टिकट बंटवारे में एक गलत फैसला और दिल्ली छात्रसंघ चुनावों में डूब गई NSUI की लुटिया, हार की इनसाइड स्टोरी
दिल्ली यूनिवर्सिटी चुनावों में कांग्रेस समर्थित एनएसयूआई को करारा झटका लगा है. पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई. इसे लेकर अब कांग्रेस आलाकमान ने कन्हैया कुमार से जवाब मांगा है. माना जा रहा है कि पार्टी का एक गलत फैसला, उसके खिलाफ चला गया.
दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनावों में कांग्रेस पार्टी के छात्र संगठन, नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया यानी एनएसयूआई ने इस साल एक भी सीट नहीं जीती. लेकिन पार्टी के बागी उम्मीदवार ने जीत के झंडे गाड़ दिए और पार्टी की तरफ से टिकट नहीं दिए जाने के बावजूद 13,000 से ज्यादा वोटों से वाइस-प्रेसिडेंट का पद जीता. बाकी पदों - प्रेसिडेंट, सेक्रेटरी और जॉइंट सेक्रेटरी पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP ने परचम लहराया. इसके बाद पार्टी के अंदर मंथन हुआ. कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई और खबर है कि राहुल गांधी ने NSUI के इंचार्ज कन्हैया कुमार से इस पर जवाब मांगा है.
एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस की जीत और पूरी तरह हार के बीच का अंतर दो ऐसे फैसलों की वजह से था जो पार्टी के आलाकमान ने कभी नहीं लिए. शौकीन को आधिकारिक उम्मीदवार बनाना और गोपाल चौधरी के बजाय विशेष यादव का समर्थन करना.
प्रेसिडेंट और ज्वॉइंट सेक्रेटरी के चुनाव कड़े मुकाबले वाले थे. ज्वॉइंट सेक्रेटरी और वाइस प्रेसिडेंट दोनों ही चुनावों में NSUI तीसरे नंबर पर रही. वाइस प्रेसिडेंट पद के लिए उसके आधिकारिक उम्मीदवार को NOTA से भी कम वोट मिले, जबकि ज्वॉइंट सेक्रेटरी पद के लिए उसका बागी उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहा. अगर संगठन बंटे होने के बजाय एकजुट होकर मैदान में उतरता, तो कम से कम एक चुनाव का नतीजा आसानी से दूसरी तरफ जा सकता था. इसके बजाय, टिकट बंटवारे ने एक ऐसे चुनाव को, जिसमें जीत की संभावना थी, विपक्ष की एकतरफा जीत में बदल दिया.
यह चुनाव इतना अहम क्यों था?
वोटिंग के दिन से पहले का माहौल कांग्रेस के पक्ष में होना चाहिए था. छात्रों ने NEET पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर बड़ा विरोध प्रदर्शन किया था. राहुल गांधी ने शिक्षा और नौकरियों के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ जोरदार कैंपेन चलाया, जिससे BJP समर्थित ABVP पर प्रेशर बना.
वोटिंग से कुछ दिन पहले, यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास एक प्राइवेट हॉस्टल ढह गया, जिसमें कई छात्रों की मौत हो गई. इससे सत्ता पक्ष पर दबाव और बढ़ गया. लेकिन इनमें से किसी भी चीज का फायदा NSUI को वोटिंग में नहीं मिला. नतीजे आने के कुछ घंटों बाद, गांधी ने इंदौर में छात्रों के एक अलग कार्यक्रम 'छात्रों की गूंज' में बात की. लेकिन हर कोई DUSU के नतीजों की ही चर्चा कर रहा था.
अब सबकी नजरें कन्हैया कुमार पर टिकी हैं, जो तीन साल से कांग्रेस के छात्र संगठन की कमान संभाले हुए हैं. खबर है कि पार्टी हाईकमान ने उनसे इस बात की पूरी रिपोर्ट मांगी है कि क्या गड़बड़ हुई. कन्हैया ने एक छात्र नेता के तौर पर अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था, अब उनसे सवाल पूछे जा रहे हैं कि टिकट कैसे बांटे गए और NSUI के सबसे मजबूत उम्मीदवारों में से एक को टिकट क्यों नहीं मिला.
प्रेसिडेंट चुनाव लड़ने से शौकीन का इनकार
NSUI सूत्रों का कहना है कि शौकीन से पहले प्रेसिडेंट पद के लिए चुनाव लड़ने को कहा गया था, लेकिन वह ऐसा नहीं करना चाहते थे. उन्होंने सीनियर नेताओं से कहा कि वह वाइस प्रेसिडेंट पद के लिए चुनाव लड़ना पसंद करेंगे. सूत्रों के मुताबिक, उन्हें चिंता थी कि वह प्रेसिडेंट पद के लिए ABVP के यश डबास को नहीं हरा पाएंगे, क्योंकि दोनों ही जाट समुदाय से हैं और दिल्ली के एक ही इलाके से आते हैं.
NSUI के एक सीनियर सूत्र ने बताया, 'दीपांशु इस बार हमारे सबसे मजबूत उम्मीदवार थे. वह लंबे समय से कैंपस में एक्टिव थे और उनके साथ एक मजबूत टीम थी. इसलिए हम उन्हें प्रेसिडेंट पद के लिए मैदान में उतारना चाहते थे और उन्हें अपने पैनल का चेहरा बनाना चाहते थे.'
NSUI की शुरुआती लिस्ट में शौकीन प्रेसिडेंट, विजय शंकर मीणा वाइस-प्रेसिडेंट, नम्रता चौधरी सेक्रेटरी और विशेष यादव ज्वॉइंट सेक्रेटरी पद के लिए थे. जब नॉमिनेशन वापस लेने की डेडलाइन से ठीक पहले शौकीन को यह बताया गया, तो उन्होंने प्रेसिडेंट पद के लिए चुनाव लड़ने से मना कर दिया. इसके बजाय, उन्होंने वाइस-प्रेसिडेंट पद के लिए जोर दिया और बाकी तीन पदों से अपना नाम वापस ले लिया. कन्हैया कुमार ने इसे अनुशासनहीनता और विपक्ष के साथ मिलीभगत जैसा माना और उन्हें पैनल से हटा दिया.
मीणा को प्रेसिडेंट पद के चुनाव के लिए आगे किया गया. वीर छत्रथ, जो शुरुआती पैनल में नहीं थे, उन्हें वाइस-प्रेसिडेंट पद के लिए लाया गया.
NSUI में हो गया बिखराव
DUSU चुनावों में जाट वोटों का काफी महत्व है, और शौकीन के हटने के बाद, NSUI ने जाट वोटों को एकजुट रखने की कोशिश में जॉइंट सेक्रेटरी पद के लिए विशेष यादव की जगह गोपाल चौधरी को शामिल किया. यादव ने इसके जवाब में बगावत कर दी. एक अलग बागी उम्मीदवार, समर्थ बेनीवाल भी प्रेसिडेंट पद की दौड़ में शामिल हुए थे, लेकिन जैसे-जैसे मुकाबला आगे बढ़ा, उन्होंने कैंपेनिंग से काफी हद तक दूरी बना ली. जब तक कैंपेनिंग शुरू हुई, NSUI खेमा पहले ही बिखराव की स्थिति में था.
जब बगावत की खबर दिल्ली पहुंची, तो कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई. खबरों के मुताबिक, उन्होंने टिकट बंटवारे के तरीके पर निराशा जताई और कहा कि राहुल गांधी इस पर जवाब चाहते हैं. कन्हैया कुमार पर सीधा दबाव पड़ा. मीटिंग में सचिन पायलट, दीपेंद्र हुड्डा, NSUI और यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस प्रमुख भी मौजूद थे. जब यह साफ हो गया कि DUSU चुनाव हाथ से निकल रहा है, तो उन सभी को नुकसान कम करने के लिए हर संभव कोशिश करने का फरमान दिया गया.
खबरों के मुताबिक, मीटिंग में कुछ युवा नेताओं ने शौकीन और यादव को आधिकारिक उम्मीदवार घोषित करने का सुझाव दिया, हालांकि इस पर कभी खुलकर चर्चा नहीं हुई. वहां मौजूद एक शख्स ने चुनाव को 'सिर्फ एक औपचारिकता' बताया, जिसमें असल जीत के बजाय तथाकथित अनुशासन और अपनी साख बचाने को ज्यादा अहमियत दी जा रही थी.
शौकीन के लिए सहानुभूति बढ़ी
जैसे-जैसे कैंपेन आगे बढ़ा, कैंपस और ऑनलाइन, दोनों ही जगह निर्दलीय उम्मीदवार शौकीन के लिए समर्थन बढ़ता गया. उन्होंने इस बात से इनकार किया कि NSUI ने उन्हें कभी प्रेसिडेंट पद का ऑफर दिया था. वीर छत्रथ, जिन्हें उनकी जगह चुना गया, कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता मनीष छत्रथ के बेटे हैं. मनीष छत्रथ पार्टी का इंदिरा भवन हेडकॉवार्टर चलाते हैं और गांधी परिवार के करीबी माने जाते हैं.
शौकीन के पिता DTC बस कंडक्टर हैं. उनके समर्थकों ने इस अंतर का खूब इस्तेमाल किया और मुकाबले को ऐसे पेश किया जैसे जमीनी स्तर पर काम करने वालों को नजरअंदाज करके 'नेता के बेटे' को आगे बढ़ाया जा रहा हो. समाजवादी पार्टी के छात्र विंग ने ज्वॉइंट सेक्रेटरी पद के लिए विशेष यादव को अपना उम्मीदवार बनाकर NSUI की मुश्किलें और बढ़ा दीं.
मिजाज बदलते देख, NSUI ने प्रेसिडेंट पद की दौड़ में अपनी पूरी ताकत झोंक दी. उन्होंने आदिवासी समुदाय से आने वाली मीना को दलित समुदाय से आने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ के साथ जोड़ा और अपने टिकट को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर फोकस किया.
ऑनलाइन मीना के लिए सहानुभूति बढ़ी और कैंपेन ने गैर-जाट वोटरों को अपने पाले में करने का काम किया. मीना गिनती के ज्यादातर राउंड में आगे रहीं, लेकिन आखिर में लगभग दो हजार वोटों से हार गईं. वाइस-प्रेसिडेंट की दौड़ में ABVP के इशू मौर्य, शौकीन को नहीं हरा पाए, जबकि NSUI के अपने उम्मीदवार छत्रथ, NOTA से भी पीछे रह गए. सेक्रेटरी पद के लिए ABVP की रिया चावड़ी ने अपनी NSUI प्रतिद्वंद्वी को लगभग सात हजार वोटों से हराया.
ज्वॉइंट सेक्रेटरी की दौड़ ABVP, NSUI और यादव के निर्दलीय कैंपेन के बीच त्रिकोणीय मुकाबले में बदल गई. गिनती के ज्यादातर समय पीछे रहने के बाद, ABVP के लक्ष्य राज आखिरी राउंड में आगे निकल गए. यादव दूसरे और NSUI के गोपाल चौधरी तीसरे नंबर पर रहे. तब से NSUI ने धांधली का आरोप लगाया है, हालांकि बड़ी तस्वीर कई अंदरूनी गलतियों की ओर इशारा करती है जिनकी वजह से पार्टी की कमजोरी सामने आई.
एक गलत फैसला, मिली करारी हार
कन्हैया कुमार के करीबी एक नेता ने इस आलोचना का जवाब दिया. उन्होंने तर्क दिया कि DUSU चुनाव लंबे समय से वरिष्ठ नेताओं के अनौपचारिक नेटवर्क और जाति-आधारित समीकरणों से प्रभावित रहे हैं, जो अपनी सुविधानुसार उम्मीदवारों और पदों को तय करने की कोशिश करते हैं. उन्होंने कहा कि उस सिस्टम का एक हिस्सा ABVP के यश डबास को प्रेसिडेंट और शौकीन को वाइस-प्रेसिडेंट बनाना था; उन्होंने दावा किया कि यह नतीजा सालों से इसी तरह तय किया जाता रहा है.
उन्होंने कहा, 'क्या हमें इन जाति-क्षेत्रीय लॉबी की ओर से चुनी गई सिर्फ चुनाव-संभालने वाली मशीनें बनकर रह जाना चाहिए? इस बार हम उनके दबाव में नहीं आए.' उन्होंने यह भी माना कि पार्टी के सीनियर नेता बागी उम्मीदवारों को जगह देने में नाकाम रहे, जबकि उनके पास ऐसा करने का मौका था. लेकिन उनके पास इस बात का कोई साफ जवाब नहीं था कि छत्रथ को उम्मीदवार क्यों बनाया गया, या जब शुरू में ही यह साफ हो गया था कि वह हारेंगे, तो नेताओं ने दखल क्यों नहीं दिया.
एक टिकट के गलत बंटवारे की वजह से देश के सबसे बड़े छात्र संघ चुनाव में NSUI को एक भी सीट नहीं मिली. इसे कांग्रेस और राहुल गांधी, दोनों के लिए व्यक्तिगत तौर पर एक झटका माना जा रहा है. जानकारों का कहना है कि टिकट बंटवारे में अगर समझदारी दिखाई जाती, तो गांधी को राजधानी से एक असली राजनीतिक जीत मिल सकती थी, जिसे वे अपनी उपलब्धि के तौर पर दिखा सकते थे.
कन्हैया कुमार का खुद का छात्र राजनीति का इतिहास रहा है. वे 2015 में वामपंथी विचारधारा वाले AISF उम्मीदवार के तौर पर JNU छात्र संघ के प्रेसिडेंट बने थे. सीमित संगठनात्मक समर्थन के बावजूद, उन्होंने मुख्य रूप से अपने शानदार भाषण कौशल के दम पर जीत हासिल की थी.
NSUI प्रेसिडेंट विनोद जाखड़ का बैकग्राउंड भी कुछ वैसा ही है. उन्होंने 2018 में राजस्थान यूनिवर्सिटी छात्र संघ का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीतने के लिए NSUI के खिलाफ बगावत की थी. दोनों ही नेता छात्र राजनीति में अनुभवी हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि उनके बीच रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं, और यही तनाव उस उलझन की जड़ है जिसकी वजह से आखिरकार NSUI को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.