शक्ति उपासना का पर्व नवरात्रि अपनी पूर्णता की ओर बढ़ ही रहा था, बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक में रावण दहन की तैयारियां आखिरी चरण में थीं. हर जगह दिल्ली के द्वारका स्थित रामलीला मैदान में 40 लाख रुपये की लागत से बने रावण के करीब 121 फीट ऊंचे विशालकाय पुतले की चर्चा के बीच कोलकाता के चोरबागान स्थित दुर्गा पूजा पूजा पंडाल में हुई भगदड़ के बाद कई पंडालों को एहतियातन बंद कर दिया गया. पंडाल बंद होने से सैकड़ों लोगों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा है. इस मुसीबत के बीच आइए जानते हैं कि विशालकाय दुर्गा पूजा पंडालों को बनाने में कितनी लागत आती है, आइए आपको बताते हैं.
पूजा पंडाल बनाना परंपरा और भक्तिभाव का विषय होता है. हालांकि सार्वजनिक पूजा समारोहों की बात करें तो कृष्ण जन्माष्टमी पर दही हांडी के आयोजनों से लेकर विशाल गणेशोत्सव मनाने पर आस्था के साथ अर्थशास्त्र का संगम हो जाता है.
ढाक की पहली थाप बजने से बहुत पहले ही, दुर्गा पूजा की तैयारियां होने लगती हैं. पूरा प्लान बन चुका होता है, जिसमें बजट का गुणा-गणित भी होता है. देवी का आगमन तो शरद ऋतु में होता है, लेकिन पूजा के आयोजक महीनों पहले पूरे भक्तिभाव से जुट जाते हैं.
सबसे पहले आयोजक एक थीम तय करके पूजा का बजट बनाते हैं. फिर अलग-अलग सरकारी दफ्तरों जैसे पुलिस-प्रशासन और दमकल विभाग (फायर ब्रिगेड) वगैरह से दुर्गा पूजा आयोजन की एनओसी यानी मंजूरी ली जाती हैं.
पंडाल के गेट से अंदर जाने वाली भीड़ के लिए, पूजा का मतलब है- रंग, रोशनी और शोर-शराबे से भरे कुछ दिनों की चहल-पहल. इसी कोलाहल को देखने कोलकाता के चोरबागान स्थित पंडाल में पहुंची भीड़ बारिश के बाद मची भगदड़ के चलते ऐसा बेकाबू हुई कि 19 लोगों की जिंदगी खत्म हो गई और कई लोग घायल होकर अस्पताल में पहुंच गए, उन्हें पूरी तरह ठीक होने में कितना समय लगेगा, कोई नहीं जानता.
कोलकाता से लेकर दिल्ली तक कई संस्थाएं हैं जो दशकों से पूजा पंडाल लगा रही हैं. उनमें से कुछ तो विश्व प्रसिद्ध हैं. पंडालों के आयोजक टीम बनाकर अलग-अलग काम एक साथ करते हैं. इसके लिए सबसे जरूरी चीज होती है फंडिंग. इसके लिए गली-मोहल्ले से लेकर जहां-जहां तक जिसकी जितनी जान-पहचान है, सभी जगहों से चंदा जुटाना शुरू कर दिया जाता है.
कुशल कारीगरों की एक छोटी टीम और बहुत सारे लोगों के सहयोग से पूजा पंडाल तैयार होता है. पश्चिम बंगाल में, हर मोहल्ले में इसी तरह का आयोजन होता है, और हर जगह का अपना अलग हिसाब-किताब होता है.
हालांकि पूजा पंडालों की लागत का कोई फिक्स हिसाब-किताब नहीं होता. मिड लेवल के पूजा पंडाल बनाने में दसियों लाख रुपये खर्च हो जाते है, और इस खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा मैया की मुख्य मूर्ति पर नहीं, बल्कि उनके चारों ओर बनाए गए ढांचे पर खर्च होता है. अधिकतर लोग कभी यह नहीं देख पाते कि इसके पीछे क्या आंकड़े हैं, इसे बनाने में क्या दिक्कतें आती हैं या इन्हें बनाने में कौन-से लोग काम कर रहे हैं, सब कुछ ढका छिपा रहता है. पश्चिम बंगाल की गलियों को खंगालने और दुर्गा पूजा पंडाल के आयोजकों से बात करने पर पता चलता है कि छोटे पंडालों में पूजन यानी उत्सव का आयोजन करने में करीब 10 से 15 लाख रुपये का खर्च आता है. बाजार की महंगाई के हिसाब से हर साल यह बजट बढ़ता जाता है. बड़े पंडालों की लागत एक करोड़ या उससे ज्यादा हो सकती है.
आयोजकों के मुताबिक पूजा आयोजन में सबसे ज्यादा खर्च लाइटिंग, मूर्ति या खाने-पीने पर नहीं बल्कि पंडाल बनाने में होता है. एक सामान्य स्तर की पूजा के लिए पंडाल बनाने के लिए टेंट हाउस वाले खर्च और इंटीरियर डिजाइनिंग में करीब 4 से 5 लाख रुपये लग जाते हैं. एक अनुमान के मुताबिक मूर्ति का खर्च पंडाल के खर्च का पांचवां हिस्सा होता है.
इसके बाद मां की मूर्ति की लागत में सबसे महंगी चीज उन्हें पहनाए जाने वाले सोने के आभूषण होते हैं. जो अक्सर आयोजकों की तरफ से आते हैं, इसलिए ये बाकी खर्चों से बिल्कुल अलग तरह का खर्च है.