की. आखिर 55 साल पहले ऐसा क्या हुआ था, जिसने इस जगह को एक रहस्यमयी आकर्षण बना दिया.
इस दहकते हुए अजूबे की कहानी किसी कुदरती करिश्मे से नहीं, बल्कि इंसानी भूल से शुरू होती है. इंसान की एक गलती के चलते आज तुर्किमिस्तान का ये इलाका बारूद के ढेर पर है. वो 1971 का साल था, जब सोवियत संघ के वैज्ञानिक यहां प्राकृतिक गैस की तलाश में खुदाई कर रहे थे.
उन्हें लगा था कि प्राकृतिक गैस का भंडार होगा. लेकिन ड्रिलिंग के दौरान अचानक वहां की जमीन धंस गई और एक करीब 70 मीटर चौड़ा गहरा गड्ढा बन गया. इस हादसे में किसी की जान तो नहीं गई. लेकिन गड्ढे से जहरीली मीथेन गैस का रिसाव होने लगा. इस घटना के बाद वैज्ञानिक पूरी तरह डर गए . उन्हें गैस रिसाव और लोगों की जान का खतरा सताने लगा.
वैज्ञानिकों को डर था कि यह गैस आसपास के इलाकों में फैलकर लोगों और मवेशियों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है. मिथेन गैस के ख़तरे को टालने के लिए भूवैज्ञानिकों ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने इतिहास बदल दिया. यकीनन ये मानव इतिहास की बड़ी भूल थी. उस वक्त वैज्ञानिकों ने सोचा कि अगर इस गड्ढे में आग लगा दी जाए, तो गैस कुछ ही दिनों में जलकर खत्म हो जाएगी और खतरा टल जाएगा. इस सोच के चलते 1971 में वैज्ञानिकों ने गड्डे में आग तो लगा दी, लेकिन उनका अंदाजा पूरी तरह गलत निकला.
वो आग जो कुछ दिनों में बुझ जानी चाहिए थी, वो 55 साल बाद आज भी बदस्तूर जल रही है. आग की लपटें दिन रात यूं ही जलती रहती हैं और अंगारे छोड़ती रहती हैं. यही वजह है कि ये जगह दुनिया भर के लोगों के लिए रोमांच और अचरज का बड़ा केंद्र बन चुकी है.
आग के इस गोले का व्यास 200 से 230 फीट तक है और गहराई करीब 30 मीटर तक है. यानी जमीन के 30 मीटर नीचे तक ये आग फैली हुई है. इस आग के चलते यहां के पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचा है. मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जो जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है. पिछले 55 सालों में यहां अरबों टन मीथेन जला चुका है, जो वैश्विक तापमान बढ़ाने में योगदान दे रहा है.
तुर्कमेनिस्तान, जो दुनिया के चौथे सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार वाला देश है. उस देश के लिए ये आग सबसे बड़ा सिरदर्द है. हालांकि, अब पर्यावरणीय दबाव के कारण इसे बंद करने पर विचार किया जा रहा है. तुर्कमेनिस्तान सरकार ने गंभीरता से इस गड्डे को भरने की तैयारी कर ली है.
वर्ष 2022 में तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रपति के आदेश पर आग बुझाने के लिए एक परियोजना शुरू की गई. इस परियोजना के तहत आग को बढ़ाने वाली गैस को बाहर निकालने के लिए कई नए गैस कुएं खोदे गए. प्राकृतिक ज्वलनशील गैस के कम प्रवाह के चलते गोले में लपटें कम होने लगीं.
साल 2025 में एक कंपनी ने बकायदा घोषणा भी की थी कि आग की तीव्रता तीन गुना कम हो चुकी है. आसपास कई नई वेल्स ड्रिल करके मीथेन गैस को कैप्चर किया जा रहा है ताकि क्रेटर में गैस न पहुंचे. दावा ऐसा भी किया जा रहा है कि साल 2025 के अंत तक आग बहुत कमजोर हो गई थी और अब सिर्फ कुछ छोटी-छोटी लपटें बाकी हैं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि आग अब धीरे-धीरे खुद बुझ रही है या पूरी तरह बुझाने की तकनीकी वाली योजना पर भी काम चल रहा है. तुर्कमेनिस्तान में पहले भी आग के इस गोले को बंद करने की कोशिशें बहुत हुई हैं. वहां के राष्ट्रपति ने भी कहा था हम बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों को खो रहे हैं जिनसे हमें महत्वपूर्ण लाभ मिल सकता था और हम उनका उपयोग अपने लोगों की भलाई के लिए कर सकते थे.
कई कोशिशों के बावजूद, नर्क का दरवाजा अभी भी हमारे वायुमंडल में मीथेन गैस की बहुत बड़ी मात्रा छोड़ रहा है. आग की लपटें कम होने का दावा जरूर किया जा रहा है. लेकिन 100 फीसद कामयाबी नहीं मिल पाई है. इससे साफ है कि हालात कंट्रोल करने के लिए अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है.
(ब्यूरो रिपोर्ट, जी मीडिया)