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मेरठ के 'नीले ड्रम कांड' में आज अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए दोनों दोषियों (मुस्कान-साहिल) को सजा-ए-मौत दी है. मुस्कान ने अपने ब्वायफ्रेंड साहिल शुक्ला के साथ मिलकर अपने पति को मौत के घाट उतारा था. उसके बाद पति की लाश को तीन हिस्सों में काटकर नीले रंग के ड्रम के अंदर भर दिया था. साथ ही उसमें सीमेंट भर दिया था. घटना मार्च 2025 की है.
अदालत के इस फैसले के बाद कई लोगों के जेहन में सवाल आ रहा है कि क्या आज से पहले कभी किसी महिला को भारत के अंदर फांसी पर चढ़ाया गया है? तो इसके जवाब है हां. हालांकि, यह आंकड़ा कोई लंबा चौड़ा नहीं है. आजाद भारत में सिर्फ 1 बार महिला को फांसी के फंदे पर लटकाया गया है. जबकि ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं, जिन्हें अदालत के जरिए फांसी की सजा सुनाई गई है.
एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पहली बार 3 जनवरी 1955 को किसी महिला को फांसी दी गई थी. इस महिला का नाम रतनबाई था, जो तीन महिलाओं को जहर देकर मारने की मुजरिम थी. रतनबाई को शक था कि इन तीनों महिलाओं के उसके पति के अवैध संबंध थे. अदालत के फैसले के बाद रतनबाई को दिल्ली की तिहाड़ जेल में सजा-ए-मौत दी गई थी.

कहा जाता है कि रतनबाई उस जमाने में ऐसी महिलाओं में गिनी जाती थीं, जो अपने आप में हर लिहाज से पूरी तरह सक्षम थीं. रतनबाई दिल्ली के एक फर्टिलिटी क्लीनिक में मैनेजर के तौर पर काम करती थी. जैसे ही उसे यह शक हुआ कि उसके पति के अन्य महिलाओं के साथ भी गलत संबंध हैं, तो उसने उन्हें मारने के लिए जहर का उपयोग किया.
रतनबाई को पहले सेशन कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई. इसके बाद मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गया, लेकिन अपराध की क्रूरता को देखते हुए कोई राहत नहीं मिल पाई. जिसके बाद 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में रतनबाई जैन को फांसी दे दी गई. उसके बाद से आज तक भारत में किसी भी महिला को फांसी नहीं हुई है.
| महिला का नाम | मामला | मौत की सजा | बाद में क्या हुआ? |
|---|---|---|---|
| रेणुका शिंदे | बच्चों के अपहरण और हत्या का मामला | 2001 में ट्रायल कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई. | 18 जनवरी 2022: बॉम्बे हाई कोर्ट ने दया याचिका पर फैसले में देरी के आधार पर सजा उम्रकैद में बदल दी. |
| सीमा गावित | बच्चों के अपहरण और हत्या का मामला | 2001 में ट्रायल कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई. | 18 जनवरी 2022: बॉम्बे हाई कोर्ट ने दया याचिका पर फैसले में देरी के आधार पर सजा उम्रकैद में बदल दी. |
| सोनिया | रेलू राम पूनिया परिवार हत्याकांड, हरियाणा | 31 मई 2004 को हिसार की अदालत ने मौत की सजा सुनाई. | जनवरी 2014: सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका पर निर्णय में देरी के आधार पर मौत की सजा उम्रकैद में बदल दी. |
| शबनम | अमरोहा परिवार हत्याकांड, उत्तर प्रदेश | 2010 में ट्रायल कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई. | इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने सजा बरकरार रखी. दया याचिका भी खारिज हुई। फांसी पर अमल नहीं हुआ; सजा उम्रकैद में बदलने का फैसला नहीं हुआ है. |