बैतूल लिंक रोड का रियलिटी चेक: 7 करोड़ का बजट, 1 साल का वक्त... फिर भी अधूरी! हिचकोले खाने को मजबूर लोग
Betul News: बैतूल में ₹7 करोड़ की लागत से बन रही एक लिंक रोड का काम एक साल बाद भी अधूरा पड़ा है. समय-सीमा खत्म होने के बावजूद, सड़क पर कई जगहों पर गड्ढे और बिखरी हुई बजरी के कारण दुर्घटनाएं हो रही हैं.
मध्य प्रदेश के बैतूल शहर के मुख्य आवागमन मार्ग यानी लिंक रोड के निर्माण में हो रही भारी देरी ने आम जनता और राहगीरों का जीना मुहाल कर दिया है. लगभग 7 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बन रही यह सड़क एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आधी अधूरी पड़ी है. सड़क पर फैली गिट्टी, धूल और गड्ढों के कारण गाड़ियां फिसल रही हैं और उचकती गिट्टियों से लोग चोटिल हो रहे हैं. यह मार्ग शहर के प्रमुख अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों को जोड़ता है, जिससे मरीजों, एम्बुलेंसों और स्कूली बच्चों को रोज़ाना हादसों के साये में सफर करना पड़ रहा है.
7 करोड़ की लिंक रोड 1 साल बाद भी अधूरी
स्थानीय पार्षद ने इस गंभीर मुद्दे को लेकर कलेक्टर और PWD समेत कई अधिकारियों से बार-बार शिकायतें की हैं, लेकिन उनकी चिंताओं पर अब तक कोई ध्यान नहीं दिया गया है. लोगों को इस अधूरे रास्ते पर बने स्कूलों और प्राइवेट अस्पतालों तक पहुंचने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. बारिश के मौसम में कीचड़ और गड्ढों की वजह से हमेशा दुर्घटना का डर बना रहता है. बताया जा रहा है कि निर्माण कार्य पूरा करने की तय समय-सीमा भी गुजर चुकी है, फिर भी काम अधूरा पड़ा है. लगभग दो महीने पहले कलेक्टर ने PWD अधिकारियों को निर्माण कार्य जल्द पूरा करने का निर्देश दिया था. आरोप है कि अतिक्रमण की वजह से सड़क को संकरा किया जा रहा है और काम में जल्दबाज़ी की जा रही है, जिससे आम जनता को काफी परेशानी हो रही है.
कब खत्म होगी जनता की मुसीबत?
SDM समेत एक संयुक्त टीम ने निरीक्षण किया और भरोसा दिलाया कि काम जल्द ही पूरा हो जाएगा. अधिकारियों के अनुसार बिजली के खंभे, पेड़ और नालियां सड़क निर्माण में बाधा डाल रहे हैं. इन बाधाओं को जल्द ही हटा दिया जाएगा. लेकिन, सवाल यह है कि ₹7 करोड़ का यह सड़क प्रोजेक्ट आखिरकार कब पूरा होगा, लंबे समय से परेशानी झेल रही जनता को कब राहत मिलेगी और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्रवाई असल में कब देखने को मिलेगी?
बैतूल की यह लिंक रोड सिर्फ एक आम रास्ता नहीं, बल्कि शहर के लिए एक जीवन रेखा है, क्योंकि इसके किनारे अस्पताल, स्कूल और व्यावसायिक प्रतिष्ठान स्थित हैं. ₹7 करोड़ का बजट होने के बावजूद निर्माण में हो रही देरी साफ तौर पर दिखाती है कि प्रशासनिक लापरवाही और ठेकेदार की जवाबदेही की कमी का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है. अब यह देखना बाकी है कि संयुक्त टीम के निरीक्षण के बाद जमीन पर काम कितनी जल्दी शुरू होता है और नागरिकों को इस जर्जर सड़क से कब राहत मिलती है.