बीकानेर हाउस विवाद: क्या फोटोग्राफर रेहान वाड्रा से चूक हो गई या यह सियासत में वारिस का नया उदय है?
क्या रेहान वाड्रा विरासत के बोझ तले दब गए? कैमरे के पीछे एक आजाद कलाकार था या राहुल-प्रियंका का वारिस? आइए जानते हैं बीकानेर हाउस से उनके द्वारा क्लिक की गईं 70 तस्वीरें हटते ही बवाल क्यों मचा?
रेहान वाड्रा एक सुंदर और स्वतंत्र इमेज बना सकते थे, लेकिन चूक गए. संभवतः रेहान विरासत के बोझ से दब गए. दिल्ली आंदोलन पर उनकी तस्वीरें उन्हें संवेदनशील और अव्वल कलाकार के रूप में स्थापित कर सकती थीं, बशर्ते वे कैमरे के पीछे से निरपेक्ष होकर देख पाते. लगता है कि रेहान ने दिल्ली आंदोलन को प्रियंका के बेटे और राहुल के भांजे होकर देखा.बीकानेर हाउस में उनकी फोटो प्रदर्शनी पर विवाद की जगह उनकी तस्वीरों की चर्चा होनी चाहिए थी. तस्वीरों की गहराइयों पर बात होनी चाहिए थी. उन तस्वीरों के पीछे के फोटोग्राफर की पारदर्शिता दिखनी थी, लेकिन फोटोग्राफी, फोटो प्रदर्शनी और उसके बाद रेहान की तरफ से आए बयानों में वह प्रभावी रूप से नेहरू-गांधी परिवार की एक विरासत की शक्ल में दिखे.
दिल्ली में पिछले दिनों तक आंदोलनों की एक सीरीज चलती है. अलग-अलग समूह, संगठन और दल अलग-अलग वक्त में और तारीखों पर सड़क पर उतरते हैं. सरकारी सिस्टम से उलझते हैं. उन्हें चुनौती देते हैं. मांगें रखते हैं. ठीक इसी वक्त एक इंडिविजुअल भी इस पूरे आंदोलन में शामिल होता है लेकिन अलग तरीके से. वह न आंदोलनकारियों के साथ सड़क पर होता है और न ही उनसे निपट रहे सिस्टम के साथ उसी सड़क पर दूसरी ओर. वह एक कैमरे के साथ होता है. सब-कुछ कैमरे के पीछे से देखता है, उन्हें उतारता चला जाता है. उस फोटोग्राफर का नाम है रेहान वाड्रा. उसकी दो पहचान होती हैं- 1. फोटोग्राफर की और 2. नेहरू-गांधी परिवार से जुड़े उसके जैविक संबंधों की.
यहीं एक बड़ा द्वंद्व कुछ सवालों की शक्ल में खड़ा होता है कि जब आंदोलन खत्म होगा, लोग उसकी तस्वीरों को देखेंगे तो रेहान के व्यक्तित्व के इस पब्लिक साक्षात्कार को किस रूप में देखेंगे? एक अव्वल फोटोग्राफर और कलाकार की शक्ल में या नेहरू-गांधी परिवार के वारिस के रूप में?
रेहान नाम का ये फोटोग्राफर दिल्ली के पूरे आंदोलन (छात्र आंदोलन) को अपने कैमरे की लेंस से देखता है. तस्वीरें कैद करता है. फोटोग्राफी के धर्म और मर्म उसे तमाम पक्षों को अपने कैमरे में कैद करने के लिए बाध्य करते हैं. संभवतः वह ऐसा करता भी है, लेकिन जब उसकी खींची तस्वीरें प्रदर्शनी की शक्ल में पब्लिक में आती हैं तो उसमें एक खास पैटर्न दिखता है. तस्वीरों में हिरासत में लिए जाते आंदोलनकारी हैं. प्रदर्शनकारियों से सख्ती करते पुलिस वाले हैं. कुल मिलाकर प्रदर्शनकारियों का प्रतिरोध और प्रतिकार करता एक सिस्टम है और उससे लड़ते-भिड़ते, अपना पक्ष रखते प्रदर्शनकारी हैं. फोटोग्राफर कैमरे के पीछे से अपनी मां को भी देख रहा होता है. मामा को भी. इन दोनों के साथ चल रहे सैकड़ों-हजारों लोगों से भी वह फोटो संवाद करता है.
रेहान से कुछ मिस हो गया क्या?
यकीनन वह इस दौरान जख्मी होते पुलिस वालों को भी देखता है. बाजार बंद होने से बेबस दुकानदारों को भी और छोटे-छोटे उन कामगारों को भी जिनकी एक, दो या कुछ दिनों की दिहाड़ी इस आंदोलन की वजह से ठप हो जाती है, लेकिन जब ये 'फोटो कलाकार' अपनी कला (फोटोग्राफी) को पब्लिक के बीच ले जाता है, तो सेलेक्टिव हो जाता है. उसकी तस्वीरों में उसकी मां दिखती हैं. मामा दिखते हैं. उनके साथ खड़े लोग दिखते हैं और इन सबका संघर्ष भी दिखता है, लेकिन वे दिखकर भी नहीं दिखते, जो इनसे अलहदा दूसरे पक्ष में खड़े हैं.
कलाकार रेहान Vs नेहरू-गांधी परिवार का युवा
फोटो कलाकार रेहान से दिल्ली में हो रहे प्रदर्शनों को समग्रता से देखने की अपेक्षा थी, लेकिन नेहरू-गांधी परिवार का ये युवा कलाकार अपने प्रोफेशन या पैशन को अंजाम देते हुए इस जैविक रिश्ते को दरकिनार नहीं कर पाया. तभी आरोप है कि उनके कुछ फोटोग्राफ्स प्रदर्शनी में स्थान पाने के योग्य नहीं हैं. खासतौर से मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनजर. यकीनन इस पर अलग से बहस हो सकती है कि जिन मौजूदा परिस्थितियों का हवाला बीकानेर हाउस दे रहा है वैसा कुछ वाकई है भी या नहीं?
अगर बीकानेर हाउस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए ऐसी किसी काल्पनिक मौजूदा परिस्थिति की कल्पना की होगी, तो निश्चित तौर पर ये गंभीर है. इसके एवज में बीकानेर हाउस के प्रबंधन से सवाल-जवाब बनता है और आपत्तियों के लिए भी जगह है, जैसा कि रेहान वाड्रा ने कहा और किया भी है.
बीकानेर हाउस ने रेहान को बायस दिखने से बचा लिया?
खैर, हम यहां रेहान का आकलन सिर्फ उनकी फोटोग्राफी और स्वतंत्र सोच के पैमाने पर कर रहे हैं. ऐसे में अगर बीकानेर हाउस ने उनकी 70 (अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट में संख्या में कुछ फर्क है) तस्वीरों को हटा दिया तो संभव ये भी है कि ऐसा कर बीकानेर हाउस ने फोटोग्राफर रेहान को एक हद तक प्रोटेक्ट ही कर लिया. क्योंकि एकतरफा तस्वीरों की श्रृंखला उनकी पारदर्शिता पर सवाल भी उठा सकती थी.
जिन युवाओं के कायल हुए थे राहुल....
प्रदर्शन के दौरान पिछले दिनों सत्ता पक्ष से जुड़े कुछ नेताओं और अफसरों के बच्चे भी सड़क पर उतरे. तब राहुल समेत तमाम विपक्षी नेता इन जेन-Z के बड़े कायल दिखे. उनकी अपनी अलग पहचान के लिए उन्हें बड़ी सकारात्मक चर्चा भी मिली. राहुल-प्रियंका के परिवार के जेन-Z यानी रेहान अगर अपनी फोटोग्राफी में अपनी कला के धर्म पर रिश्तों का वजन न आने देते तो यकीनन उनकी कला और निखरकर आती, चर्चा उसकी हो रही होती, न कि उनकी फोटो प्रदर्शनी के विवादों की. रेहान शायद चूक गए क्योंकि दिल्ली की सड़कों पर आंदोलन को देख रहा शख्स एक पारखी फोटोग्राफर से पहले प्रियंका गांधी का बेटा, राहुल का भांजा और नेहरू-गांधी खानदान का युवा था.
बीकानेर हाउस के रास्ते वारिस का उदय!
तस्वीरें हटाए जाने पर रेहान ने आपत्ति की. तर्क दिया कि उनकी तस्वीरों में नारे या स्पष्ट राजनीतिक संदेश नहीं थे. सिर्फ युवाओं के विरोध को कैमरे में उतारा था. उद्देश्य सिर्फ आंदोलनों का डॉक्यूमेंटेशन था. बकौल रेहान- "यहां तक कि उन्होंने तिरंगे की दो तस्वीरें भी हटाने के लिए कहा. लेकिन मैंने (रेहान ने) मना कर दिया. मैं भारतीय ध्वज की तस्वीर नहीं हटाऊंगा." रेहान की इन पंक्तियों के बीच पढ़ने की कोशिश करें तो कुछ धुंधली-सी नई कहानी जरूर दिखती है. ऐसी प्रदर्शनियों के लिए प्रतिष्ठित बीकानेर हाउस में रेहान की फोटो प्रदर्शनी लगती है.
फोटोग्राफर रेहान के लिए ये गौरव का पल है. लेकिन अब चर्चा उनकी फोटोग्राफी की नहीं हो रही. उनकी तस्वीरों में उतारी गई घटनाओं के भीतर झांकने और आंकने की कोशिश नहीं हो रही.
बात हो रही है कि 70 तस्वीरें क्यों हटीं? और इसी बातचीत के बीच रेहान का जो तर्क आता है उसमें दमदारी है, अपनी मनवाने की जिद है, सिस्टम पर सवाल है और हां, तिरंगे की ढाल भी है. ऐसे में मौजूं सवाल है कि क्या दिल्ली के बीकानेर हाउस से नेहरू-गांधी परिवार की विरासत के नए राजनीतिक चेहरे का उदय हो चुका है? संयोग ये भी है कि रेहान उसी जेन-Z से आते हैं, जो इन दिनों राहुल की राजनीति के बिल्कुल केंद्र में हैं.
फोटोग्राफी और पेंटिंग: अभिव्यक्ति के अद्भुत टूल्स
इन दिनों जिन कुछ मुद्दों की सबसे अधिक चर्चा है उनमें एक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है. जब अभिव्यक्ति की बात आती है तो फोटोग्राफी और पेंटिंग्स को इसके बेहतरीन टूल्स माना गया है. तभी तो बहुत पुरानी और अनेकानेक बार दोहराई गई पंक्ति है कि- एक तस्वीर हजारों शब्दों से अधिक बयां कर जाती है. पेंटिंग और फोटोग्राफी हर कोई नहीं कर सकता. यहीं पर कोई टोक सकता है कि ये बात पेंटिंग के लिए भले जायज हो, फोटो भला कौन नहीं उतार सकता. कैमरे से देखा, बटन प्रेस किया और हो गई फोटोग्राफी ! नहीं! ये फोटोग्राफी नहीं है. फोटोग्राफी तो कहीं-न-कहीं पेंटिंग से भी मुश्किल विधा है. इसमें आपको दिए हुए ऑब्जेक्ट्स में से उससे भी ज्यादा सेलेक्ट करना होता है, जितना कि वह है. जितना कि आपके कैमरे के उस पार है.
जिसे रेहान का कैमरा नहीं देख पाया!
पिछले दिनों की एक घटना को याद कीजिए और अपने जेहन में एक अवस्था पैदा कीजिए. विपक्षी नेताओं को साथ लेकर निकले राहुल और प्रियंका आकाशवाणी भवन में एंटर कर जाते हैं. इस वजह से वह हिरासत में लिए जाने से बच निकलते हैं. जबकि बाकी अधिकतर विपक्षी नेता हिरासत में ले लिए जाते हैं. इसके बाद घटनास्थल पर लाइमलाइट में होते हैं सिर्फ राहुल-प्रियंका और दूसरे कांग्रेसी नेता. यहां एक फोटोग्राफर राहुल-प्रियंका के साथ अगर उन नेताओं की बेबसी भी दिखाना चाहे, जो हिरासत में ले लिए जाने की वजह से लाइमलाइट और सुर्खियों से गायब हो गए, तो कितनी मुश्किलें पेश आएंगी. जबकि पेंटिंग करने वाला राहुल-प्रियंका की घटनास्थल पर मौजूदगी और बाकी विपक्षी नेताओं की नेपथ्य में बेबसी को अपेक्षाकृत कम मेहनत के साथ कैनवास पर उतार सकता है.
रेहान ने पता नहीं कैमरे के पीछे से कितना देखा. और इस देखने में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि कितनी आड़े आई, ये वही सबसे बेहतर बता सकते हैं. लेकिन बीकानेर हाउस जिन शिकायतों के साथ खड़ा है, उसे यदि सच मानें तो रेहान के फोटोग्राफी धर्म पर कुछ सवालों की जगह जरूर है. हालांकि आखिरी फैसले का अधिकार फोटोग्राफर के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है कि वह क्या देखना चाहता है. अपनी दृष्टि में अपनी कल्पनाशीलता का एडवांटेज जोड़कर क्या, कितना और किस रूप में दिखाना चाहता है?
बीकानेर हाउस के बाद रेहान
रेहान की खींची गई कई तस्वीरें बीकानेर हाउस से नहीं हटाई जातीं, तो आज हम उनकी चर्चा नहीं कर रहे होते. एक फोटोग्राफर सिर्फ अपनी विधा के जरिए ऊंचाइयों को छूना चाहता है, चर्चा में आना चाहता है. अपनी कला का मुरीद अपनी काबिलियत से पैदा करता है. लेकिन इस विवाद की वजहों (उनके फोटोग्राफ्स) और उसके बाद रेहान की तल्ख टिप्पणियों को भी शायद समझने की जरूरत है, जैसा कि हमने ऊपर समझने की कोशिश भी की. क्योंकि इस घटना को अगर हम इंडिविजुअल कैपेसिटी में राजनीति के साथ उनका पहला हैंडशेक मानें, तो एक नई शुरुआत होती हुई भी दिख गई है और रेहान के शुरुआती तेवर भी दिख रहे हैं.
बहुपक्षीय फोटोग्राफर से एकपक्षीय राजनीति में प्रस्थान?
जिन्होंने रेहान की पिछली फोटो प्रदर्शनियों को देखा है उनमें से कई लोग उनके खासे कायल हैं. कहा जाता है कि वे किसी ऑब्जेक्ट या इंसान को सिर्फ कैमरे में दर्ज कर लेने तक सीमित नहीं रहते. उनकी तस्वीरें जो कुछ सामने है उतने भर को कैद नहीं करतीं, बल्कि उसकी गहराइयों का भी अहसास कराती रही हैं. यानी वे बतौर फोटोग्राफर चीजों के सभी पक्षों को देखते रहे हैं. लेकिन पहली बार उन पर एक ही पक्ष को देखने के आरोप लगे हैं. क्या ये वाकया तस्वीर के सभी पक्षों की कद्र करने वाले फोटोग्राफर रेहान का एकपक्षीयता में विश्वास करने वाली राजनीति की ओर प्रस्थान है?
'नो आइडिया इज फाइनल'
बीकानेर हाउस में अपनी फोटो प्रदर्शनी को रेहान ने टाइटल दिया- 'नो आइडिया इज फाइनल'. यानी 'कोई भी विचार अंतिम नहीं है'. इस टाइटल के पीछे की वजह भी उन्होंने खुद बताई है. प्रदर्शनी तैयार करते समय उनके विचार लगातार बदल रहे थे. पहले उन्होंने एक तरह की प्रदर्शनी बनानी चाही, फिर दूसरी तरह की. इसी कश्मकश में उन्होंने प्रदर्शनी का नाम ही दे दिया- 'नो आइडिया इज फाइनल'. आखिरकार प्रदर्शनी के जिस आइडिया से वे खुद को सहमत कर पाए उसकी समग्रता को बीकानेर हाउस ने नकार दिया. रेहान विचारों में बंधकर नहीं रहना चाहते. अच्छा है, अब राजनीति कहां कभी विचारों में बंधकर रहती है. 'नो आइडिया इज फाइनल.' येन-केन-प्रकारेण जो आइडिया सत्ता दिला दे, उस वक्त वही फाइनल!