SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

MP में दो साल के रोलिंग बजट की तैयारी, वित्त विभाग ने कसी कमर, 8 सितंबर से शुरू होगा मंथन

MP News: मध्य प्रदेश सरकार ने वित्तीय वर्ष 2028-29 और 2029-30 के लिए दो साल का रोलिंग बजट तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इसके तहत, वित्त विभाग 8 सितंबर से विभागों के प्रमुखों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठकें करेगा.

Written By Ranjana Kahar
Published: Sep 06, 2026, 08:42 AM IST | Updated: Sep 06, 2026, 02:48 PM IST
Image Credit: AI जनरेटेड फोटो
Join

मध्य प्रदेश सरकार आने वाले वर्षों की वित्तीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए दो साल के रोलिंग बजट की तैयारी में जुट गई है. इसके लिए 8 सितंबर से विभागों की बैठकों का सिलसिला शुरू होगा. वित्त विभाग सभी विभागाध्यक्षों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ योजनाओं, बजट जरूरतों और वित्तीय संसाधनों को लेकर मंथन करेगा. चर्चा में 2027-28 के लिए बजट अनुमान और 2026-27 के लिए संशोधित बजट अनुमान भी शामिल होंगे.

जांच के बाद बनाया जाएगा ड्राफ्ट
बजट में कोई गलती न हो, इसलिए इस बार तीन लेवल पर जांच के बाद ही बजट का फाइनल ड्राफ्ट बनाया जाएगा. अगर आय का अंदाजा गलत हुआ तो पूरा बजट बिगड़ जाता है. फिर सरकार को विभागों का बजट काटना पड़ता है और काम पूरे नहीं हो पाते. इसलिए पहले अपर सचिव और उपसचिव विभागों के बजट प्रस्तावों को देखेंगे, फिर सचिव लेवल पर जांच होगी और आखिर में मंत्रियों के साथ बैठक में बजट को फाइनल किया जाएगा.

8 सितंबर से शुरू होगा बजट को लेकर मंथन
8 सितंबर से शुरू होने वाली इन बैठकों में वित्त विभाग सभी विभागों के प्रमुखों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ चर्चा करेगा. विभागों की आने वाली योजनाओं, वित्तीय जरूरतों और उपलब्ध संसाधनों पर विस्तार से बातचीत होगी. साथ ही, 2027-28 के लिए बजट अनुमानों और 2026-27 के लिए संशोधित बजट अनुमानों की समीक्षा की जाएगी. सरकार ने बजट तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान विभागों के लिए जरूरी जानकारी समय पर देना अनिवार्य कर दिया है. संबंधित विभागों को बैठक से कम से कम तीन दिन पहले बजट मॉनिटरिंग सिस्टम पोर्टल पर जरूरी जानकारी अपलोड करनी होगी.

रोलिंग बजट और 2047 का विजन
इस बार बजट को सीधे विकसित मध्यप्रदेश-2047 के बड़े विजन से जोड़ा जा रहा है. सरकार सिर्फ एक साल का हिसाब-किताब नहीं देखेगी, बल्कि लंबे समय के लिए पैसों का इंतजाम कैसे होगा, इस पर फोकस करेगी. रोलिंग बजट से सरकार आने वाले सालों की बड़ी योजनाओं के लिए पहले से ही पैसों की प्लानिंग करेगी.

रोलिंग बजट क्या है और इसके क्या फायदे हैं?
नॉर्मल बजट में सरकार सिर्फ एक साल (1 अप्रैल से 31 मार्च तक) के लिए हिसाब-किताब तैयार करती है. लेकिन रोलिंग बजट में एक साल के साथ-साथ अगले 2-3 सालों का भी पहले से अनुमान लगाया जाता है. यह कैसे काम करता है? मान लीजिए सरकार 2026-27 के लिए बजट बना रही है. सामान्य बजट में सिर्फ 2026-27 पर ध्यान दिया जाता है. रोलिंग बजट में 2026-27 के लिए पक्का बजट + 2027-28 और 2028-29 के लिए मोटे तौर पर योजनाएं भी बनाई जाती हैं. हर साल जब नया बजट आता है, तो यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है. जैसे 2027 में, 2027-28 के लिए बजट पक्का हो जाएगा और 2029-30 के लिए एक नई शुरुआती योजना जोड़ी जाएगी.

इसका क्या फायदा है? बड़ी योजनाओं (जैसे एक्सप्रेसवे, नया मेडिकल कॉलेज) के लिए पैसे की जरूरत एक साल में नहीं, बल्कि 3-4 सालों तक होती है, इसलिए पहले से योजना बनाई जाती है. इससे अचानक पैसे की कमी नहीं होती. सरकार को पता होता है कि 2047 तक विकसित MP बनाने के लिए हर साल कितने पैसे की जरूरत होगी.

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:

About the Author

रंजना कहार एक डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें न्यूज़ मीडिया और डेस्क ऑपरेशंस के क्षेत्र में 4 सालों से ज्यादा का अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (MP-CG) की डिजिटल टीम में सब-एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीतिक हलचलों, क्राइम और स्थानीय मुद्दों (हाइपरलोकल खबरों) की सटीक, निष्पक्ष व तथ्य-आधारित कवरेज में उनकी एक्सपर्टीज है.छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (बिलासपुर) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद रंजना ने अपने करियर की शुरुआत ETV भारत से की थी. ज़ी मीडिया से पहले उन्होंने APN न्यूज़ के साथ भी काम किया है. कंटेंट एडिटिंग, न्यूज़ प्रोडक्शन और डेस्क मैनेजमेंट पर मजबूत पकड़ होने के कारण वे रीडर्स तक खबरें तेजी, गुणवत्ता और प्रामाणिकता के साथ पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं.रंजना कहार से आप ranjana.kahar@india.com पर ईमेल के माध्यम से सीधे संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा, एक्स (ट्विटर) और लिंक्डइन पर भी उनसे सीधा संवाद कर सकते हैं.
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES