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महाष्टमी के अवसर पर आज उज्जैन में नगर पूजन किया गया. परंपरा के अनुसार, कलेक्टर रोशन कुमार सिंह और पुलिस अधीक्षक (SP) प्रदीप शर्मा ने देवी के मंदिर में आयोजित महाआरती में भाग लिया. सुबह से ही चौबीस खंभा माता मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहा. मान्यताओं के अनुसार राजा विक्रमादित्य यहां देवी की पूजा करते थे और अब जिला कलेक्टर इस परंपरा को निभा रहे हैं. कलेक्टर रोशन कुमार सिंह और SP प्रदीप शर्मा ने देवी महामाया और महालया को मदिरा का भोग लगाया और महाआरती की. इस नगर पूजन का मुख्य उद्देश्य शहर को प्राकृतिक आपदाओं से बचाना और यहां निरंतर समृद्धि, कल्याण और खुशहाली सुनिश्चित करना है.
दरअसल, उज्जैन में नगर पूजा की परंपरा राजा विक्रमादित्य के समय से चली आ रही है. आज इस परंपरा का निर्वहन उज्जैन के जिला कलेक्टर द्वारा किया गया. यहां नवरात्रि पर महाष्टमी के दिन वर्ष में एक बार जिला प्रशासन द्वारा नगर पूजा की जाती है. इस पूजा में लगभग 27 किलो मीटर तक मदिरा की धार लगाई जाती है जो की शहर के कई देवी मंदिरों में जाती है. इस भव्य अनुष्ठान के दौरान जिला प्रशासन के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी शामिल होते हैं जो पैदल यात्रा करते हैं. यह यात्रा सुबह शुरू होती है और शाम तक संपन्न होती है. इसकी शुरुआत उज्जैन के प्रसिद्ध चौबीस खंभा माता मंदिर से होती है, जो शहर से होते हुए अंत में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर तक पहुंचती है, जहां मंदिर के शिखर पर एक ध्वज फहराया जाता है.
इस यात्रा की खास बात यह है कि इसमें शराब (मदिरा) से भरा एक घड़ा ले जाया जाता है, जिसके निचले हिस्से में एक छेद होता है. जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती है, रास्ते भर और देवी के मंदिरों में उस घड़े से शराब की एक निरंतर धारा गिरती रहती है. हर महापूजा के दौरान जिला कलेक्टर, अन्य प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों और बड़ी संख्या में भक्तों की उपस्थिति रहती है.
इस परंपरा का पालन करते हुए महाअष्टमी के दिन आज सुबह जिला प्रशासन के अधिकारी और कर्मचारी चौबीस खंभा माता मंदिर पहुंचे. यहां उन्होंने देवी महालया और महामाया की पूजा की और देवियों को मदिरा अर्पित की. महाअष्टमी की यह भव्य रस्म सुबह 8:00 बजे शुरू हुई, जिसमें ढोल और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाए गए. इसके बाद तहसीलदार के नेतृत्व में प्रशासनिक टीम नगर पूजा के लिए निकली. इस शोभायात्रा के दौरान, एक कोटवार अपने सिर पर एक ऐसा कलश लेकर चलता है, जिसके निचले हिस्से में छेद होता है. इस छेद से मदिरा लगातार बाहर गिरती रहती है.देवी शक्तियों को चढ़ाई जाने वाली इस मदिरा को प्रसाद के रूप में बडी संख्या में श्रद्धालु ग्रहण भी करते हैं. मदिरा सहित इस पूरी यात्रा का खर्च प्रशासन द्वारा उठाया जाता है.