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चुनाव आयोग विवाद को लेकर भारतीय जनता पार्टी की तरफ से प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए सांसद संबित पात्रा ने कहा कि विचारों का आदान प्रदान अच्छे लोकतंत्र की निशानी है. देश की जनता ने विपक्ष को खारिज कर दिया है. साथ ही उन्होंने पूर्व चुनाव आयुक्त नवीन चावला की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठाए. भाजपा सांसद ने कहा कि वह चुनाव आयोग की तरफ से सफाई देने नहीं आए हैं, बल्कि आयोग की ओर से जारी प्रेस नोट लेकर आए हैं और उन्होंने उसे पढ़ा है.
संबित पात्रा ने कहा कि 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद विपक्षी दल एक-एक कर चुनावी मैदान में कमजोर होते गए. संबित पात्रा के मुताबिक, विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक तरीके से स्वीकार करने के बजाय संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना शुरू कर दिया. पात्रा ने आगे कहा कि कांग्रेस को यह महसूस हो गया कि वह चुनाव नहीं जीत सकती, इसलिए उसके पास देश की संस्थाओं को निशाना बनाने का रास्ता बचा. उन्होंने कहा कि इसी अभियान के तहत अब कई विपक्षी दल चुनाव आयोग को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं.
संबित पात्रा ने चुनाव आयोग के तीनों आयुक्तों के बीच हुई बातचीत और विचार-विमर्श का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि अगर तीनों चुनाव आयुक्त एक-दूसरे से बात न करें, अपने विचार साझा न करें और हर बात पर एक-दूसरे से सहमत होते रहें, तो विपक्ष इसे तानाशाही बताता है. उन्होंने कहा कि विपक्ष का आरोप होता है कि सरकार ने तीनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की है और वे सरकार की हर बात पर सहमति जताते हैं. पात्रा ने इसी संदर्भ में विपक्ष की तरफ से मीडिया के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले 'गोदी मीडिया' शब्द का भी जिक्र किया.
पात्रा ने कहा कि अब चुनाव आयुक्तों के बीच 14 मौकों पर आधिकारिक पत्राचार और विचार-विमर्श सामने आया है. उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए कहा कि तीनों आयुक्तों के बीच आधिकारिक विचार-विमर्श होना स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है. उन्होंने कहा कि बीजेपी ने मीडिया में यह खबर नहीं प्लांट की कि तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच आधिकारिक डेलिब्रेशन हुआ है. उनके मुताबिक, आयोग के अंदर इस तरह का विचार-विमर्श होना स्वाभाविक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है.
बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने EC-SIR विवाद को लेकर कहा कि चुनाव आयोग ने अपने प्रेस नोट के पहले ही पैराग्राफ में स्थिति साफ कर दी है. उन्होंने कहा कि सभी आधिकारिक लोकतांत्रिक विचार-विमर्श के बाद SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को सर्वसम्मति से लागू किया गया. संबित पात्रा के मुताबिक, SIR को लेकर तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच कोई मतभेद, असहमति या विरोध नहीं था. उन्होंने कहा कि तीनों चुनाव आयुक्त इस फैसले पर एकमत थे और सभी की राय एक जैसी थी. पात्रा ने जोर देकर कहा कि आधिकारिक विचार-विमर्श के बाद SIR पर तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति थी और फैसले को लेकर उनके बीच किसी तरह का मतभेद सामने नहीं आया.
बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने EC-SIR विवाद के बीच विपक्ष के ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाएं लोकतांत्रिक तरीके से काम कर रही हैं और लोकतंत्र की रक्षा कर रही हैं. पात्रा ने पश्चिम बंगाल की मिसाल देते हुए कहा कि विपक्ष का आरोप है कि वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने की वजह से बीजेपी चुनाव जीती और विपक्ष हारा. उन्होंने कहा कि इस दावे को आंकड़ों के जरिए परखा जाना चाहिए.
पात्रा ने द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल की उन 20 विधानसभा सीटों का विश्लेषण किया गया, जहां सबसे ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाए गए थे. उनके मुताबिक, इन 20 सीटों में TMC ने 13, कांग्रेस ने 1 और बीजेपी ने 6 सीटें जीती थीं. उन्होंने इसी आंकड़े की बुनियाद पर विपक्ष के ‘वोट चोरी’ के आरोप पर सवाल उठाते हुए कहा कि वोटर लिस्ट से नाम हटना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि इससे बीजेपी को चुनावी फायदा मिला.
बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने आगे कहा,'आज मैं आपके साथ नवीन चावला की कहानी साझा करना चाहता हूं. एक हेडलाइन सामने आई थी, जिसमें कहा गया था कि सोनिया गांधी ने नवीन चावला को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया. 2005 में सोनिया गांधी ने नवीन चावला को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया था. सोनिया के पास क्या अधिकार था? कांग्रेस पार्टी ने 2009 के लोकसभा चुनावों की जिम्मेदारी नवीन चावला को सौंपी थी और पार्टी चुनाव जीत गई. उस समय राहुल गांधी संसद में भी थे. तब वह टी-शर्ट पहनकर प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते थे, लेकिन आज वह प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए सामने आए हैं.
पात्रा ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में हुए बदलाव का जिक्र करते हुए कहा,'आज आपने एक बड़ा बदलाव देखा है: भारत की आजादी से लेकर 2023 तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सीधे प्रधानमंत्री के जरिए अपनी इच्छा और पसंद के आधार पर की जाती थी. अब एक समिति गठित की गई है, जिसमें नेता प्रतिपक्ष (LOP) भी शामिल हैं, ताकि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के संबंध में उनके विचारों को भी ध्यान में रखा जा सके.'