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नासा का 22 साल पुराना टेलीस्कोप अब धरती की तरफ बढ़ रहा है. 2004 में सिर्फ दो साल के मिशन के लिए भेजा गया यह टेलीस्कोप 22 साल तक काम करता रहा, लेकिन अब पृथ्वी की तरफ बढ़ रहा है. 4 नवंबर 2026 को यह पृथ्वी में कक्षा में दाखिल हो जाएगा. बड़ी बात यह है कि इसका कुछ मलबा भारत के शहरों में गिर सकता है, लेकिन इसकी संभावना बहुत कम है. साथ ही NASA ने यह भी बता दिया है कि 21000 में से सिर्फ एक फीसद ही इस टेलीस्कोप से किसी इंसान को खतरा हो सकता है. पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
यह पहली बार नहीं है, जब भारत में इस तरह का खतरा महसूस किया गया हो. इससे पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है. 1979 की एक घटना ने तो भारत में बड़ी तादाद में लोगों को खौफ में डाल दिया था. हालात यहां तक पहुंच गए थे कि अमेरिका के भारत के लिए एक विशेष दूत तैनात करना पड़ा. दरअसल अंतरिक्ष का पहला स्टेशन स्काईलैब जमीन की तरफ आ रहा था. इसका वजन लगभग 78 टन था.
जब वैज्ञानिकों को इस बारे में पता चला कि स्काईलैब धरती पर गिरने वाला है, तो उन्हें यह मालूम नहीं था कि इसका मलबा कहां गिरेगा. कयास लगाए जा रहे थे कि जब 78 टन वजनी स्काईलैब जमीन से टकराएगा, तो भारी तबाही मच सकती है. वैज्ञानिकों को आशंका थी कि इसका मलबा भारत में भी गिर सकता है. जैसा ही यह खबर भारत में फैली तो लोगों में डर का माहौल पैदा हो गया और लोग डर की वजह से घरों के अंदर सोने लगे थे. ना सिर्फ भारत बल्कि कई और देशों में भी इसके टकराने का अंदेशा जाहिर किया था.
स्काईलैब के गिरने की खबरों में मीडिया भी दिलचस्पी ले रहा था. जिसको देखते हुए अमेरिका ने विशेष दूत भारत भेजा था. पूरी घटना को लेकर अमेरिका के सामने एक बड़ी चुनौती आ गई थी. उसे यह भी समझाना था कि स्काईलैब का गिरना पूरी तरह अनियंत्रित नहीं छोड़ा गया है और वैज्ञानिक इसकी दिशा को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हैं. NASA के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक, अमेरिकी वैज्ञानिकों ने स्काईलैब की कक्षा और उसकी दिशा को बदलकर उसे आबादी वाले इलाकों से दूर रखने की कोशिश की थी.

अंत में हुआ भी कुछ ऐसा ही. 11 जुलाई 1979 को स्काईलैब ने पृथ्वी के वायुमंडल में एंट्री ली. स्काईलैब पृथ्वी की 34981वीं परिक्रमा के दौरान वायुमंडल में दाखिल हुआ. इसके बाद यह तेज गर्मी की वजह से खुद-ब-खुद ही टूटकर बीच में गिरने लगा. इसका एक बड़ा हिस्सा खुद ही जलकर तबाह भी हो गया, लेकिन कई भारी टुकड़े बच गए थे. NASA के मुताबिक, इसका ज्यादातर मलबा हिंद महासागर में गिरा, जबकि कुछ हिस्से पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के विरल आबादी वाले इलाकों में गिरे.
ऑस्ट्रेलिया के आबादी वाले इलाके में मलबा गिरने की वजह से नासा को हर्जाना भरने के लिए भी कहा गया था. स्थानीय प्रशासन ने NASA पर सार्वजनिक जगहों पर कचरा फैलाने के आरोप में 400 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का जुर्माना लगा दिया. NASA ने उस समय यह जुर्माना नहीं भरा. करीब 30 साल बाद 2009 में अमेरिकी रेडियो होस्ट स्कॉट बार्ले ने अपने श्रोताओं की मदद से 400 डॉलर जुटाए और NASA की तरफ से यह जुर्माना भर दिया.
स्काईलैब अमेरिका का पहला अंतरिक्ष स्टेशन था. इसे नासा ने 14 मई 1973 को सैटर्न-5 रॉकेट की मदद से लॉन्च किया था. इसकी मदद से नासा अंतरिक्ष में रहकर वैज्ञानिक प्रयोग करना चाहता था और पृथ्वी-सूर्य पर रिसर्च करना था. स्काईलैब भी आज के स्पेस स्टेशन की तरह ही बनाया गया था, जिसमें वैज्ञानिक वहीं रहकर परीक्षण कर सकते थे.

दिलचस्प बात यह है कि जैसे ही इसको लॉन्च किया था, तो कुछ समय बात ही खराब हो गया था. एक जानकारी के मुताबिक लॉन्च के करीब 63 दिन बाद इसका माइक्रोमीटियोरॉइड शील्ड टूटकर अलग हो गया. यह शील्ड स्टेशन को छोटे अंतरिक्षीय कणों से बचाने के साथ-साथ उसे हीट से भी महफूज रखती थी. स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि नासा को स्काईलैब में अंतरिक्ष यात्री 10 दिन की देरी से भेजने पड़े थे. क्योंकि शील्ड टूटने के बाद स्काईलैब में कई तरह के और भी नुकसान हुए. जैसे:-

वैसे तो, स्काईलैब का आखिरी मिशन 1974 में खत्म हो गया था, लेकिन नासा को उम्मीद थी कि यह स्टेशन 1983 तक काम कर सकता है. हालांकि, ऐसा नहीं हुआ. स्काईलैब धीरे-धीरे निचली कक्षाओं में आता रहा. NASA ने 1978 में इसे फिर से एक्टिव करके उसकी दिशा को कंट्रोल करने की कोशिश की, लेकिन स्पेस शटल के जरिए इसे बचाने की योजना कैंसिल करनी पड़ी और आखिरकार 11 जुलाई 1979 को यह स्पेश स्टेशन जमीन से टकरा गया.