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लेफ्ट, ललकार और लाइमलाइट: क्या कांग्रेस लगाएगी नेहा बोरा पर दांव? मगर क्यों सता रहा 'कन्हैया फैक्टर' का डर

AISA की नेता नेहा बोरा एसआईआर और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों में गांधी परिवार के साथ नजर आईं. इतना ही नहीं, उनको राहुल गांधी की ओर से आयोजित चाय पार्टी में भी देखा गया. कयास लग रहे हैं कि पार्टी उनको अहम जिम्मेदारी दे सकती है. लेकिन क्यों कई नेता कन्हैया जैसा हाल होने से डर हैं. चलिए समझते हैं.

Written By Rachit Kumar
Published: Oct 14, 2026, 02:03 PM IST | Updated: Oct 14, 2026, 02:18 PM IST
Image Credit: नेहा बोरा क्या युवाओं को अपनी ओर खींच पाएंगी.
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर में गड़बड़ी को लेकर हो रहे प्रदर्शनों में एक चेहरा काफी लाइमलाइट में रहा. इंडिया ब्लॉक की प्रेस कॉन्फ्रेंस हो या फिर गांधी परिवार के सदस्य, उनके साथ कंधे के कंधा मिलाकर चल रहे थे. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी उनसे बार-बार मीडिया से बात करने को कहा. हम बात कर रहे हैं जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) की युवा AISA नेता नेहा बोरा की. इसे कांग्रेस के लिए युवा वोटरों को लुभाने की नई रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.

कांग्रेस को युवा नेता की जरूरत

जब जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का विरोध-प्रदर्शन हुआ तो पार्टी को यह लगा कि युवाओं के बीच उसकी पकड़ उतनी नहीं है. लिहाजा, अब राहुल गांधी ने स्ट्रैटेजी बदली है. वह खुद को जेन-जी के बीच स्थापित करने की कोशिश में लगे हैं. वे इंस्टाग्राम का यूज कर रहे हैं, छात्रों की गूंज जैसे प्रोग्राम्स में कैजुअल शर्ट पहने दिखते हैं. म्यूजिक व युवा संपर्क कार्यक्रमों के जरिए इन्फ्लुएंसर्स से कनेक्ट कर रहे हैं. लेकिन इन सबके बावजूद पार्टी में एक ऐसे युवा की कमी थी, जो अच्छे से यूथ के बीच पार्टी की बात रख सके, छात्रों से कनेक्ट कर सके और पार्टी में वह खोई हुई एनर्जी भर सके.

एक वक्त पर यह खाली जगह भरने के लिए कन्हैया कुमार मुफीद लगते थे. जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके कन्हैया कुमार बेबाकी से बात रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं. माना गया कि वह युवाओं को कांग्रेस से कनेक्ट करने में मदद कर सकते हैं. लेकिन चुनाव हारने और दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनावों में इंचार्ज के तौर पर एनएसयूआई को जीत दिलाने में नाकाम रहने के कारण वह पार्टी में फिलहाल साइडलाइन चल रहे हैं.

क्या मिलेगी अहम भूमिका?

लेकिन अब उनकी जगह नेता बोरा भरती नजर आ रही हैं. राहुल गांधी ने इंडिया ब्लॉक की चाय पार्टी का आयोजन किया तो नेहा बोरा की मौजूदगी ने वहां लोगों का ध्यान खींचा. वह राहुल गांधी के साइड में ही बैठी थीं. उन्होंने इस दौरान छात्रों को बताया कि क्यों कॉलेजों को सियासी बातचीतों को शामिल करना जरूरी है. गांधी परिवार के साथ उनकी बढ़ती नजदीकी को देखते हुए कहा जा रहा है कि आलाकमान उनको कोई अहम भूमिका दे सकता है. फिलहाल, इसकी कोई आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई है.

हालांकि, कांग्रेस में कुछ लोगों को यह बात हजम नहीं हो रही है. वामपंथ की तरफ झुकाव के कारण पार्टी के कुछ सीनियर नेता असहज महसूस कर रहे हैं, खासकर बोरा के AISA से जुड़े होने की वजह से. AISA को उसके आलोचक अक्सर 'कट्टरपंथी' बताते हैं. उनकी चिंता यह है कि कहीं नेहा जैसी युवा नेता भी एक और कन्हैया कुमार ना बन जाए.

भाषण देने के अंदाज से पार्टी प्रभावित

 कांग्रेस में कन्हैया के आगे बढ़ने में संदीप सिंह ने मदद की थी, जो JNU के पूर्व छात्र नेता थे और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ काम कर चुके थे. सिंह ने ही कन्हैया को गांधी परिवार की नजर में लाने में मदद की थी. छात्र राजनीति से निकलीं और जोरदार अंदाज में भाषण देने वाली बोरा से कांग्रेस आलाकमान प्रभावित है. उनके आने से यह भी पता चलता है कि कांग्रेस अब 'लेफ्ट-ऑफ-सेंटर' वाली राजनीति को मजबूती से अपनाने को तैयार है.

बोरा के मामले में भी शायद यही सोच काम कर रही है. गांधी परिवार और उनकी टीम ने सोशल मीडिया पर उनकी शोहरत को देखा है और उन्हें लगता है कि वह पार्टी को न सिर्फ दिल्ली, बल्कि उसके बाहर भी युवा वोटरों से जोड़ने में मदद कर सकती हैं. उत्तराखंड से उनका जुड़ाव भी कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि पार्टी राज्य में होने वाले चुनावों की तैयारी कर रही है.

बीजेपी इस बात को बना सकती है हथियार

लेकिन इस सियासी मौके के साथ एक मुश्किल भी जुड़ी है. बोरा ने उमर खालिद की रिहाई की पुरजोर वकालत की है. अगर वह कांग्रेस के कैंपेन का अहम चेहरा बनती हैं, तो बीजेपी इस बात का इस्तेमाल पार्टी पर यह आरोप लगाने के लिए कर सकती है कि वह उन लोगों के प्रति नरम रुख रखती है जिन्हें बीजेपी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानती है. ऐसा ही आरोप उसने पहले कन्हैया कुमार के खिलाफ भी लगाया था.

'कन्हैया फैक्टर' का डर

इसलिए, दोनों की तुलना से बचना मुश्किल है. दोनों ही JNU की छात्र राजनीति से निकले हैं, दोनों की विचारधारा मजबूत है और दोनों ही कांग्रेस के लिए युवा वोटरों तक पहुंचने का जरिया हैं. लेकिन पार्टी यह भी जानती है कि जिस राजनीति की वजह से उन्हें लोकप्रियता मिलती है, वही राजनीति कभी-कभी पार्टी के लिए मुसीबत भी बन सकती है.

फिलहाल, गांधी आलाकमान बोरा को लाइमलाइट में लाने की कोशिश करता दिख रहा है. मगर नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या वह कांग्रेस और युवा वोटरों के बीच एक मजबूत पुल का काम कर पाती हैं या नहीं. लेकिन फिर भी नेहा ने कांग्रेस और गांधी परिवार का ध्यान तो खींचा है. बाकी पिक्चर तो अभी बाकी है.

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About the Author

रचित कुमार जी न्यूज डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं. देश, दुनिया और डिफेंस की खबरों को आसान भाषा में बताने में महारत हासिल है. जी न्यूज से मई 2022 में जुड़े और शिफ्ट देखने का 12 साल से ज्यादा का अनुभव है. जी न्यूज में Best Performer अवॉर्ड भी मिल चुका है. जी न्यूज, आजतक और एबीपी न्यूज में शिफ्ट देखते हुए महामहिम, बिहार के बाहुबली सीरीज शुरू की और कई एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया.  इंडिया न्यूज और जनसत्ता में शिफ्ट देखने के साथ-साथ ट्रैफिक लाने वाली खबरों को तवज्जो दी. नवभारत टाइम्स से करियर की शुरुआत हुई और वहां तकरीबन ढाई साल तक फ्रंट पेज 2 और देश-विदेश के पन्नों की जिम्मेदारी संभाली. जर्नलिज्म में पोस्टग्रेजुएट और IIMC से डिप्लोमा करने  वाले रचित कुमार 13 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. आप Rachit.kumar@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं. 
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