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सरायकेला खरसावां के चांडिल अनुमंडल के नीमडीह प्रखंड अंतर्गत बाड़ेदा पंचायत के शियालगोड़ा, काशीडीह, रापकाड़ा, भूषणडीह टोला में करीब 200 आदिवासी परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं. पुरुलिया-जमशेदपुर जिला के सीमावर्ती क्षेत्र पड़ता है .दोनों जिला को जोड़ने वाले सांसागडीह होते शियालगोड़ा तक जाने वाली मुख्य सड़क आजादी से अब तक कच्ची है. नाराज ग्रामीणों ने सोमवार (14 सितंबर) को निजी स्तर पर श्रमदान कर 3 KM सड़क का निर्माण किया. ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि आगामी चुनाव में हर गांव में बैरिकेटिंग कर सांसद, विधायक और अधिकारियों को घुसने नहीं देंगे और वोट मांगने से रोकेंगे.
'लिखित शिकायत देने के बाद भी कोई पहल नहीं'
क्षेत्र में संथाल, भूमिज, मुंडा समुदाय के लोग कृषि और दलमा जंगल पर निर्भर हैं. ग्रामीणों का कहना है कि झारखंड अलग हुए 26 वर्ष हो गए, लेकिन पक्की सड़क, बिजली, शुद्ध पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिली. बाड़ेदा स्वास्थ्य केंद्र 3-4 KM दूर है. कीचड़ भरे रास्ते में एम्बुलेंस नहीं पहुंचती. बरसात में हाथी, भालू, सांप-बिच्छू का खतरा रहता है. ईचागढ़ विधायक सविता महतो को लिखित शिकायत देने के बाद भी कोई पहल नहीं हुई. सोमवार को मुखिया वरुण कुमार सिंह सरदार के नेतृत्व में 200 से अधिक ग्रामीण कुदाल, गैंता लेकर सड़क निर्माण में जुटे. ट्रैक्टर से 10 हजार CFT मुरुम लाकर सड़क को चलने लायक बनाया गया. इस दौरान बलराम मंडी, श्याम प्रसाद हांसदा, जीतू बेसरा, राजू सोरेन सहित सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे.
'जमीनी स्तर पर कुछ भी दिखाई नहीं देता'
इस दौरान सहिया शांतिमाय मार्डी ने कहा कि मैं एक सहिया के तौर पर काम करती हूं. मैं बार-बार यह मुद्दा उठाकर थक चुकी हूं, फिर भी सड़क नहीं बनी है. एम्बुलेंस समय पर नहीं आतीं और महिलाओं को घर पर ही बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर होना पड़ता है. विधायक और मुख्यमंत्री दोनों ही आदिवासी हैं, फिर भी हमारी कोई नहीं सुनता. वहीं, राजू सोरेन ने कहा कि आदिवासियों ने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी थी, लेकिन हमें सच्ची आजादी नहीं मिली है. हमारे पास न तो सड़कें हैं, न पानी और न ही बिजली. मरीजों को तीन किलोमीटर तक कंधे पर उठाकर ले जाना पड़ता है और बच्चे स्कूल नहीं जा पाते. साथ ही, ग्रामीणों ने बताया कि इस तीन किलोमीटर लंबी सड़क की आधारशिला साधु महतो के कार्यकाल में रखी गई थी, लेकिन उसके बाद से कोई काम नहीं हुआ है. अखबारों में रोजाना आधारशिला रखने के समारोहों की खबरें छपती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ भी दिखाई नहीं देता.
रिपोर्ट: रंजीत कुमार ओझा