उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन एक बार फिर चीन के दौरे पर हैं. उनकी यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब ग्लोबल पॉलिटिक्स का मिजाज काफी बदला हुआ है. एक तरफ जहां प्योंगयांग (उत्तर कोरिया) की नजदीकियां मास्को (रूस) के साथ अभूतपूर्व तरीके से बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ बीजिंग (चीन) के साथ अपने पुराने रिश्तों को फिर से मजबूत करने की कोशिशें की जा रही हैं. यह पूरी कवायद उस त्रिकोणीय रणनीति का हिस्सा है, जिसे प्योंगयांग 'नया शीत युद्ध' (New Cold War) करार दे रहा है.
किम जोंग उन की इस यात्रा को बेहद गोपनीय रखा गया है. उत्तर कोरियाई सरकारी मीडिया या चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई, लेकिन दक्षिण कोरियाई सरकार ने उनके चीन पहुंचने का दावा किया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, किम जोंग उन ने हाल ही में शुरू हुए 'न्यू यालू रिवर ब्रिज' (New Yalu River Bridge) के रास्ते चीनी सीमावर्ती शहर डांडोंग में प्रवेश किया.
डांडोंग में अचानक सुरक्षा इंतजाम कड़े कर दिए गए, होटलों की बुकिंग पर रोक लगा दी गई और सड़कों पर पाबंदियां लागू कर दी गईं. जापानी मीडिया द्वारा जारी फुटेज में एक बड़ा काफिला गुजरता दिखा, जिसे किम जोंग उन का ही माना जा रहा है. दक्षिण कोरियाई खुफिया सूत्रों का कहना है कि किम की यह यात्रा महज एक दिन की भी हो सकती है, जिसमें उन्होंने चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग से मुलाकात की है.
यह किम जोंग उन की 2011 में सत्ता संभालने के बाद से चीन की छठी यात्रा है. पिछले कुछ वर्षों में उत्तर कोरिया ने अपना ध्यान रूस के साथ सैन्य संबंध बढ़ाने पर केंद्रित कर रखा था, लेकिन अब वह चीन के साथ भी संतुलन बनाना चाहता है. हाल ही में न्यू यालू रिवर ब्रिज का खुलना इस बात का संकेत है कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध फिर से तेजी पकड़ रहे हैं.
यह यात्रा 25 अक्टूबर की उस ऐतिहासिक तारीख से ठीक पहले हो रही है, जब 1950 में चीनी सैनिकों ने कोरियाई युद्ध में उत्तर कोरिया की मदद के लिए कदम रखा था. दोनों देश इस साझा इतिहास को अपनी रणनीतिक मजबूती के रूप में इस्तेमाल करते आए हैं. इससे पहले चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्योंगयांग यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने व्यापार, कृषि, निर्माण और तकनीक के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई थी. तब किम ने चीन के साथ रिश्तों को उत्तर कोरिया की 'सर्वोच्च रणनीतिक प्राथमिकता' बताया था.

'न्यू यालू रिवर ब्रिज' (New Yalu River Bridge) चीन और उत्तर कोरिया को जोड़ने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक पुल है. यह पुल 15 अक्टूबर 2026 को आधिकारिक रूप से कार्गो ट्रकों के लिए खोला गया है, जो करीब 12 साल के लंबे इंतजार और देरी के बाद शुरू हुआ है. इस पुल की लंबाई 3 किलोमीटर है. यह पुल चीन के उत्तर-पूर्वी सीमावर्ती शहर डांडोंग (Dandong) को उत्तर कोरिया के शहर सिनोईजू से जोड़ता है.
4-लेन का पुल: यह एक आधुनिक फोर-लेन केबल-स्टेयड ब्रिज है, जिससे दोनों दिशाओं में एक साथ भारी वाहनों की आवाजाही हो सकती है.
केवल माल ढुलाई: फिलहाल इस पुल का उपयोग सिर्फ व्यावसायिक और व्यापारिक कार्गो ट्रकों के आवागमन के लिए किया जा रहा है. यात्रियों के लिए पुराना रेल-रोड पुल ही इस्तेमाल होगा.
ट्रैफिक जाम से मुक्ति: इससे पहले दोनों देशों के बीच 1937 (या 1943) में बना पुराना 'Sino-Korean Friendship Bridge' इस्तेमाल होता था. वह सिंगल-लेन होने के कारण बेहद संकरा था, जिसमें वाहन एक समय में केवल एक ही दिशा में आ-जा सकते थे. नया पुल इस दबाव को पूरी तरह खत्म कर देगा.
व्यापार में भारी उछाल: विशेषज्ञों का मानना है कि इस फोर-लेन पुल के चालू होने से दोनों देशों के बीच माल ढुलाई की क्षमता 3 से 4 गुना तक बढ़ जाएगी, जिससे द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक संबंधों को नई गति मिलेगी.
चीन, उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और सहयोगी है. इस पुल का खुलना दोनों देशों के मजबूत होते रिश्तों का प्रतीक है. इसके उद्घाटन के तुरंत बाद, अक्टूबर 2026 में ही उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन ने भी इसी पुल को पार कर डांडोंग का दौरा किया.
पिछले कुछ समय में उत्तर कोरिया और रूस के संबंध बेहद गहरे हुए हैं. यूक्रेन युद्ध में उत्तर कोरिया ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को हजारों सैनिक और पारंपरिक हथियार मुहैया कराए हैं. इसके बदले में मास्को से प्योंगयांग को आर्थिक मदद और अपडेटेड आर्मी टेक्नीक मिलने की संभावना जताई जा रही है. हालांकि, रूस के साथ इस हद तक जुड़ाव के बावजूद किम जोंग उन जानते हैं कि चीन को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था काफी हद तक चीन पर निर्भर है. ऐसे में मास्को और बीजिंग दोनों के साथ एक साथ संबंध साधकर किम अपनी स्थिति को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत रखना चाहते हैं.
अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच 2019 में वार्ता टूटने के बाद से कोई खास कूटनीतिक प्रगति नहीं हुई है. प्योंगयांग ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका अपनी 'शत्रुतापूर्ण नीति' और परमाणु परीक्षण के विरोध की शर्त को नहीं छोड़ता, तब तक बातचीत संभव नहीं है. दूसरी ओर, किम जोंग उन ने दक्षिण कोरिया के प्रति बेहद कड़ा रुख अपनाया हुआ है. हालांकि, दक्षिण कोरियाई खुफिया एजेंसियों की अटकलों के मुताबिक, आने वाले एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी नेतृत्व और किम के बीच बातचीत की 50% संभावना जताई जा रही है.
किम जोंग उन की यह चीन यात्रा केवल दो पड़ोसी देशों की सामान्य मुलाकात नहीं है. यह अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ बन रहे एक नए कूटनीतिक मोर्चे का हिस्सा है. उत्तर कोरिया, चीन और रूस-तीनों ही देश अलग-अलग कारणों से वाशिंगटन के दबाव का सामना कर रहे हैं. चीन के साथ संबंधों को ताजा करके और रूस के साथ सैन्य गठजोड़ बनाए रखकर, किम जोंग उन यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि उत्तर कोरिया को अलग-थलग न किया जा सके. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह नया समीकरण वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा को किस दिशा में ले जाता है.