मद्रास हाई कोर्ट से उस शख्स को बड़ा झटका लगा है, जो बच्चों के फ्यूचर की आड़ में टूट चुकी शादी को जबरन खींचने की कोशिश में जुटा था. पति की याचिका पर सुनवाई के दौरान मद्रास हाई कोर्ट ने साफ कर दिया कि तलाक से पति-पत्नी का लीगल रिश्ता भले खत्म हो जाए, लेकिन एक पिता का बच्चों के प्रति फर्ज कभी खत्म नहीं होता.
दरअसल, मद्रास हाई कोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद की याचिका पर सुनवाई की. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच तलाक होने का मतलब यह कतई नहीं है कि पिता अपनी पैरेंटल जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ ले. एक पिता अपने बच्चों को उस प्यार, केयर, गाइडेंस और इमोशनल सपोर्ट से वंचित नहीं कर सकता, जिसके वो हकदार हैं.
यह फैसला जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन और जस्टिस एम. डी. सुमति की बेंच ने सुनाया है. कोर्ट ने पति की वो अपील भी सिरे से खारिज कर दी, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को चुनौती दी थी और पत्नी को साथ रहने का आदेश देने की मांग की थी. पति ने दलील दी थी कि बच्चों के फ्यूचर और उनकी भलाई को देखते हुए इस रिश्ते को टूटने से बचाया जाना चाहिए था.
सुनवाई के दौरान पति की दलील को खारिज करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने कहा, इसमें कोई शक नहीं कि वैवाहिक मामलों में बच्चों का वेलफेयर एक बेहद अहम पहलू होता है, हालांकि, बच्चों की भलाई का यह मतलब बिल्कुल नहीं निकाला जा सकता कि दोनों पक्षों को जबरन ऐसे रिश्ते में घसीटा जाए, जो पूरी तरह नाकाम हो चुका हो और जिसे दोबारा चलाना मुमकिन ही न हो.
अदालत ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट कर दिया कि शादी टूटने के बाद रिश्ता खत्म होने से माता-पिता के कर्तव्य खत्म नहीं हो जाते. बेंच ने कहा, 'तलाक की डिक्री पति और पत्नी के बीच के कानूनी बंधन को तोड़ती है, लेकिन यह अपने बच्चों के प्रति पिता की नैतिक, भावनात्मक और पैरेंटल जिम्मेदारियों को खत्म नहीं करती. बच्चों की देखभाल करना, उन्हें सपोर्ट और गाइड करना, उनकी हिफाजत करना और उनकी जिंदगी में सार्थक रूप से जुड़े रहना पिता की जिम्मेदारी बनी रहती है.' कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि एक पिता की जिम्मेदारी सिर्फ आर्थिक मदद देने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्नेह और भावनात्मक सुरक्षा देना भी उसका फर्ज है.
इस मामले में पति ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया था और पत्नी पर किसी दूसरे शख्स के साथ संबंध होने का इल्जाम लगाकर दावा किया था कि वह 2019 में ससुराल छोड़कर चली गई थी. पति ने बच्चों की खातिर पत्नी को माफ करके उसके साथ रहने की बात कहते हुए याचिका दायर की, हालांकि फैमिली कोर्ट ने पत्नी को तलाक की डिक्री दे दी थी और पति की याचिका ठुकरा दी.
हाई कोर्ट ने पति की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ एक साथी के चाहने भर से टूटा हुआ रिश्ता फिर से नहीं जुड़ सकता. जब शादी की बुनियाद ही पूरी तरह हिल चुकी हो, तो सिर्फ एकतरफा जिद के दम पर साथ नहीं रहा जा सकता. दोनों के बीच बेहद गंभीर आरोप लगे थे, पुलिस में शिकायतें दर्ज कराई गई थीं और झगड़ा इतना बढ़ चुका था कि अब शांति से साथ रहने की कोई गुंजाइश ही नहीं बची थी.
इस मामले में जजों ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए कि शादी टूट चुकी है, पति यह नहीं कह सकता कि बच्चों के प्रति उसकी जिम्मेदारी खत्म हो गई. बच्चों का वेलफेयर दोनों माता-पिता पर यह लगातार जिम्मेदारी डालता है कि वे यह सुनिश्चित करें कि बच्चों की सही देखभाल हो और उन्हें पूरा इमोशनल सपोर्ट मिले. अदालत ने यह भी माना कि बच्चों की भलाई का तर्क फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को पलटने का आधार नहीं बन सकता और इसी के साथ पति की अपील खारिज कर दी गई.