)
मध्य प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल शिक्षा को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. राज्य सरकार करीब ₹4,000 करोड़ के निवेश से बने नौ सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत प्राइवेट सेक्टर को सौंपने की योजना बना रही है. इनमें नीमच, सिंगरौली और श्योपुर के कॉलेज शामिल हैं, जो पिछले दो सालों से चल रहे हैं और हर कॉलेज में 100 सीटें हैं. इसके अलावा, 18 कम्युनिटी हेल्थ सेंटर्स (CHCs) को भी PPP मॉडल के तहत सौंपने की तैयारी चल रही है.
9 मेडिकल कॉलेज को निजी हाथों में क्यों सौंप रही सरकार?
इस प्रस्ताव में नीमच, सिंगरौली, श्योपुर, मंडला, राजगढ़, बुधनी, छतरपुर और दमोह के कॉलेज शामिल हैं. इनमें से नीमच, श्योपुर, सिंगरौली, मंडला और राजगढ़ के कॉलेज केंद्र सरकार की प्रायोजित योजना के तहत बनाए गए हैं, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों सरकारों का योगदान है. इस फैसले पर बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब जमीन, भवन, अत्याधुनिक मशीनें और इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से सरकारी पैसे से तैयार हैं, तो इनका संचालन निजी कंपनियों को क्यों दिया जा रहा है?
जमीन-भवन-मशीनें सब सरकारी
दैनिक भास्कर रिपोर्ट के मुताबिक, PPP मॉडल में बदलने के बाद फैकल्टी के भविष्य को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. नीमच, श्योपुर, सिंगरौली, मंडला और राजगढ़ के कॉलेज एक केंद्र-प्रायोजित योजना के तहत बनाए गए थे, जिसमें हर कॉलेज की बिल्डिंग पर औसतन ₹325 करोड़ का खर्च आया था. इसमें केंद्र ने 60% और राज्य ने 40% खर्च उठाया था. इस लिस्ट में बुधनी (पूर्व मुख्यमंत्री का पुराना विधानसभा क्षेत्र), छतरपुर (सांसद VD शर्मा का संसदीय क्षेत्र) और दमोह (मंत्री प्रहलाद पटेल का विधानसभा क्षेत्र) के कॉलेज भी शामिल हैं. इन्हें राज्य सरकार के खर्च पर बनाया गया था.
4,000 करोड़ की लागत
मौजूदा कॉलेजों में लगभग ₹500 करोड़ का निवेश है. इस मूल्यांकन के आधार पर, लगभग ₹4,000 करोड़ की कीमत वाले सरकारी मेडिकल कॉलेजों को PPP (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के तहत सौंपने की तैयारी चल रही है. शुरुआती लिस्ट में देवास शामिल था, लेकिन बदले हुए प्रस्ताव में उसकी जगह दमोह को शामिल किया जा रहा है. इस काम के लिए सबसे पहले एक ट्रांजैक्शन एडवाइजर नियुक्त किया जाएगा.
18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी शामिल
कॉलेज के अलावा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत 18 कम्युनिटी हेल्थ सेंटर्स (CHCs) को सौंपने की तैयारी चल रही है. इनमें रीवा में 8, देवास में 4 और गुना में 6 CHC शामिल हैं.
75 दिन में तैयार करना होगा रोडमैप
एडवाइजर को 75 दिन में पूरा रोडमैप तैयार करना होगा. इसके बाद तकनीकी और वित्तीय बोली के आधार पर निजी कंपनी को चुना जाएगा. 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) के लिए भी यही समय-सीमा तय है. इस पर उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने कहा कि, पीपीपी मॉडल में कुछ बदलाव किए जा रहे हैं. नीति आयोग ने जो टेंडर डॉक्यूमेंट बनाया है, वही मप्र में लागू किया जाएगा. यह वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) से जुड़ा मॉडल है. पीपीपी मॉडल को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है.