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कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडालों पर होता है कितना खर्च? कहीं महल, कहीं मंदिर जैसी भव्यता, जानिए पर्दे के पीछे का हिसाब-किताब

कोलकाता से लेकर दिल्ली तक के विशालकाय दुर्गा पूजा पंडालों की चर्चा न सिर्फ पूरे भारत बल्कि दुनियाभर में होती है. इन पंडालों को बनाने में सैकड़ों लोगों की मेहनत और बहुत सारा समय लगता है. भगवती दुर्गा की पूजा और उपासना से जुड़े इस उत्सव की वजह से कई लोगों को पंडाल के पास रोजगार मिलता है, जिससे उनके घरों का चूल्हा जलता है, ऐसे में आइए आपको बताते हैं कि इन्हें बनाने में कितना खर्च आता है.

Written By Shwetank Ratnamber
Published: Oct 18, 2026, 12:15 PM IST | Updated: Oct 18, 2026, 02:16 PM IST
Image Credit: दुर्गा पूजा पंडाल (AI)
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शक्ति उपासना का पर्व नवरात्रि अपनी पूर्णता की ओर बढ़ ही रहा था, बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक में रावण दहन की तैयारियां आखिरी चरण में थीं. हर जगह दिल्ली के द्वारका स्थित रामलीला मैदान में 40 लाख रुपये की लागत से बने रावण के करीब 121 फीट ऊंचे विशालकाय पुतले की चर्चा के बीच कोलकाता के चोरबागान स्थित दुर्गा पूजा पूजा पंडाल में हुई भगदड़ के बाद कई पंडालों को एहतियातन बंद कर दिया गया. पंडाल बंद होने से सैकड़ों लोगों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा है. इस मुसीबत के बीच आइए जानते हैं कि विशालकाय दुर्गा पूजा पंडालों को बनाने में कितनी लागत आती है, आइए आपको बताते हैं.

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पूजा पंडाल बनाना परंपरा और भक्तिभाव का विषय होता है. हालांकि सार्वजनिक पूजा समारोहों की बात करें तो कृष्ण जन्माष्टमी पर दही हांडी के आयोजनों से लेकर विशाल गणेशोत्सव मनाने पर आस्था के साथ अर्थशास्त्र का संगम हो जाता है.

पंडास में आने वाले भक्तों की चाहत

ढाक की पहली थाप बजने से बहुत पहले ही, दुर्गा पूजा की तैयारियां होने लगती हैं. पूरा प्लान बन चुका होता है, जिसमें बजट का गुणा-गणित भी होता है. देवी का आगमन तो शरद ऋतु में होता है, लेकिन पूजा के आयोजक महीनों पहले पूरे भक्तिभाव से जुट जाते हैं. 

सबसे पहले आयोजक एक थीम तय करके पूजा का बजट बनाते हैं. फिर अलग-अलग सरकारी दफ्तरों जैसे पुलिस-प्रशासन और दमकल विभाग (फायर ब्रिगेड) वगैरह से दुर्गा पूजा आयोजन की एनओसी यानी मंजूरी ली जाती हैं. 

पंडाल के गेट से अंदर जाने वाली भीड़ के लिए, पूजा का मतलब है- रंग, रोशनी और शोर-शराबे से भरे कुछ दिनों की चहल-पहल. इसी कोलाहल को देखने कोलकाता के चोरबागान स्थित पंडाल में पहुंची भीड़ बारिश के बाद मची भगदड़ के चलते ऐसा बेकाबू हुई कि 19 लोगों की जिंदगी खत्म हो गई और कई लोग घायल होकर अस्पताल में पहुंच गए, उन्हें पूरी तरह ठीक होने में कितना समय लगेगा, कोई नहीं जानता. 

सालाना प्रोजेक्ट

कोलकाता से लेकर दिल्ली तक कई संस्थाएं हैं जो दशकों से पूजा पंडाल लगा रही हैं. उनमें से कुछ तो विश्व प्रसिद्ध हैं. पंडालों के आयोजक टीम बनाकर अलग-अलग काम एक साथ करते हैं. इसके लिए सबसे जरूरी चीज होती है फंडिंग. इसके लिए गली-मोहल्ले से लेकर जहां-जहां तक जिसकी जितनी जान-पहचान है, सभी जगहों से चंदा जुटाना शुरू कर दिया जाता है.

 कुशल कारीगरों की एक छोटी टीम और बहुत सारे लोगों के सहयोग से पूजा पंडाल तैयार होता है. पश्चिम बंगाल में, हर मोहल्ले में इसी तरह का आयोजन होता है, और हर जगह का अपना अलग हिसाब-किताब होता है.

15 लाख से करोड़ों का खर्च

हालांकि पूजा पंडालों की लागत का कोई फिक्स हिसाब-किताब नहीं होता. मिड लेवल के पूजा पंडाल बनाने में दसियों लाख रुपये खर्च हो जाते है, और इस खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा मैया की मुख्य मूर्ति पर नहीं, बल्कि उनके चारों ओर बनाए गए ढांचे पर खर्च होता है. अधिकतर लोग कभी यह नहीं देख पाते कि इसके पीछे क्या आंकड़े हैं, इसे बनाने में क्या दिक्कतें आती हैं या इन्हें बनाने में कौन-से लोग काम कर रहे हैं, सब कुछ ढका छिपा रहता है. पश्चिम बंगाल की गलियों को खंगालने और दुर्गा पूजा पंडाल के आयोजकों से बात करने पर पता चलता है कि छोटे पंडालों में पूजन यानी उत्सव का आयोजन करने में करीब 10 से 15 लाख रुपये का खर्च आता है. बाजार की महंगाई के हिसाब से हर साल यह बजट बढ़ता जाता है. बड़े पंडालों की लागत एक करोड़ या उससे ज्यादा हो सकती है.

सबसे ज्यादा खर्च कहां?

आयोजकों के मुताबिक पूजा आयोजन में सबसे ज्यादा खर्च लाइटिंग, मूर्ति या खाने-पीने पर नहीं बल्कि पंडाल बनाने में होता है. एक सामान्य स्तर की पूजा के लिए पंडाल बनाने के लिए टेंट हाउस वाले खर्च और इंटीरियर डिजाइनिंग में करीब 4 से 5 लाख रुपये लग जाते हैं. एक अनुमान के मुताबिक मूर्ति का खर्च पंडाल के खर्च का पांचवां हिस्सा होता है. 

इसके बाद मां की मूर्ति की लागत में सबसे महंगी चीज उन्हें पहनाए जाने वाले सोने के आभूषण होते हैं. जो अक्सर आयोजकों की तरफ से आते हैं, इसलिए ये बाकी खर्चों से बिल्कुल अलग तरह का खर्च है.

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About the Author

श्वेतांक रत्नाम्बर वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल न्यूज़ मीडिया में 22 वर्षों से ज्यादा का व्यापक अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (Hindi) की डिजिटल टीम में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय (देश-दुनिया) खबरों की डेस्क पर कार्यरत हैं. समसामयिक मुद्दों, वैश्विक राजनीति और कूटनीति पर गहरी समझ रखने वाले श्वेतांक जटिल अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और राजनीतिक समीकरणों का सटीक विश्लेषण करने के विशेषज्ञ हैं.Zee News डिजिटल से पहले उन्होंने ज़ी मीडिया नेटवर्क के ग्लोबल न्यूज़ चैनल 'WION' के साथ काम किया है. इस दौरान उन्होंने 'Gravitas', 'The West Asia Post' और 'One Africa' जैसे कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्राइम-टाइम शोज़ के हिंदी प्रोडक्शन और इंटरप्रिटेशन में अहम भूमिका निभाई. 2004 से शुरू हुए अपने पत्रकारिता करियर में श्वेतांक ने रिपोर्टिंग और एंकरिंग के साथ-साथ चार लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की व्यापक ग्राउंड कवरेज की है.जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI), नई दिल्ली से जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा के बाद मास कम्युनिकेशन और पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स डिग्री हासिल करने वाले श्वेतांक लंबे समय से 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' (PCI) के सम्मानित सदस्य हैं.आप श्वेतांक रत्नाम्बर से सीधे shwetank.ratnamber@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स (ट्विटर), मेटा (फेसबुक) और लिंक्डइन पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.' 
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