App

समंदर की लहरें निगलेंगी जमीन: क्या फिर भी कायम रहेगी देश की पहचान? समझिए पूरी ABCD

अगर समुद्र के कहर की वजह से कोई देश पानी में डूब जाए तो क्या उस देश का अस्तित्व रहेगा या नहीं. यह एक बड़ा सवाल है क्योंकि कई ऐसे देश हैं, जिन पर जलमग्न होने का खतरा मंडरा रहा है. अब यूएन ने इस पर घोषणा पत्र अपनाया है. चलिए आपको समझाते हैं.

समंदर की लहरें निगलेंगी जमीन: क्या फिर भी कायम रहेगी देश की पहचान? समझिए पूरी ABCD
Image Credit: कई देश साफ-साफ कह चुके हैं कि उनकी जमीन को समंदर निगलता जा रहा है.

समुद्र के बढ़ते स्तर की वजह से कई देशों के लिए अस्तित्व का खतरा पैदा हो चुका है. इसे देखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने समुद्र के लेवल में बढ़ोतरी पर पिछले हफ्ते अपना पहला घोषणा पत्र अपनाया, जिसमें समुद्र के बढ़ते स्तर को अस्तित्व के लिए खतरा माना गया है.

इस घोषणा पत्र में उन निचले इलाकों वाले देशों की जमीन खोने की समस्या पर बात हुई, जिन्हें समुद्र के बढ़ते स्तर और लगातार तटीय कटाव से सबसे ज्यादा खतरा है.

समुद्र का स्तर क्यों बढ़ रहा है?

समुद्र के स्तर में इजाफे का मतलब है धरती के केंद्र से मापी गई समुद्र की सतह की औसत ऊंचाई में बढ़ोतरी. अभी समुद्र का स्तर बढ़ने की दो मुख्य वजह हैं.

पहला, ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों (50,000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा जमीन को ढकने वाले ग्लेशियर) का पिघलना.

दूसरा, समुद्री पानी का थर्मल एक्सपेंशन. यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें पानी गर्म होने पर फैलता है. ग्लोबल तापमान बढ़ने के साथ, समुद्र गर्म हो रहे हैं और नतीजतन, पानी की मात्रा भी बढ़ रही है. नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) के मुताबिक, समुद्री पानी का थर्मल एक्सपेंशन दुनिया भर में समुद्र के स्तर में होने वाली बढ़ोतरी के एक-तिहाई से आधे हिस्से के लिए जिम्मेदार है.

निचले इलाकों वाले द्वीप सबसे ज्यादा खतरे में हैं क्योंकि उनकी ज्यादातर जमीन समुद्र तल से बस कुछ ही मीटर ऊपर है. इसलिए, समुद्र का बढ़ता स्तर तटीय कटाव, बाढ़ और मीठे पानी के स्रोतों में खारे पानी के घुसने का कारण बन सकता है. साथ ही घरों, बुनियादी ढांचे और रहने लायक जमीन के लिए खतरा पैदा कर सकता है.

समुद्र का स्तर कितनी तेजी से बढ़ रहा है?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की 'स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट 2025' रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में दुनिया भर में समुद्र का औसत स्तर 2024 के रिकॉर्ड के बराबर था.
दुनिया भर में समुद्र का औसत स्तर, समुद्र की सतह की औसत ऊंचाई है. इसे रडार अल्टीमीटर का इस्तेमाल करने वाले सैटेलाइट से मापा जाता है, जो समुद्र की सतह की ऊंचाई मापते हैं.

19वीं सदी के आखिर से दुनिया भर के तटों पर टाइड गेज (ज्वार-भाटा मापने वाले डिवाइस) का इस्तेमाल भी समुद्र के औसत स्तर को मापने के लिए किया जाता रहा है. आज ये दोनों तरीके एक-दूसरे के पूरक के तौर पर काम करते हैं.

सैटेलाइट लगभग पूरी दुनिया की जानकारी देते हैं, जबकि टाइड गेज जमीनी सच्चाई का डेटा देते हैं, जिसका इस्तेमाल सैटेलाइट बेस्ड भविष्यवाणियों को कैलिब्रेट और सर्टिफाइड करने के लिए किया जाता है.

'स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट 2025' रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में समुद्र का एवरेज ग्लोबल लेवल, सैटेलाइट अल्टीमेट्री रिकॉर्ड में 2024 में देखे गए रिकॉर्ड हाई लेवल के बराबर था. 2012 के बाद से समुद्र के औसत ग्लोबल लेवल में बढ़ोतरी की दर, सैटेलाइट रिकॉर्ड के शुरुआती दौर (1993–2011) की तुलना में ज्यादा है.

क्या कोई मुल्क जमीन खोए बिना देश होने का दर्जा खो सकता है?

समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण कुछ द्वीपीय देशों के लिए कानूनी चुनौतियां भी पैदा हो गई हैं क्योंकि जमीन और रहने लायक जगह खोने से उनके देश बने रहने के दर्जे पर सवाल उठते हैं. 1933 के मोंटेवीडियो कन्वेंशन के तहत, किसी देश को चार मुख्य पैमानों के आधार पर डिफाइन किया जाता है. ये हैं- स्थायी आबादी, एक तय इलाका, एक सरकार और दूसरे देशों के साथ संबंध बनाने की काबिलियत.

2015 में, कम ऊंचाई वाले देश किरिबाती ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के असर से एक देश के तौर पर उसका अस्तित्व खतरे में है. इसी तरह, 2021 में तुवालु के प्रतिनिधि साइमन कोफे ने COP26 में कहा था कि वे समुद्र के पानी में घुटनों तक खड़े हैं. उन्होंने दावा किया कि यह जगह कभी सूखी ज़मीन थी जो समुद्र के किनारे के कटाव के कारण डूब गई.

इलाके के रहने लायक न रहने की संभावना स्थायी आबादी की शर्त पर भी सवाल उठाती है. हालांकि, इंटरनेशनल लॉ कमीशन की 2025 की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश का दर्जा तय करने के पारंपरिक नियम जलवायु के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ने की स्थिति में देश का दर्जा बने रहने के सवाल का समाधान नहीं करते हैं.

...तो समुद्री सीमाओं का क्या होगा?

समुद्र का लेवल बढ़ने पर जारी घोषणापत्र खास तौर पर इस मुद्दे पर बात करता है. उसमें कहा गया है कि इलाका खोने का मतलब अपने आप देश का दर्जा खोना नहीं है. यानी अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक, समुद्र का जलस्तर बढ़ने के बावजूद देश का दर्जा बना रहेगा. साथ ही ऐसे देशों की संप्रभुता, संप्रभु अधिकार और जिम्मेदारियां, और UN की सदस्यता भी वैसी की वैसी रहेंगी.

इस घोषणापत्र में उन देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन की मांग की गई है, जिनकी जमीन समुद्र का जलस्तर बढ़ने से प्रभावित हुई है. इसमें यह भी कहा गया है कि देश, समुद्र के जलस्तर बढ़ने से होने वाले भौतिक बदलावों के बावजूद, यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी (UNCLOS) के मुताबिक अपने समुद्री क्षेत्रों को बनाए रख सकते हैं. इंटरनेशनल लॉ कमीशन ने भी इसी तरह यह नतीजा निकाला कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण देशों पर अपनी बेसलाइन या समुद्री क्षेत्रों की बाहरी सीमाओं को अपडेट करने की कोई रुकावट नहीं है.

Add Zee News as a Preferred Source

About the Author

Rachit Kumar

Rachit Kumar

रचित कुमार जी न्यूज डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं. देश, दुनिया और डिफेंस की खबरों को आसान भाषा में बताने में महारत हासिल है. जी न्यूज से मई 2022 में जुड़े और शिफ्ट देखने का 12 साल से ज्यादा का अनुभव है. जी न्यूज में Best Performer अवॉर्ड भी मिल चुका है. जी न्यूज, आजतक और एबीपी न्यूज में शिफ्ट देखते हुए महामहिम, बिहार के बाहुबली सीरीज शुरू की और कई एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया.  इंडिया न्यूज और जनसत्ता में शिफ्ट देखने के साथ-साथ ट्रैफिक लाने वाली खबरों को तवज्जो दी. नवभारत टाइम्स से करियर की शुरुआत हुई और वहां तकरीबन ढाई साल तक फ्रंट पेज 2 और देश-विदेश के पन्नों की जिम्मेदारी संभाली. जर्नलिज्म में पोस्टग्रेजुएट और IIMC से डिप्लोमा करने  वाले रचित कुमार 13 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. आप Rachit.kumar@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं. 
Read More