आखिरी खाना, तड़के फांसी, 30 मिनट तक फंदे पर लटकता शव… मौत की सजा से पहले जेल में क्या-क्या होता है?
यूपी में मेरठ के चर्चित सौरभ हत्याकांड में लोअर कोर्ट ने आरोपी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को फांसी की सजा दे दी है. सरकारी वकील ने हत्या के क्रूरतम तरीके को देखते हुए आरोपी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल के लिए मौत की सजा की मांग की थी.
मेरठ के सौरभ राजपूत मर्डर केस में आरोपी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को फांसी की सजा का एलान किया गया है. इस फैसले को अब पुष्टि के लिए हाई कोर्ट भेजा जाएगा. इसके बाद भी उन्हें यह सजा मिलेगी या नहीं, यह तो आगे की प्रक्रिया तय करेगी. लेकिन आज हम आपको बताते हैं कि भारत में किसी अभियुक्त को फांसी देने के लिए जेल मैनुअल के नियम क्या हैं. जब सभी जगहों से दया याचिका खारिज होने के बाद अपराधी को फांसी के फंदे से लटकाने का दिन आ जाता है तो जेल में किन-किन बातों का ध्यान रखना पड़ता है.
क्या हत्या के हर मामलों में मिलती है फांसी की सजा?
इस मुद्दे पर बात शुरू करने से पहले आपको स्पष्ट कर देते हैं कि भारत में फांसी हत्या के हर मुकदमे में नहीं दी जाती है. इसके बजाय हत्या के दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में तामील किया जाता है. यानी कि कोई ऐसा जघन्य अपराध, जिसकी समाज में पहले से कोई मिसाल न हो और उसे करने वाले आरोपी के सुधरने की कोई गुंजाइश न बची हो. चूंकि यह सजा किसी के प्राण हरण से जुड़ी है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने रेयरेस्ट ऑफ रेयर का सिद्धांत बनाया था, जिसका बेहद कड़ाई से सभी जगह पालन किया जाता है.
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भारत में किसी आरोपी को फांसी देने की प्रक्रिया क्या है?
भारत में लोअर कोर्ट की ओर से किसी आरोपी को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद उसे पुष्टि के लिए हाई कोर्ट भेजा जाता है. वहां पर अभियोजन पक्ष को इस बात को साबित करना पड़ता है कि आरोपी को दी गई सजा एकदम उचित है और इसमें नरमी बरते जाने पर समाज को नुकसान भुगतना पड़ सकता है.
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हाई कोर्ट अगर तर्कों से सहमत हो जाती है तो फांसी की सजा की पुष्टि कर देती है. सहमत न होने पर वह उसकी सजा घटाने या रद्द करने का फैसला भी दे सकती है. हाई कोर्ट की ओर फांसी की पुष्टि होने के बाद बचाव पक्ष के पास उसे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करने का अधिकार होता है.
सुप्रीम कोर्ट फांसी कंफर्म कर दे तो आरोपी के पास क्या बचते हैं रास्ते?
अगर सुप्रीम कोर्ट उसकी याचिका खारिज कर देते तो वह फिर से उसके पास पुनर्विचार याचिका और क्यूरेटिव याचिका दाखिल कर सकता है. ये दोनों याचिकाएं भी खारिज हो जाए तो वह संविधान के अनुच्छेद 161 का लाभ लेकर राज्यपाल के पास दया याचिका दायर कर सकता है. राज्यपाल अगर याचिका ठुकरा दें तो अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को दया याचिका भेज सकता है.
राज्यपाल और राष्ट्रपति को अधिकार होता है कि वे उस याचिका को स्वीकार कर सजा माफ या कम कर दें या असीमित समय तक उस याचिका पर कोई फैसला ही न लें. अगर दोनों जगहों से उसकी दया याचिका खारिज हो जाए तो इसकी सूचना आरोपी को सजा सुनाने वाली ट्रायल कोर्ट को भेजी जाती है.
डेथ वारंट और फांसी में 14 दिनों का गैप क्यों रखा जाता है?
इसके बाद उक्त अदालत की ओर आरोपी को फांसी देने के लिए डेथ वारंट जारी किया जाता है. इस वारंट में फांसी की तारीख, समय और स्थान तय किया जाता है. वारंट को तामीली के लिए संबंधित जेल के जेलर को भेजा जाता है. इस वारंट में फांसी देने के लिए कम से कम 14 दिनों का गैप रखा जाता है.
इस गैप को रखने की वजह ये होती है कि फांसी की सूली पर चढ़ने वाले आरोपी को मानसिक रूप से तैयार होने, अपनी आखिरी वसीयत तैयार करने और परिवार वालों से मिलने का आखिरी मौका मिल सके. फांसी की तारीख तय होते ही उसे बाकी कैदियों से अलग कर हाई सिक्योरिटी बैरक में डाल दिया जाता है. साथ ही उसके डेली रूटीन और सेहत पर बारीकी से निगाह रखी जाती है. इस दौरान जेल प्रशासन इस बात का ध्यान रखता है कि कैदी खुद को कोई नुकसान न पहुंचाए या आत्महत्या न कर ले.
भारत में तड़के ही क्यों दी जाती है फांसी की सजा?
भारत में किसी भी अपराधी को फांसी आमतौर पर सुबह तड़के दी जाती है. इसकी वजह ये है कि जब तक बाकी कैदी जागें और जेल की दैनिक गतिविधियां शुरू हों, तब तक उस आरोपी को मौत की सजा दे दी जाए. जिससे बाकी कैदियों पर उस सजा का प्रभाव न पड़े.
कैदी को फांसी देने वाला स्थान जेल के एक अलग हिस्से में बनाया जाता है. वहां पर बाकी कैदियों को नहीं रखा जाता है. अपराधी को फांसी देने के लिए मनीला रस्सी का इस्तेमाल किया जाता है. यह मजबूत रस्सी होती है और आसानी से नहीं टूटती. सजा से एक हफ्ता पहले रस्सी की मजबूती की जांच की जाती है.
फांसी वाले दिन कैदी को सुबह जल्दी उठाकर नित्य क्रिया और स्नान के लिए कहा जाता है. इसके बाद उसे खाने के लिए पूछा जाता है. फिर उसकी सेहत की जांच होती है. अगर वह बीमार हो या मानसिक रूप से अस्वस्थ पाया जाए तो फांसी की सजा टाली जा सकती है.
इसके पीछे वजह ये है कि फांसी की सजा का मकसद आरोपी को उसके किए अपराध का बोध कराना होता है. अगर कोई आरोपी अपनी मानसिक स्थिति खो चुका हो तो वह इस बात को समझ ही नहीं सकेगा कि उसे किस बात की सजा मिल रही है.
क्या बीमार-मानसिक विक्षिप्त को दी जा सकती है फांसी?
जेल मैनुअल के अनुसार, अगर जेल के मेडिकल अफसर को इस बात को संदेह हो जाए कि फांसी की सजा पाया कैदी मानसिक रूप से असंतुलित हो गया है, तो मेडिकल बोर्ड का गठन कर उसकी जांच की जाती है. इसके बाद उसकी रिपोर्ट को जेल अधीक्षक के जरिए सरकार और कोर्ट को भेजा जाता है. इस रिपोर्ट के आधार पर कैदी के ठीक न होने तक सजा टाली जा सकती है और उसे जेल या मानसिक सुधार गृह में भेजा जा सकता है.
अगर कैदी फिट मिलता है तो कैदी को सुबह हाथ बांधकर फांसी कक्ष में लाया जाता है. वहां पर जेल का मेडिकल अफसर, जल्लाद, जेल सुपरिंटेंडेंट, जेल गार्ड मौजूद रहते हैं. कैदी के गले में काला कपड़ा पहनाकर फांसी का लीवर खींच दिया जाता है. इससे नीचे का तख्ता हट जाता है और कैदी के गले में रस्सी का फंदा खिंच जाता है. जिससे गर्दन की हड्डी टूटने से उसकी मौत हो जाती है. उसके शव को करीब 30 मिनट तक फंदे पर लटकाकर रखा जाता है.
परिवार वाले शव लेने से इनकार करें तो क्या होता है?
इसके बाद कैदी के शव को फंदे से उतारकर उसकी शारीरिक जांच की जाती है. जब उसके दिल की धड़कन पूरी तरह बंद हो जाती है तो उसे मृत घोषित कर दिया जाता है. फिर उसका पोस्टमार्टम कर शव को परिवार वालों को सौंप दिया जाता है. अगर परिवार वाले शव लेने से इनकार करें तो जेल में ही उसका क्रिया-क्रम कर दिया जाता है.