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जिस हाथ ने देश के लिए गोल्ड मेडल जीते, आज उसी हाथ में सब्जी की टोकरी है. रांची के अंतरराष्ट्रीय थ्रो बॉल खिलाड़ी अमरदीप कुमार आर्थिक तंगी के चलते सब्जी बेचने को मजबूर हैं. भारत के लिए चार गोल्ड मेडल जीत चुके इस खिलाड़ी का सपना आज भी मैदान पर लौटने का है, लेकिन आर्थिक मजबूरियां उनके रास्ते में खड़ी हैं. दरअसल, ये कहानी रांची के अरगोड़ा चौक की है. यहां पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रौशन कर चुके खिलाड़ी अमरदीप सब्जी बेचने को मजूबर हैं.
रांची के अरगोड़ा महावीर नगर के रहने वाले अमरदीप कुमार ने थ्रो बॉल में अपनी अलग पहचान बनाई. राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया और देश के लिए चार गोल्ड मेडल जीते. ये उपलब्धियां किसी भी खिलाड़ी के लिए गर्व की बात हैं, लेकिन इन उपलब्धियों के बाद भी परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं बदल सकी. घर की जरूरतें बढ़ीं, तो खेल के मैदान से दूरी बनती गई और आखिरकार रोजी-रोटी के लिए सब्जी बेचने का काम करना पड़ा.
अमरदीप ने बताया कि खेल के मैदान पर सफलता हासिल करने के बावजूद आर्थिक परिस्थितियां उनके साथ नहीं बदलीं. परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ीं, तो खेल को जारी रखना मुश्किल होता गया और धीरे-धीरे मैदान से दूरी बनती चली गई. मगर, थ्रो बॉल से जुड़ा सपना आज भी खत्म नहीं हुआ है. अमरदीप चाहते हैं कि उन्हें दोबारा मौका और सहयोग मिले, ताकि वह फिर अभ्यास शुरू कर सकें, मैदान पर लौट सकें और भारत के लिए खेलकर देश का नाम रोशन कर सकें.
दरअसल, इस कहानी के पीछे एक पिता का संघर्ष भी है. राम प्रसाद वर्ष 2007 से सब्जी बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं. परिवार में पांच सदस्यों की जिम्मेदारी है. आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन बेटे के सपनों को लेकर पिता ने कभी हिम्मत नहीं छोड़ी. उम्मीद थी कि बेटा पढ़ेगा, खेल में आगे बढ़ेगा और एक दिन देश के लिए मेडल जीतकर परिवार का नाम रोशन करेगा. बेटे ने मेहनत की और भारत के लिए चार गोल्ड मेडल भी जीते.लेकिन घर की आर्थिक मजबूरियां ऐसी रहीं कि आज पिता के साथ बेटे को भी सब्जी बेचनी पड़ रही है.
अमरदीप की जिंदगी आसान नहीं सवेरे उठने के साथ ही संघर्ष का पूरा दौर चल पड़ता है. फाइनेंस पर ली गई अर्टिगा को अमरदीप भाड़े पर चलाते है. महीना 19000 रुपए जमा करने के लिए अमरदीप को पाई-पाई इकट्ठा करना होता है. कैब चलने के साथ-साथ अमरदीप अपने पिता के साथ फुटपाथ पर सब्जी भी बेचते हैं और वक्त निकाल कर जयपाल से स्टेडियम पहुंचकर अपने गेम की प्रैक्टिस करते हैं.
बहरहाल, पिता और बेटे की उम्मीद अब सरकारी सहयोग पर टिकी है. परिवार चाहता है कि मदद और सही अवसर मिले, ताकि ये खिलाड़ी दोबारा थ्रो बॉल के मैदान पर लौट सके और भारत का प्रतिनिधित्व कर सके. चार गोल्ड मेडल जीतने वाले इस खिलाड़ी के हाथ में आज सब्जी की टोकरी जरूर है. मगर, आंखों में अब भी मैदान पर लौटने का सपना जिंदा है. जरूरत सिर्फ एक मौके की है, ताकि ये हाथ फिर सब्जी की टोकरी नहीं, थ्रो बॉल उठाएं और देश के लिए एक बार फिर मेडल जीतें, क्योंकि आने वाले वक्त में श्रीलंका में इंटरनेशनल टूर्नामेंट होने है.
रिपोर्ट: कामरान जलीली