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21 गांवों पर ओडिशा-आंध्र की जंग: बीच में पिस रहे आम लोग! कहीं पेंशन अटकी, कहीं पहचान का संकट; क्या है कोटिया विवाद

ओडिशा और आंध्र प्रदेश के बीच कोटिया के 21 गांवों को लेकर लंबे समय से विवाद है. इस बीच आंध्र प्रदेश ने कुछ गांवों में चुनाव कराने का ऐलान किया है. जिसको लेकर सियासत गरमा गई है.

Written By Tahir Kamran
Published: Oct 19, 2026, 10:18 PM IST | Updated: Oct 19, 2026, 10:21 PM IST
Image Credit: AI की मदद से बनाई गई तस्वीर
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ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सीमा पर बसे 21 गांवों के समूह 'कोटिया' पर अधिकार को लेकर विवाद जारी है. इसी बीच, आंध्र प्रदेश ने यहां के तीन गांवों में चुनाव कराने का ऐलान कर दिया. इस घोषणा के बाद ओडिशा की राजनीति गरमा गई है. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और बीजेडी प्रमुख नवीन पटनायक ने मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को पत्र लिखकर जवाब मांगा है. उन्होंने बीजेपी के पुराने चुनावी वादे की याद दिलाते हुए सवाल उठाया कि जब पार्टी ने ओडिशा की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने और कोटिया विवाद का स्थायी समाधान निकालने का वादा किया था, तो अब विवादित गांवों में चुनाव कराने के ऐलान पर सरकार क्या कदम उठा रही है?

अपने पत्र में पटनायक ने कहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए उनकी सरकार ने ओडिशा की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष किया था. उन्होंने याद दिलाया कि भाजपा नेता भी पहले यह दावा करते रहे हैं कि कोटिया ओडिशा का हिस्सा है और उन्होंने 'गो बैक आंध्र' जैसे नारे भी लगाए थे. उन्होंने कहा कि 2024 के चुनाव से पहले भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया था कि डबल इंजन सरकार बनने पर कोटिया विवाद का स्थायी समाधान निकाला जाएगा, ओडिशा की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा की जाएगी और 'ओड़िया स्वाभिमान' को मजबूत किया जाएगा. पटनायक ने सवाल किया कि उन वादों का क्या हुआ.

क्या है 'कोटिया' विवाद?

आंध्र प्रदेश और ओडिशा की सरहद पर बसे 21 गावों के एक समूह को 'कोटिया' कहते हैं. ये सभी गांव ओडिशा के कोरापुट जिले और आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम मन्याम जिले (सालूर मंडल) के बीच पड़ते हैं. यह विवाद लगभग 70 वर्ष पुराना है. जब 1936 में ओडिशा को भाषा की बुनियाद पर अलग राज्य बनाया गया और बाद में 1956 में राज्यों का पुनर्गठन हुआ, तब इस पहाड़ी सीमावर्ती क्षेत्र का बंटवारा स्पष्ट रूप से नहीं किया गया था.

'द हिंदू' की एक रिपोर्ट के मुताबिक,'आंध्र प्रदेश अपने दावे के पीछे ब्रिटिश काल की मद्रास प्रेसीडेंसी के आदेश हैं. जिनमें कहा गया था कि ये गांव सालूर के जमींदारों के तहत हैं. जबकि दूसरी तरफ ओडिशा का कहना है कि ये सभी गांव हमेशा से कोरापुट जिले का हिस्सा रहे हैं. यह मामला 1968 में सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था. ओडिशा ने आंध्र प्रदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दाखिल किया था, तब अदालत ने यथास्थिति बरकरार रखने की बात कही थी.

हालांकि, 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को लेकर कहा कि इसका फैसला सरकार को संसद के जरिए करना चाहिए. अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 131 के तहत ऐसे विवादों का हल निकालने का हक संसद के पास है.

21 गावों के हजारों लोगों को होती है परेशानी

इस तरह के विवाद में वहां रह लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. सरकारी स्कीमों और पहचान को लेकर भी सवाल उठते रहते हैं. ग्रामीणों को रोजमर्रा की जिंदगी में भी प्रशासनिक और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.

एक ही शख्स के दोनों राज्यों में अलग-अलग नाम और दस्तावेज

'द हिंदू' की एक रिपोर्ट के मुताबिक,'मुत्यालु मर्री नाम के करीब 60 साल के एक आदिवासी व्यक्ति के दो राज्यों के सरकारी रिकॉर्ड में अलग-अलग नाम दर्ज हैं. आंध्र प्रदेश में: Muthyalu Marri, जबकि ओडिशा में Mutal Mari नाम है. उनके पास दोनों राज्यों के अलग-अलग वोटर आईडी और राशन कार्ड हैं.'

उदाहरण से समझें कैसे होती है लोगों को परेशानी

देश के कई राज्यों में है सीमा को लेकर विवाद

आंध्र और ओडिशा के बीच ही सरहदी जगहों को लेकर विवाद नहीं है. इन दोनों राज्यों के अलावा कई और भी चर्चित मामले हैं. कहीं गांवों पर अधिकार को लेकर खींचतान है, तो कहीं जमीन और प्रशासनिक सीमाओं का मामला उलझा हुआ है. नीचे दी गई टेबल में ऐसे ही कुछ प्रमुख अंतर-राज्य सीमा विवादों और उनके मुख्य मुद्दों को समझिए.

राज्यकिसके साथ विवादमुख्य विवाद
असमअरुणाचल प्रदेशसीमा और गांवों पर दावा
असममेघालय12 विवादित क्षेत्र
असममिजोरमसीमा निर्धारण
असमनागालैंडजमीन और जंगलों पर दावे
महाराष्ट्रकर्नाटकबेलगावी और आसपास के क्षेत्र
ओडिशाछत्तीसगढ़सीमावर्ती गांवों का विवाद
हरियाणाहिमाचल प्रदेशसीमा निर्धारण
लद्दाखहिमाचल प्रदेशकुछ क्षेत्रों की सीमा
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About the Author

Zee News में नेशनल डेस्क पर देश–विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरें लिखते हैं. करियर का आगाज 2015 से 'पंजाब केसरी' ग्रुप के उर्दू अखबार ‘हिंद समाचार’ से किया, जहां वे कंटेट राइटर से पेज डिजाइनर तक पहुंचे. इसके बाद उर्दू, हिंदी और पंजाबी - तीनों भाषाओं में काम करने का मौका मिला. 2018 में डिजिटल की तरफ कूच करते हुए पंजाब केसरी ग्रुप की उर्दू वेबसाइट की लॉन्चिंग टीम का नेतृत्व किया. इसके बाद 2020 में 'Zee Salaam' ज्वाइन किया, यहां भी वेबसाइट को लॉन्च करने के साथ-साथ तीन साल टीम का नेतृत्व भी किया. इसी दौरान ZEE Delhi NCR वेबसाइट भी लॉन्च हुई, जिसमें उनका अहम योगदान रहा. 2023 में India Daily Live की लॉन्चिंग टीम के साथ काम किया और शुरुआती दिनों में हिंदी के अलावा पंजाबी, तमिल, तेलुगु और गुजराती वेबसाइट टीमों को मैनेज किया. अक्टूबर 2024 में फिर से Zee Media में में वापसी करते हुए नेशनल टीम का हिस्सा बने. तकनीक में दिलचस्पी की वजह से उन्होंने React.js और वेब डिजाइनिंग सीखी. यही कारण है कि उनकी खबरों में HTML-CSS के छोटे-छोटे ग्राफिक्स दिख जाते हैं, जो मुश्किल बातों को भी आसान बना देते हैं. करियर की शुरुआत में कुछ दिनों तक फोटो स्टूडियो में भी काम किया, जहां कैमरा, Adobe Photoshop और ग्राफिक डिजाइनिंग सीखी, जो आज भी उनके डिजिटल काम में मदद करता है. उर्दू शायरी से प्यार अलग ही है. ग़ज़लें, नज़्में, गीत भी लिखते हैं और कई अखबारों में उनकी शायरी छप भी चुकी हैं. राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा, अनवर जलालपुरी खुशबीर सिंह शाद और नवाज देवबंदी, माजिद देवबंदी  जैसे शायरों के इंटरव्यू व बातचीत का अनुभव भी उनके पास है. आप tahir.kamran@india.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facbook से जुड़ सकते हैं. 
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