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मध्य प्रदेश में 20 नवंबर को देवउठनी ग्यारस के मौके पर बाल विवाह रोकने को लेकर महिला एवं बाल विकास विभाग विशेष अभियान चलाएगा. इस दौरान सामूहिक विवाह आयोजनों पर खास नजर रहेगी. इसको लेकर सभी जिलों को अलर्ट किया गया है. जिला और ब्लॉक स्तर पर 24 घंटे कंट्रोल रूम सक्रिय रहेंगे. ग्राम और वार्ड स्तर पर सूचना दल बनाए जाएंगे. उड़न दस्ते विवाह स्थलों का निरीक्षण करेंगे. संवेदनशील परिवारों की पहचान कर बाल विवाह के कानूनी प्रावधानों की जानकारी और समझाइश दी जाएगी. पंचायतों और नगरीय निकायों में जनप्रतिनिधि बाल विवाह रोकने की शपथ लेंगे. स्कूलों, कॉलेजों और आंगनवाड़ी केंद्रों के जरिए जागरूकता अभियान भी चलाया जाएगा. बाल विवाह की सूचना हेल्पलाइन 181, चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 और आपातकालीन सेवा 112 पर दी जा सकेगी. बाल विवाह पाए जाने पर बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 के तहत कार्रवाई होगी.
देवउठनी ग्यारस पर बाल विवाह रोकने के लिए सरकार एक्शन में नजर आ रही है, लेकिन कड़े कानूनों और सरकारी तंत्र की मुस्तैदी के बावजूद बाल विवाह क्यों नहीं रुक रहा? हाल ही में केंद्रीय बाल विवाह और परिवार कल्याण विभाग की एक रिपोर्ट (2023-24) आई थी, जिसमें चौंकाने वाले खुलासे हुए थे. रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में 20 से 24 साल की लगभग 20% महिलाओं यानी हर 5वीं लड़की की शादी 18 वर्ष की उम्र पूरी होने से पहले ही कर दी गई थी. बाल विवाह में सबसे आगे मध्य प्रदेश का आगर-मालवा जिला है, जहां दर 49.4% है. दूसरे नंबर पर राजगढ़ (46%) जैसे जिले हैं, जहां स्थिति सबसे चिंताजनक है.
लड़कियों के हाथ में जिस उम्र में किताबें होनी चाहिए थी और पढ़ाई के जरिए भविष्य संवारने का मौका मिलना चाहिए था, उस उम्र में मध्य प्रदेश की मासूम बच्चियों को विवाह के बंधन में बांध दिया जाता है. केंद्रीय बाल विवाह एवं परिवार कल्याण विभाग की रिपोर्ट (2023-24) के अनुसार शहरी क्षेत्रों में बाल विवाह की दर 9 प्रतिशत है, लेकिन इसकी तुलना में ग्रामीण इलाकों में यह दर 23.4 प्रतिशत है.
साफ है कि गांवों पसरी गरीबी, साक्षरता की कमी, सामाजिक दबाव और जागरूकता की कमी से आज भी यह कुप्रथा थमने का नाम नहीं ले रही है. 'बेटी की शादी मतलब माता-पिता के ऊपर बोझ' ग्रामीण इलाकों में इस सामाजिक दबाव और रूढ़िवादी सोच भी इस कुप्रथा के मुख्य कारण हैं. बेटियां आज भी आर्थिक बोझ के रूप में देखी जाती हैं, जिससे जल्द से जल्द छुटकारा पाने के लिए सामाजिक परंपराओं का सहारा लिया जाता है.
मध्य प्रदेश के जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो आगर-मालवा की स्थिति सबसे ज्यादा डरावनी है और इस जिले में बाल विवाह की दर 49.4 प्रतिशत है. यह आंकड़ा डराने वाला है, क्योंकि जिले में लगभग आधी लड़कियों का बचपन 18 साल से पहले ही शादी के मंडप में छीन लिया जाता है.
कभी बाल विवाह के मामले में सबसे ऊपर पर रहने वाले राजगढ़ जिले में स्थिति में सुधार तो हुआ है, लेकिन आंकड़ा अब भी चिंताजनक है. राजगढ़ में बाल विवाह की दर अब भी 46 है. इसके अलावा छतरपुर (16.7%), बैतूल (16.2%), श्योपुर (14.2%), रीवा (13%) और दतिया (11%) में भी बाल विवाह के मामले लगातार सामने आ रहे हैं. इंदौर राज्य के सबसे विकसित जिलों में है, लेकिन इसके बावजूद यहां बाल विवाह की दर 11 प्रतिशत है.
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