जब भी दुनिया में कोई युद्ध छिड़ता है, तबाही मचती है या बेगुनाहों की जान जाती है, तो हर किसी की निगाहें संयुक्त राष्ट्र (UN) की तरफ उठती हैं. आखिर UN का गठन ही इसलिए किया गया था ताकि दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध से बचाया जा सके और वैश्विक शांति कायम रखी जा सके. लेकिन हाल के वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर मिडिल ईस्ट के संघर्षों तक, संयुक्त राष्ट्र एकदम लाचार और बेबस नजर आया है. इस लाचारी ने एक बार फिर UN की सबसे शक्तिशाली संस्था- सुरक्षा परिषद (UNSC) की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या UN सिर्फ भाषणों और बयानों तक सीमित रह गया है? वैश्विक रिपोर्टों और विशेषज्ञों की राय के बाद यह चर्चा बहुत तेजी से उठ रही है कि 5 देशों की मनमानी और वीटो पावर के खेल ने पूरी दुनिया को बंधक बना रखा है. ऐसे में भारत द्वारा उठाई जा रही सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता और सुधारों की मांग अब और भी अहम हो गई है.
हाल की ग्लोबल रिपोर्ट्स में संयुक्त राष्ट्र की ढांचागत कमियों पर करारी चोट की गई है. रिपोर्ट में मुख्य रूप से यह कहा गया है कि UN अपनी स्थापना के 80 साल बाद भी 1945 के पुराने ढर्रे पर चल रहा है. आज की वैश्विक जमीनी हकीकत 1945 से बिल्कुल अलग है, लेकिन UN का ढांचा पुरानी विश्व व्यवस्था में ही अटका हुआ है. रिपोर्ट्स के अनुसार, जब भी कोई बड़ा देश या उसका मित्र राष्ट्र किसी युद्ध में शामिल होता है, तो UN सुरक्षा परिषद कोई भी ठोस कदम उठाने में नाकाम साबित होती है. प्रस्ताव पारित होते हैं, बहस होती है, लेकिन कोई निर्णायक फैसला नहीं हो पाता. इसका सीधा असर UN की साख पर पड़ रहा है. दुनिया भर के छोटे और विकासशील देश अब UN को केवल एक 'टॉक शो' या भाषणों का मंच मानने लगे हैं, जिसके पास जंग रोकने का कोई वास्तविक अधिकार या इच्छाशक्ति नहीं बची है.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में कुल 15 सदस्य होते हैं. इनमें से 10 सदस्य अस्थायी होते हैं, जिन्हें दो-दो साल के लिए चुना जाता है. लेकिन असली ताकत बाकी के 5 स्थायी सदस्यों (P5) के पास है. ये 5 देश हैं- अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस. इन पांचों देशों को एक विशेष अधिकार मिला हुआ है, जिसे 'वीटो पावर' (Veto Power) कहा जाता है. वीटो का लैटिन में अर्थ होता है-'मैं इसकी इजाजत नहीं देता'
अगर सुरक्षा परिषद में 14 देश किसी प्रस्ताव या युद्ध रोकने के फैसले के समर्थन में वोट दें, लेकिन P5 में से कोई एक देश भी उस प्रस्ताव के खिलाफ वीटो का इस्तेमाल कर दे, तो वह प्रस्ताव वहीं खारिज हो जाता है. आसान शब्दों में कहें तो इन 5 देशों में से किसी भी एक देश के पास पूरे विश्व के फैसले को अकेले रोकने की असीमित ताकत है. द्वितीय विश्व युद्ध के विजेताओं ने अपने हितों की रक्षा के लिए इस व्यवस्था को बनाया था, जो आज पूरी दुनिया के लिए मुसीबत बन चुकी है.
वीटो पावर की वजह से ही सुरक्षा परिषद शांति स्थापित करने की अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी से चूक जाती है. जब भी दुनिया में कोई मानवीय संकट या युद्ध होता है, तो वीटो पावर का इस्तेमाल निष्पक्षता से नहीं, बल्कि इन पांचों देशों के अपने राजनीतिक और कूटनीतिक हितों के हिसाब से होता है. इसे कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है:
रूस-यूक्रेन युद्ध: जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तो सुरक्षा परिषद में रूस के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया. लेकिन रूस खुद P5 का हिस्सा है, इसलिए उसने अपने खिलाफ आए प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया.
इजरायल-गाजा संघर्ष: जब भी इजरायल की सैन्य कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय रोक या युद्धविराम का प्रस्ताव लाया जाता है, अमेरिका अपने दोस्त इजरायल के बचाव में वीटो का इस्तेमाल कर देता है.
आतंकवाद पर रुख: चीन अपने रणनीतिक साझेदार पाकिस्तान का बचाव करने के लिए अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों को वैश्विक आतंकी घोषित करने वाले प्रस्तावों पर बार-बार वीटो पावर लगा देता है.
नतीजा यह होता है कि जंग जारी रहती है, मासूम लोग मारे जाते हैं और UN असहाय बनकर देखता रहता है. वीटो पावर ने UN को शांतिदूत बनाने के बजाय पांच बड़े देशों का निजी अखाड़ा बना दिया है.
भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में सुधार और स्थायी सीट की मांग कर रहा है, और इसकी वजहें बेहद ठोस हैं:
आबादी और अर्थव्यवस्था: भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है और दुनिया की पांचवीं (जल्द ही तीसरी) सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. इतने बड़े जनसांख्यिकीय और आर्थिक प्रभाव वाले देश को वैश्विक फैसले लेने वाली मेज से बाहर रखना बेतुका है.
ग्लोबल साउथ की आवाज: UN का मौजूदा ढांचा अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के बड़े हिस्से का सही प्रतिनिधित्व नहीं करता. भारत 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) की एक मजबूत और विश्वस्त आवाज है.
शांति अभियानों में योगदान: UN के शांति अभियानों में भारत सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले देशों में से एक रहा है. भारत ने हमेशा वैश्विक शांति के लिए अग्रिम पंक्ति में काम किया है.
जिम्मेदार परमाणु शक्ति: भारत एक जिम्मेदार और शांतिप्रिय लोकतंत्र है, जिसने हमेशा अंतरराष्ट्रीय नियमों और संधियों का सम्मान किया है.
भारत का तर्क साफ है-21वीं सदी की समस्याओं का समाधान 20वीं सदी के पुराने और पक्षपातपूर्ण ढांचे से नहीं हो सकता. अगर UN को प्रासंगिक बने रहना है, तो भारत जैसे उभरते और जिम्मेदार देशों को सुरक्षा परिषद में स्थायी जगह देनी ही होगी.
सब कुछ साफ होने के बावजूद UN में सुधार करना और सुरक्षा परिषद का विस्तार करना बेहद पेचीदा और मुश्किल काम है. इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं:
P5 देशों की अपनी मनमानी: वीटो पावर का आनंद ले रहे 5 देश (विशेष रूप से चीन और कभी-कभी अन्य देश भी) अपनी शक्ति को बांटना नहीं चाहते. वे जुबानी तौर पर तो सुधारों का समर्थन करते हैं, लेकिन जब अमल करने की बात आती है तो पीछे हट जाते हैं.
संशोधन की कठिन प्रक्रिया: UN के नियम पुस्तिका (Charter) में बदलाव करने के लिए सुरक्षा परिषद के सभी 5 स्थायी सदस्यों की सहमति अनिवार्य है. यानी जिस वीटो पावर को खत्म या सीमित करना है, उसे बदलने के लिए भी उन्हीं देशों की मंजूरी चाहिए जिनके पास वीटो है!
क्षेत्रीय गुटबाजी: भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान (G4 देश) एक-दूसरे की स्थायी सदस्यता की मांग का समर्थन करते हैं. लेकिन उनके पड़ोसी देश या क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी इसका विरोध करते हैं. उदाहरण के लिए, चीन भारत और जापान का विरोध करता है, जबकि इटली और पाकिस्तान जैसे देश अपनी-अपनी क्षेत्रीय राजनीति के कारण विस्तार का विरोध करते हैं.
आज संयुक्त राष्ट्र जिस दोराहे पर खड़ा है, वहां से आगे जाने के दो ही रास्ते हैं- या तो वह अपनी व्यवस्था में व्यापक सुधार करे, या फिर इतिहास की उन संस्थाओं की तरह अप्रासंगिक हो जाए जो वक्त के साथ बदलने में नाकाम रहीं. वीटो पावर की इस बेतुकी व्यवस्था ने UN के पंख काट दिए हैं. जब तक 5 देशों के वीटो पर लगाम नहीं लगाई जाएगी और भारत जैसे लोकतांत्रिक व विशाल प्रभाव वाले देशों को सुरक्षा परिषद में बराबर का स्थान नहीं मिलेगा, तब तक UN जंग रोकने के मामले में ऐसे ही बेबस दिखाई देगा. दुनिया को आज एक ऐसे संयुक्त राष्ट्र की जरूरत है जो किसी एक देश या गुट के बजाय पूरी मानवता की भलाई और शांति के लिए निडर होकर काम कर सके.