)
राहुल गांधी और विपक्षी सांसद चुनाव आयोग के खिलाफ सड़कों पर हैं. 6 अक्टूबर को शुरू हुआ यह आंदोलन उसी दिन देर रात थम गया था, लेकिन अगले दिन एक बार फिर सभी नेता नई ऊर्जा के साथ सड़कों पर आए. इस दौरान काफी कुछ नया देखने को मिला. भाजपा की भूमिका भी बदलती नजर आ रही है और ये बदलाव कोई नया नहीं है, भारतीय राजनीति में यह सब बहुत आम है. चुनावों से पहले बहुत कुछ बदलता है, नेताओं के भाषण बदलते हैं, मुद्दे बदलते हैं और अब तस्वीर भी बदलती दिखाई दे रही है. राहुल पिछले कुछ महीनों से राजनीति के प्रमुख किरदार के तौर पर उभरे हैं कि अब उन्हें पहले की तरह 'पप्पू', 'शहजादा', 'युवराज' जैसे शब्दों का लबादा ओढ़ाकर नजर अंदाज नहीं किया जा सकता.
राहुल गांधी की मौजूदा राजनीति को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाने की जरूरत है. 2024 में हुए लोकसभा चुनाव के नतीजों ने विपक्ष के अंदर नई जान फूंक दी थी. इन चुनावों में भाजपा ने '400 पार' का नारा दिया था, हालांकि जब नतीजे आए, तो भाजपा बहुमत के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच पाई. 400 सीटों के ख्वाब देख रही भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ 240 सीटों पर संतोष करना पड़ा, जबकि कांग्रेस 52 से 99 सीटों तक पहुंच गई. कांग्रेस 99 सीटों पर पहुंची और राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने, तब उनके पास पहली बार वह संवैधानिक और संसदीय भूमिका भी आ गई, जिसमें सरकार से सीधे सवाल पूछने की औपचारिक ताकत है. 2014 और 2019 के चुनाव में कांग्रेस के पास यह पद नहीं था.
इसके बाद राहुल गांधी ने 'भारत जोड़ो यात्रा' और 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' के दौरान राहुल ने सड़क और आम लोगों के बीच जाने की राजनीति को अपनाया. इस यात्रा का भारतीय राजनीति में बहुत गहरा प्रभाव देखने को मिला. इस यात्रा के बाद राहुल गांधी की छवि बहुत सुधार हुआ. अब राहुल सिर्फ पीएम मोदी पर हमला करने वाले विपक्षी नेता के तौर पर खुद को पेश नहीं कर रहे. वह मुद्दे चुन रहे हैं, प्रभावित वर्ग तक पहुंच रहे हैं और फिर उसी मुद्दे को संसद, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सड़क तीनों जगह उठा रहे हैं.
द प्रिंट ने अपनी एक एनालिसिस रिपोर्ट में बताया कि राहुल गांधी ध्यान अब उन मुद्दों पर ज्यादा है, जो युवा वोटरों को प्रभावित करते हैं. जैसे शिक्षा, नौकरियां और सरकारी परीक्षाओं में गड़बड़ियां. इसी के तहत, उन्होंने छात्रों से बातचीत करने और भारत की Gen Z पीढ़ी से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए 'छात्रों की गूंज' नाम का एक मंच भी शुरू किया.
इससे पहले राहुल गांधी जातिगत जनगणना के लिए लड़ रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने युवाओं से जुड़े मुद्दे उठाना शुरू कर दिए. ये मुद्दे इसलिए भी अहम हैं, क्योंकि भारत की राजनीति में युवा वोटर्स सबसे बड़ा सामाजिक समूह है. इसलिए राहुल की कोशिश सिर्फ छात्रों की समस्याएं सुनने की नहीं है. वह छात्रों की समस्या को राजनीतिक पहचान में बदलने की कोशिश कर रहे हैं.
दिलचस्प बात यह है कि राहुल के इन मुद्दों को राजनीतिक पहचान भी मिल रही है. लोग उनके साथ आ रहे हैं. शायद इसलिए भी क्योंकि एक छात्र ब्राह्मण हो सकता है, दलित हो सकता है, ओबीसी हो सकता है, मुस्लिम हो सकता है या फिर आदिवासी हो सकता है, लेकिन परीक्षा में पेपर लीक होने या फिर रोजगार ना मिलने पर उसका नुकसान समान है.
प्रिंट की रिपोर्ट में पंजाब यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल एक्सपर्ट और प्रोफेसर आशुतोष सिंह के हवाले से लिखा गया कि राहुल गांधी अब शहरी मिडिल-क्लास और लोअर मिडिल-क्लास युवाओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, एक ऐसा वर्ग जिसे जाति की राजनीति से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. सिंह ने आगे बताया,'भारत के बड़े शहरों में कई युवाओं को जाति के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, हो सकता है कि वे अपनी जाति की पहचान के बारे में ज्यादा न जानते हों या उन्हें इसकी परवाह न हो. गांधी ऐसे वर्ग तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं जो जरूरी नहीं कि जाति को अपनी राजनीतिक पहचान का मुख्य हिस्सा मानता हो.'
इस सबके अलावा राहुल गांधी भाजपा और चुनाव आयोग से भी तीखे सवाल पूछते आ रहे हैं. पिछले दिनों चुनाव आयोग के अंदर चल रहे मतभेद की खबर सामने आने के बाद राहुल गांधी अचानक आयोग के खिलाफ मुखर हुए, लेकिन वो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद से ही वोटरों की संख्या और मतदान प्रतिशत से जुड़े सवाल उठाए थे. जून 2025 में उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव में मतदान के आंकड़ों में कथित गड़बड़ी पर सवाल उठाए. चुनाव आयोग और अधिकारियों ने उनके दावों को खारिज किया और कहा कि उनके आंकड़ों में संदर्भ और डेटा की व्याख्या से जुड़ी समस्याएं हैं.
7 अगस्त 2025 को राहुल गांधी ने एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस की. राहुल गांधी ने कर्नाटक के महादेवपुरा विधानसभा सीट के वोटर्स के आंकड़ों का हवाला देते हुए 100250 वोटों की कथित हेराफेरी का आरोप लगाया. राहुल ने दावा किया कि इसमें डुप्लीकेट वोटर्स, गलत पते, एक ही पते पर बड़ी तादाद में वोटर्स और Form-6 से जुड़े मामलों जैसी गड़बड़ियां शामिल थीं. उन्होंने चुनाव आयोग से वोटर लिस्ट का डिजिटल और मशीन-रीडेबल डेटा उपलब्ध कराने की भी मांग की. यह प्रेस कॉन्फ्रेंस महत्वपूर्ण इसलिए थी क्योंकि राहुल ने इसे सिर्फ बीजेपी के खिलाफ राजनीतिक आरोप नहीं बनाया. उन्होंने सीधे चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया.
राहुल की प्रेस कान्फ्रेंस के बाद चुनाव आयोग की तरफ से भी जवाब आया. चुनाव आयोग ने कहा कि अगर राहुल अपने आरोपों पर कायम हैं, तो वे हलफनामा देकर अपने दावों को प्रमाणित करें और संबंधित विवरण उपलब्ध कराएं. ऐसा ना करने पर उन्हें देश से माफी मांगने की भी बात कही थी. चुनाव आयोग के इस जवाब के बाद राहुल नहीं रुके, उन्होंने आयोग पर हमले जारी रखे.
ये मामला सितंबर में तब और बढ़ गया, जब एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के अंदर मतभेद चल रहे हैं. SIR को लेकर भी कुछ खामियां होने का दावा किया गया. भाजपा ने इन आरोपों को खारिज किया और चुनाव आयोग की प्रक्रिया का बचाव किया. पार्टी के नेताओं ने कहा कि विपक्ष बार-बार चुनाव हारने के बाद संस्थाओं पर सवाल उठा रहा है. यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और अदालत ने भी सभी फैसलों की रिपोर्ट मांगी. साथ ही कहा कि अगर किसी फैसले में कोई खामी पाई जाती है, तो हम उस फैसले को रद्द कर देंगे.
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद विपक्ष और तीखे अंदाज में सड़कों पर उतरा. 6 अक्टूबर 2026 को यह विवाद सड़क पर पहुंच गया. राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और INDIA ब्लॉक के कई नेता चुनाव आयोग की तरफ मार्च करने निकले. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोक दिया. राहुल और प्रियंका समेत कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया. अगले दिन यानी 7 अक्तूबर को एक बार फिर सभी सांसद सड़कों पर उतरे और जंतर-मंतर प्रदर्शन के जा रहे थे, लेकिन सुरक्षाबलों ने उन्हें जाने नहीं दिया और डिटेन कर लिया.
6 और 7 अक्तूबर को बने राजनीतिक दृश्य में दिखा कि कांग्रेस की तरफ से अकेले राहुल ही नहीं हैं. उन्हें कभी गेट पर चढ़ते हुए देखा जा सकता है, कभी अपने भाई के बराबर में घंटों बैठा देखा जा सकता है और यानी 7 अक्तूबर को जंतर-मंतर पर जब पुलिस रोक रही थी, तो उन्हें सड़क पर लेटे हुए देखा जा सकता है. यह नजारे कांग्रेस को थोड़ा और मजबूत कर रहे हैं.
राहुल गांधी की राजनीति का एक पहलू है कि वो संस्थागत सवाल उठा रहे हैं. जबकि प्रियंका गांधी का राजनीतिक अंदाज उनके मुकाबले ज्यादा जनसंपर्क और सड़क की राजनीति वाला दिखाई देता है. जब दोनों एक साथ दिखाई देते हैं, तो कांग्रेस के पास दो अलग-अलग राजनीतिक भाषाएं एक मंच पर आ जाती हैं.
इसका जवाब सीधा 'हां' नहीं है. बीजेपी अभी भी केंद्र की सत्ता में है. 2024 में वह 240 लोकसभा सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी. उसके पास देशभर में मजबूत संगठन है. कई राज्यों में उसकी सरकारें हैं और राहुल गांधी के आरोपों पर बीजेपी लगातार जवाब भी दे रही है. लेकिन राजनीति में सिर्फ सत्ता में होना ही पूरी कहानी नहीं है. नैरेटिव की लड़ाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है और उस लड़ाई में राहुल गांधी निश्चित रूप से पहले की तुलना में ज्यादा सक्रिय और आक्रामक दिखाई दे रहे हैं.
इतना जरूर है कि एक दौर था, जब बीजेपी राहुल गांधी को घेरती थी. राहुल जवाब देते थे. बीजेपी मुद्दा उठाती थी. कांग्रेस सफाई देती थी. बीजेपी प्रेस कॉन्फ्रेंस करती थी. कांग्रेस प्रतिक्रिया देती थी.
अब कम से कम कुछ बड़े मुद्दों पर तस्वीर बदल गई है. राहुल गांधी प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं. राहुल कोई सवाल उठाते हैं. फिर भाजपा जवाब देती है. फिर चुनाव आयोग जवाब देता है. फिर राहुल उस जवाब को लेकर दोबारा प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं.
यानी राजनीतिक एजेंडा तय करने की कोशिश अब राहुल की तरफ से भी हो रही है और यही उनकी राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव है.