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मध्य प्रदेश के बीना से विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ा फैसला सुनाया है और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की बड़ी जीत हुई है. कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष को निर्मला सप्रे की सदस्यता को लेकर दायर की गई याचिका पर 2 महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (4 नवंबर) को यह आदेश नेता प्रतिपक्ष और वरिष्ठ कांग्रेस नेता उमंग सिंघार की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया.
साल 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में निर्मला सप्रे ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था और बीना सीट से जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंची थीं. हालांकि, बाद में निर्मला सप्रे भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गई थीं. इसके बाद कांग्रेस नेता उमंग सिंघार ने विधानसभा अध्यक्ष के सामने दलबदल कानून के तहत निर्मला सप्रे की सदस्यता खत्म करने का आवेदन दिया था. विधानसभा अध्यक्ष के पास लंबे समय तक मामला लंबित रहने पर कांग्रेस ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था.
10वीं अनुसूची पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने कांग्रेस और नेता प्रतिपक्ष की ओर से पक्ष रखा. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) का हवाला देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दलबदल से जुड़ी याचिकाओं और मामलों का शीघ्र निराकरण किया जाना बेहद आवश्यक है. भले ही हाईकोर्ट ने इस मामले में तात्कालिकता न मानी हो, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह के विषयों पर समयबद्ध निर्णय होना जरूरी है.
फैसले का राजनीतिक असर
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मध्य प्रदेश की राजनीति पर गहरा असर पड़ सकता है. खासकर कांग्रेस पार्टी के लिए यह एक बड़ी राहत और कानूनी जीत के रूप में देखा जा रहा है. अब विधानसभा अध्यक्ष को 2 महीने की तय समय-सीमा के भीतर बीना की विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता पर अंतिम फैसला सुनाना होगा, जिससे प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है.