छिंदवाड़ा जिला कलेक्टर के बंगले के पास बने मां सिद्धिदात्री के मंदिर का इतिहास काफी पुराना बताया जाता है. चैत्र नवरात्रि ही नहीं, बल्कि शारदीय नवरात्रि में भी यहां पर भक्तों की भारी भीड़ लगी रहती है. खासकर, महाष्टमी के दिन मां की पूजा अर्चना के लिए सुबह से ही मंदिर में भक्तों का पहुंचने लगते हैं. मान्यता ऐसी है कि यहां पर आने वाले भक्त मां से मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद लेते हैं.
दरअसल, मां सिद्धिदात्री मंदिर का इतिहास 1200 साल पुराना बताया जाता है. इस इतिहास के पीछे एक कहानी भी काफी प्रचलित है. यह कहानी अंग्रेजों से जुड़ी बताई जाती है. कहा जाता है कि इस मंदिर में सबसे पहले पिंडारियों के द्वारा पूजा-अर्चना की जाती थी, जो कि मराठा सेनाओं से जुड़े समूहों के रूप में जाने जाते थे. इसके बाद यह पूरा ग्रुप लूटपाट की घटनाओं के चलते मशहूर भी हुआ.
स्थानीय लोगों का मानना है, कि प्राचीन काल में यहां पर खुले आसमान में आम के पेड़ के नीचे शिलाओं के रूप में स्थापित किया गया था. इसके बाद अंग्रेजों ने इन शिलाओं को हटाने के लिए पूरा जोर लगा लिया. इतना ही नहीं, उन्होंने इसे हटाने के लिए आदेश भी दिया था. उस समय अंग्रेजों ने जिसे आदेश दिया था, उसका नाम महबूब भाई था. उसने डर के चलते अंग्रेजों के आदेश का पालन भी किया.
लोग बताते हैं कि महबूब भाई नाम के युवक ने शिलाओं को हटा दिया, लेकिन रात बीतने के साथ ही उसका पूरा शरीर पूरी तरह से सूज गया था. उसके बाद अगली सुबह जब वह किसी झाड़ फूंक करने वाले आलिम के पास पहुंचा तो उसने उससे किसी सिद्ध स्थान के साथ छेड़छाड़ की बात कही. इसके बाद महबूब भाई ने हटाई गई शिलाओं को दोबारा से स्थापित कर दिया. हालांकि, वह पूरी तरह से ठीक भी हो गया था.
ऐसा एक मामला 1951 में 1953 तक कलेक्टर रहे मथुरा प्रसाद द्विवेदी से जुड़ा बताया जाता है. कलेक्टर के हाथों के एक घटना होने के बाद दोबारा पूजा अर्चना की शुरुआत की. वहीं जब 1960 में यह प्रतिमा खंडित गई थी. उसके बाद यहां के तहसीलदार ने प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करवाई. लेकिन कुछ समय बाद फिर से प्रतिमा खंडित हो गई.
इसके बाद 23 नवंबर 1967 से 1971 तक कलेक्टर रहे हरिनारायण बनर्जी के कार्यकाल के दौरान उनकी पत्नी ने एक दुर्गा महिला मंडल का गठन कर दिया. मंडल के गठन होने के बाद मां की दूसरी प्रतिमा स्थापित की गई. कहा जाता है, कि यह प्रतिमा पहले कलेक्टर ऑफिस के नजारत शाखा में थी. जहां आज भी अधिकारी कुर्सी पर बैठने से पहले जूते, चप्पल उतार कर बैठते हैं. उसके बाद इस प्रतिमा को इसी मंदिर में स्थापित कर दिया था.