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What was Loknayak Jayaprakash Narayan Death Rumors Story? जिस व्यक्ति का जन्म हुआ है, उसका एक दिन अंत भी निश्चित है. लेकिन क्या हो, जब एक व्यक्ति को जीते जी श्रद्धांजलि दे दी जाए. वह व्यक्ति भी कोई नहीं बल्कि संपूर्ण क्रांति का सिंहनाद करने वाले और गैर-कांग्रेसवाद के प्रवर्तक लोक नायक जयप्रकाश नारायण हो और श्रद्धांजलि संसद की ओर से दी जाए. यह हुआ था एक फेक न्यूज की वजह से, जिसके शिकार तत्कालीन पीएम मोरारजी देसाई समेत तमाम राजनेता बन गए थे. इस घटना का जब खुलासा तो सरकार की खासी किरकिरी हुई और उसे माफी मांगनी पड़ी. इस वाकये के 200 दिन बाद तक जेपी जिंदा रहे और उसके बाद चल बसे.
फेक न्यूज से जुड़े वाकये को बताने से पहले आपको यह जानना चाहिए कि जयप्रकाश नारायण आखिर कौन थे, जिनसे तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार डरती थी. असल में जयप्रकाश नारायण देश के महान स्वतंत्रतता सेनानी और समाजवादी राजनेता थे. वे शुरू में कांग्रेस से जुड़े रहे लेकिन बाद में उससे अलग हो गए.
वे अंग्रेजों के खिलाफ कई आंदोलनों में शामिल रहे. देश के आजाद होने के बाद वे राजनीति के बजाय लोकनीति की राजनीति से जुड़ गए. उन्होंने आचार्य विनोबा भावे के सर्वोदय व भूदान आंदोलनों में भाग लिया. साथ ही, चंबल के डकैतों के आत्मसमर्पण में भी अहम भूमिका निभाई.
धीरे-धीरे उन्हें एहसास होने लगा कि देश में भ्रष्टाचार, अशिक्षा, गरीबी के पीछे मौजूदा व्यवस्था है. जब तक इस सिस्टम को बदला नहीं जाएगा, तब तक व्यवस्था में कोई सुधार नहीं आएगा. इसीलिए उन्होंने 5 जून, 1975 को पटना के गांधी मैदान में बड़ी रैली करके ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान कर दिया.
इसके बाद उन्होंने 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली करके लोगों से सरकारी आदेशों का पालन न करने की अपील कर दी. जिससे डरी इंदिरा सरकार ने देश में इमरजेंसी लगाकर तमाम विपक्षी नेताओं को जेल में डालने का आदेश कर दिया. उनका यह फैसला आत्मघाती साबित हुआ और लोगों में इंदिरा सरकार के प्रति गुस्सा फैल गया. इसके बाद 1977 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस को बड़े अंतर से मात देकर पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी और मोरारजी देसाई पीएम चुने गए. इंदिरा सरकार की इस विदाई में जयप्रकाश नारायण का बड़ा हाथ रहा.
जेपी के जीवन का दुर्भाग्यपूर्ण दिन 23 मार्च, 1979 को आया. असल में गुर्दे की बीमारी से पीड़ित होने की वजह से मुंबई के जसलोक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. तभी 23 मार्च को आकाशवाणी ने अफवाहों को सच मानकर यह खबर प्रसारित करनी शुरू कर दी कि जयप्रकाश नारायण का देहांत हो गया है.
तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष के.एस. हेगड़े ने भी खबर की पुष्टि किए बिना पीएम मोरारजी देसाई के हवाले से सांसदों को जेपी के निधन की सूचना जारी कर दी. इसके साथ ही सामूहिक मौन और 2 मिनट के शोक के बाद सदन को स्थगित कर दिया गया.
उनके निधन की सूचना मिलते ही लोग आखिरी दर्शनों के लिए जसलोक अस्पताल पहुंचने लगे. संयोग से चंद्रशेखर उस वक्त अस्पताल में ही मौजूद थे. जेपी के देहांत की अफवाह के बारे में सुनकर वे भी अवाक रह गए. वे तुरंत अस्पताल के बाहर आए और सभी लोगों को बताया कि जेपी सही सलामत हैं और उनका इलाज चल रहा है.
इस वाकये से मोरारजी सरकार की देशभर में खासी किरकिरी हुई. अपनी गलती सुधारने के लिए सरकार ने स्थगन के 4 घंटे बाद ही लोकसभा की बैठक फिर बुलाई और चूक के लिए खेद व्यक्त किया. खास बात ये थी कि 23 मार्च को राम मनोहर लोहिया का जन्मदिन होता है. ऐसे में उसी दिन जेपी की मौत की अफवाह से मामला खासा गर्म हो गया था.
इस वाकये के 200 दिन बाद तक जेपी जिंदा रहे और 8 अक्तूबर 1979 को उनका देहांत हो गया. उनके निधन के करीब 19 साल बाद जयप्रकाश नारायण को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से सम्मानित किया गया. वे जब तक जिए, एक निर्भीक राजनेता के रूप में रहे, जो गलत कामों के आगे कभी झुकते नहीं थे.