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मध्य प्रदेश में हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई कराने की पहल तीन साल बाद सवालों के घेरे में आ गई है. सरकार ने देश में मेडिकल की पढ़ाई की भाषा बदलने की दिशा में इसे एक बड़े कदम के तौर पर शुरू किया था. इस प्रोजेक्ट पर लगभग ₹10 करोड़ खर्च किए गए और 16 विषयों की 50,000 हिंदी मेडिकल टेक्स्टबुक छापी गईं. इन किताबों के अनुवाद के लिए 300 से ज्यादा डॉक्टरों की एक टीम ने काम किया. अनुवाद पर करीब 2 करोड़, प्रिंटिंग पर 5.5 करोड़ और मेडिकल कॉलेजों में ‘मंदार’ केंद्रों पर करीब 3 करोड़ रुपए खर्च हुए. इतना सब करने के बाद भी, और पेपर दो भाषाओं में आने के बावजूद, पिछले 3 साल में एक भी छात्र ने हिंदी में परीक्षा नहीं दी है.
एमपी में हिंदी में मेडिकल का ये हाल!
तीन साल पहले प्रदेश में MBBS की पढ़ाई हिंदी में शुरू की गई थी, ताकि छात्रों के पास अंग्रेजी के साथ हिंदी का भी विकल्प हो. पढ़ाई को लेकर मेडिकल कॉलेजों में मंदार सेंटर बनाए गए थे और डॉक्टरों की टीमें अनुवाद के काम में दिन-रात जुटी हुई थीं. लेकिन तीन साल बाद हकीकत बिल्कुल उलट है. दैनिक भास्कर की एक ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से कई मंदार सेंटर अब बंद पड़े हैं. कार्यसमिति की बैठक पिछले एक साल से नहीं हुई है.
हिंदी में एक भी छात्र ने नहीं दी MBBS की परीक्षा
लेकिन सबसे बड़ा सवाल विद्यार्थियों के भरोसे को लेकर है. उनमें यह धारणा बन गई है कि हिंदी में परीक्षा देने से कम अंक मिल सकते हैं या शून्य अंक भी आ सकते हैं. इसी वजह से द्विभाषी प्रश्न-पत्र उपलब्ध होने के बावजूद पिछले तीन वर्षों में एक भी छात्र ने हिंदी में परीक्षा नहीं दी है. हालांकि इस पहल को देश में मेडिकल शिक्षा का माध्यम बदलने के लिए एक मॉडल के तौर पर पेश किया गया था और अलमारियों में पाठ्यपुस्तकें भी अच्छी तरह से सजाई गई थीं, लेकिन हिंदी के माध्यम से डॉक्टर बनने को लेकर छात्रों में वास्तविक आत्मविश्वास जगाने के लिए जरूरी व्यवस्था कभी नहीं बनाई गई.
10 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च
इस पर कुल 10 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हुए. अनुवाद पर 2 करोड़, किताबें छापने पर साढ़े 5 करोड़ और मंदार सेंटर पर 3 करोड़. 300 से ज्यादा डॉक्टरों ने 16 विषयों की किताबों का हिंदी में अनुवाद किया. पहले हर छात्र के लिए किताबें छापी जाती थीं, लेकिन अब सिर्फ 25 से 30% किताबें ही कॉलेजों की मांग पर दी जाएंगी. इतना ही नहीं एक ही योजना का असर हर जगह अलग है. रतलाम में डीन डॉ. अनीता मूथा हर साल किताब मेला लगाती हैं, इसलिए वहां 80% किताबें छात्रों तक पहुंच गई हैं. वहीं इंदौर मेडिकल कॉलेज में हिंदी की किताबें डिब्बों में ही बंद पड़ी हैं.
NMC ने मांगी रिपोर्ट
शुरुआत में इस योजना को लेकर खूब जोर था. सीएम और मंत्रियों ने 50 से ज्यादा बैठकें कीं, छात्रों से बात की और मंदार टीम का सम्मान भी किया. लेकिन पिछले 1 साल से इस पर कोई बैठक नहीं हुई है. शिक्षकों की ट्रेनिंग और किताबें बनाने का काम भी बंद पड़ा है. अब राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) ने मध्य प्रदेश सरकार से इस पूरी योजना की रिपोर्ट मांगी है. आयोग ने पूछा है कि हिंदी के सैंपल पेपर कैसे हैं, हिंदी में लिखी गई उत्तर-पुस्तिकाएं दिखाओ और कितने छात्रों ने हिंदी माध्यम चुना, इसका पूरा हिसाब दो.