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कांशीराम, मायावती और अब अगली पीढ़ी: क्या BSP की राजनीति में बदल गया सत्ता हस्तांतरण का फॉर्मूला?

BSP Leadership: क्या बसपा में सत्ता हस्तांतरण का तरीका बदल गया है? जानिए कांशीराम द्वारा मायावती को सौंपे गए बहुजन आंदोलन के विजन से लेकर आकाश और ईशान आनंद तक, अगली पीढ़ी के पावर शिफ्ट की पूरी कहानी.

Written By Ravindra Pratap Singh
Published: Sep 22, 2026, 10:34 PM IST | Updated: Sep 24, 2026, 02:45 PM IST
Image Credit: मायावती के बाद कौन संभालेगा हाथी की लगाम? कांशीराम के दौर से लेकर अब तक की इनसाइड स्टोरी की टाइमलाइन
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बहुजन समाज पार्टी की राजनीति में कांशीराम से मायावती तक का सफर भारतीय राजनीति के बड़े नेतृत्व बदलावों में गिना जाता है. एक समय आईएएस बनने की तैयारी कर रहीं मायावती कांशीराम के संपर्क में आईं और धीरे-धीरे उनके आंदोलन का अहम चेहरा बन गईं. आगे चलकर उन्होंने बसपा की कमान संभाली और उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री बनीं. उत्तर प्रदेश विधानसभा के रिकॉर्ड के मुताबिक मायावती ने 1995, 1997, 2002-03 और 2007-12 के दौरान मुख्यमंत्री पद संभाला.

अब करीब तीन दशक बाद बसपा में नेतृत्व और उत्तराधिकार का सवाल फिर चर्चा में है. मायावती ने अपने परिवार के सदस्यों की पार्टी में भूमिका को लेकर हाल में कई फैसले किए हैं. इसी कड़ी में उनके छोटे भतीजे ईशान आनंद का नाम सामने आया है.

आईएएस की तैयारी छोड़ आंदोलन से जुड़ीं

मायावती के राजनीतिक जीवन की शुरुआत उस दौर में हुई जब वह दिल्ली में रहकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रही थीं. इसी दौरान उनका संपर्क कांशीराम से हुआ. कांशीराम उस समय बहुजन समाज को राजनीतिक रूप से संगठित करने के लिए काम कर रहे थे. मायावती की बोलने की शैली और सार्वजनिक मंच पर अपनी बात रखने की क्षमता ने कांशीराम का ध्यान खींचा. इसके बाद मायावती धीरे-धीरे उनके आंदोलन से जुड़ती चली गईं. सिविल सेवा में जाने की योजना पीछे छूटी और राजनीति उनका रास्ता बन गई.

डीएस-4 से बसपा तक का सफर

कांशीराम ने बहुजन समाज को संगठित करने के लिए कई मंच और संगठन खड़े किए. इनमें डीएस-4 भी शामिल था. इसके बाद 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना हुई. मायावती इस दौर में कांशीराम के साथ लगातार सक्रिय रहीं. संगठन के विस्तार और चुनावी राजनीति में उनकी भूमिका बढ़ती गई. 1989 में उन्होंने बिजनौर लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया. उत्तर प्रदेश विधानसभा की आधिकारिक प्रोफाइल भी 1989 को उनके पहली बार लोकसभा पहुंचने का वर्ष बताती है.

पहली बार मुख्यमंत्री बनने तक

1990 के दशक में मायावती का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा. 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद बसपा और समाजवादी पार्टी ने मिलकर सरकार बनाई. यह सरकार ज्यादा समय नहीं चली. इसके बाद 1995 में मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. उनका पहला कार्यकाल कुछ महीनों का रहा. इसके बाद उन्होंने 1997 में फिर मुख्यमंत्री पद संभाला. 2002 में वह तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं और 2007 में बसपा को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद उन्होंने चौथी बार राज्य की कमान संभाली.

कांशीराम ने मायावती को उत्तराधिकारी बनाया

समय के साथ कांशीराम की सेहत कमजोर होती गई और पार्टी में मायावती की भूमिका बढ़ती गई. 15 दिसंबर 2001 को लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान कांशीराम ने मायावती को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था. सितंबर 2003 में मायावती को बसपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया. इसके बाद बसपा का नेतृत्व पूरी तरह मायावती के हाथों में आ गया. कांशीराम के निधन के बाद भी पार्टी की कमान उनके पास ही रही.

अब सवाल मायावती के उत्तराधिकारी का

मायावती लंबे समय से राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ अपनी बात रखती रही हैं. इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में उनके परिवार के सदस्यों की पार्टी में भूमिका को लेकर चर्चा होती रही है. दिसंबर 2023 में मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान दोनों के बीच राजनीतिक मतभेद सामने आए और मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी की अहम जिम्मेदारियों से हटा दिया. बाद में उन्हें फिर संगठन में जिम्मेदारी दी गई. यही घटनाक्रम बसपा में उत्तराधिकार को लेकर लगातार सवाल खड़े करता रहा.

ईशान आनंद के आने से बदली तस्वीर

सितंबर 2026 में मायावती ने परिवार से जुड़े पार्टी नेतृत्व को लेकर एक और बड़ा फैसला लिया. उन्होंने कहा कि आकाश आनंद और उनकी बहन दीपिका आनंद को अब पार्टी में कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी. इसके साथ ही छोटे भतीजे ईशान आनंद को संगठन में आगे लाने की बात कही गई है. इस फैसले से बसपा में उत्तराधिकार की चर्चा फिर तेज हो गई है. मायावती ने अपने फैसले को कांशीराम और डॉ. आंबेडकर की विचारधारा से जोड़ते हुए कहा है कि बहुजन समाज ही उनका असली परिवार है. उनका कहना है कि पार्टी में किसी को सिर्फ पारिवारिक रिश्ते के आधार पर जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी.

23 सितंबर की बैठक पर नजर

ईशान आनंद को लेकर यह फैसला ऐसे समय आया है जब 23 सितंबर को बसपा की अहम बैठक होने वाली है. ऐसे में बैठक में संगठन और भविष्य की रणनीति को लेकर होने वाली चर्चा पर नजर रहेगी. कांशीराम ने जिस आंदोलन को खड़ा किया था, उसकी कमान उन्होंने अपने जीवनकाल में मायावती को सौंप दी थी. अब मायावती के दौर में पार्टी के अगले नेतृत्व को लेकर तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है. ईशान आनंद को आगे बढ़ाने का फैसला इसी सवाल के बीच लिया गया है. आने वाले समय में उनकी संगठनात्मक भूमिका ही बताएगी कि यह बदलाव बसपा की राजनीति में कितना बड़ा रूप लेता है.

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About the Author

रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
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