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किशाऊ पर 6 राज्यों की डील: हिमाचल का पानी दिल्ली-राजस्थान को, बदले में पावर-कॉस्ट शेयरिंग; 60 साल पुराना विवाद कैसे सुलझा?

6 राज्यों के बीच दशकों से आपसी खींचतान में फंसी किशाऊ परियोजना आखिरकार सहमति के दस्तावेजों में दर्ज हो चुकी है. ये मॉडल अन्य राज्यों के बीच चल रहे ऐसे विवादों का समाधान निकालने की दिशा में मिसाल बन सकता है.

किशाऊ पर 6 राज्यों की डील: हिमाचल का पानी दिल्ली-राजस्थान को, बदले में पावर-कॉस्ट शेयरिंग; 60 साल पुराना विवाद कैसे सुलझा?
Image Credit: दशकों पुराना विवाद सुलझ गया.

किशाऊ का करार:भारत ऐसे विशाल भू-भाग वाले देश में प्राकतिक संसाधनों के बंटवारे पर विवाद कोई नई बात नहीं है. ऐसे में 6 राज्यों के हितों से जुड़ी किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना का सपना साकार होने से इसका फायदा करोड़ों लोगों को मिलने जा रहा है. किसी परियोजना को तैयार करने में उसमें कितना खर्च आएगा, कितना समय लगेगा और काम पूरा होने का फायदा किसको मिलेगा ये तय करने में अक्सर लंबा वक्त लग जाता है, जिससे उसकी लागत बढ़ जाती है. किशाऊ की परियोजना भी ऐसी ही सवालों के घेरे में फंसी थी, जो एक गजब फॉर्मूले की मदद से पूरी हुई है. 

इस परियोजना के ले आउट प्लान और फंडिंग पैटर्न के मुताबिक, परियोजना के वाटर कंपोनेंट की लागत का 90 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि बाकी 10 फीसदी राशि छहों राज्यों को मिलकर देंगी.  

किशाऊ का आइडिया

इस प्रोजेक्ट से जुड़ी वेबसाइट kishau.co.in पर मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक यमुना नदी के पुनर्जीवन के मकसद से प्रस्तावित इस किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को लेकर 6 राज्यों के बीच आपसी सहमति बन चुकी है. 60 साल पहले जब पहली बार इस प्रोजेक्ट का बेसिक आइडिया नेताओं और नौकरशाहों के दिमाग में आया था उस समय पांच राज्य- यूपी, हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान इसके विवाद के केंद्र में थे, उत्तराखंड बनने के बाद इनकी संख्या 6 हो गई. 

किशाऊ परियोजना टौंस नदी पर प्रस्तावित है. टौंस यमुना की प्रमुख सहायक नदी है. परियोजना हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा के पास बनाई जानी है. उत्तराखंड का देहरादून जिला और हिमाचल का सिरमौर इस परियोजना के केंद्र में है. 

 

किशाऊ के करार का गुणा-गणित

इस परियोजना में एक बांध बनेगा. जो भाखड़ा डैम के बाद एशिया का दूसरा बड़ा डैम होगा. इस परियोजना की प्रस्तावित बिजली उत्पादन क्षमता 660 मेगावाट है. परियोजना में करीब 1,324 मिलियन घन मीटर लाइव जल भंडारण की क्षमता होगी. परियोजना की कुल प्रस्तावित लागत करीब 15,624 करोड़ रुपये है. इसमें 12,096 करोड़ रुपये जल घटक पर खर्च होंगे, जिसका 90 फीसदी केंद्र सरकार वहन करेगी.

बिजली-पानी बंटवारे का फॉर्मूला

इस समझौते से हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सहित छह राज्यों को टोंस नदी का पानी मिलेगा. हरियाणा को 836.39 क्यूसेक, यूपी को 543.20 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और दिल्ली को 105.28 क्यूसेक पानी मिलेगा. पीआईबी दस्तावेजों के मुताबिक इस परियोजना के लिए हरियाणा को करीब 579 करोड़ रुपये का खर्च उठाना होगा.

इसी तरह से अगर बिजली के बंटवारे के हिसाब किताब पर नजर डालें तो हर साल करीब 1,379 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया जाएगा. यह बिजली उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच बांटी जाएगी.  नई व्यवस्था के तहत हिमाचल को परियोजना से 211 मेगावाट बिजली मिलेगी और उसे करीब 600 करोड़ रुपये का सालाना फायदा यानी मुनाफा होने का अनुमान है.

किशाऊ बांध में पानी का बड़ा भंडारण होगा. इससे ऊपरी यमुना बेसिन में पानी की उपलब्धता को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने में मदद मिलेगी. इसकी जल भंडारण क्षमता 1,324 मिलियन घन मीटर होगी. इस बांध के जलाशयों से 97,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि योग्य भूमि को सिंचाई के लिए पानी मिलेगा. इस परियोजना का उद्देश्य जल संरक्षण, पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और बिजली उत्पादन जैसे बहुउद्देशीय लाभ सुनिश्चित करना है.

जल कवच

एमओयू की सबसे दिलचस्प और अहम शर्त पानी तथा बिजली के आदान-प्रदान से जुड़ी है. समझौते के मुताबिक हिमाचल के हिस्से का पानी दिल्ली और राजस्थान को इस्तेमाल करने के लिए मिलेगा. इसके बदले में दिल्ली और राजस्थान की सरकारें, हिमाचल प्रदेश के बिजली प्रोजेक्ट की लागत में अपनी वित्तीय हिस्सेदारी देंगी. वहीं यूपी को जो पानी मिलेगा उससे दिल्ली से सटे पश्चिमी यूपी में पेयजल की किल्लत दूर हो सकती है.

इस फॉर्मूले से दोनों पक्षों के हितों को जोड़ने की कोशिश की गई है. जिन राज्यों को पानी चाहिए, वे बिजली उत्पादन वाले हिस्से की लागत में योगदान करेंगे. दूसरी ओर हिमाचल को अपने हिस्से के पानी के बदले आर्थिक फायदा मिलेगा.

राजस्थान को तो वैसे  भी धोरों की धरती कहा जाता है. वहां पानी की किल्लत सदा से रही है. ऐसे में उसे इस परियोजना का फायदा जल कवच के रूप में मिलेगा.  इस तरह से देखें  तो सभी राज्यों के लिए परियोजना सिर्फ बिजली उत्पादन से मुनाफा होने के साथ बल्कि भविष्य की जल संकट से सुरक्षा मिलेगी.

ये समझौता क्यों अहम है?

इस समझौते को लेकर हाल ही में आई पीआईबी की एक रिपोर्ट के मुताबिक दोनों पहाड़ी राज्यों हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को तो इस पूरे समझौते का काफी फायदा होगा.दोनों को ही बिजली के उत्पादन में बड़ा मुनाफा होने का अनुमान लगाया गया है. इस परियोजना में जल भंडारण के साथ हाइड्रोपावर का उत्पादन होगा. इसमें हिमाचल के हिस्से के पानी को दिल्ली और राजस्थान को देने के बदले बिजली घटक की लागत में योगदान का प्रावधान हिमाचल प्रदेश के लिए काफी अहम होगा. इस तरह ये समझौता इसलिए अहम हो जाता है क्योंकि यह फॉर्मूला सिर्फ पानी का समुचित बंटवारा ही नहीं करता, बल्कि इससे दो कदम आगे बढ़कर पानी और बिजली के अलग-अलग हितों को एक ही आर्थिक फॉर्मूले में जोड़कर उनकी वित्तीय चिंता को दूर करता है.

गृह मंत्री अमित शाह की निगरानी में हुए इस समझौते को इसलिए अहम माना जा रहा है. क्योंकि इस समझौते से पहले  राजस्थान और हरियाणा के बीच ताजेवाला हेडवर्क्स जल समझौता गृह मंत्रालय की देखरेख में संपन्न कराया गया. जिसके तहत मॉनसून में हथनीकुंड ताजेवाला बैराज का सरप्लस पानी राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र भेजा जा सकेगा. इससे पहले दिल्ली का आरोप होता था कि हरियाणा जरूरत के समय पानी नहीं छोड़ता और बारिश के सीजन में एक्स्ट्रा पानी छोड़कर उसे डुबा देता था.  अब किशाऊ के समाधान ने भविष्य की तमाम ऐसी चुनौतियों का समाधान निकलने की उम्मीदें जगा दी हैं.

किशाऊ का समाधान निकलने में एक और सबसे अहम फैक्टर इसके 6 संबंधित राज्यों में से पांच में बीजेपी की सरकार का होना है. केंद्रीय जल-शक्ति मंत्रालय के कामकाज पर ध्यान देते हुए जिस तरह गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस विवाद के समाधान में दिलचस्पी दिखाते हुए कांग्रेस शासित हिमाचल को मनाने में सहयोग किया वो भी उल्लेखनीय है.

गौरतलब है कि बीते कुछ महीनों में देश में दशकों से लंबित चुनौतीपूर्ण जल विवादों का समाधान तेजी से निकाला जा रहा है. जुलाई, 2026 में ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच महानदी जल विवाद को लेकर एक संयुक्त समिति का गठन करने और आपसी सहमति से दीर्घकालिक ढांचा तैयार करने पर सहमति बनी थी. इस तरह सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े दशकों पुराने बकाये और लागत साझा करने के विवाद का समाधान हुआ था.

 

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About the Author

Shwetank Ratnamber

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श्वेतांक रत्नाम्बर वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल न्यूज़ मीडिया में 22 वर्षों से ज्यादा का व्यापक अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (Hindi) की डिजिटल टीम में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय (देश-दुनिया) खबरों की डेस्क पर कार्यरत हैं. समसामयिक मुद्दों, वैश्विक राजनीति और कूटनीति पर गहरी समझ रखने वाले श्वेतांक जटिल अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और राजनीतिक समीकरणों का सटीक विश्लेषण करने के विशेषज्ञ हैं.Zee News डिजिटल से पहले उन्होंने ज़ी मीडिया नेटवर्क के ग्लोबल न्यूज़ चैनल 'WION' के साथ काम किया है. इस दौरान उन्होंने 'Gravitas', 'The West Asia Post' और 'One Africa' जैसे कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्राइम-टाइम शोज़ के हिंदी प्रोडक्शन और इंटरप्रिटेशन में अहम भूमिका निभाई. 2004 से शुरू हुए अपने पत्रकारिता करियर में श्वेतांक ने रिपोर्टिंग और एंकरिंग के साथ-साथ चार लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की व्यापक ग्राउंड कवरेज की है.जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI), नई दिल्ली से जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा के बाद मास कम्युनिकेशन और पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स डिग्री हासिल करने वाले श्वेतांक लंबे समय से 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' (PCI) के सम्मानित सदस्य हैं.आप श्वेतांक रत्नाम्बर से सीधे shwetank.ratnamber@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स (ट्विटर), मेटा (फेसबुक) और लिंक्डइन पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.' 
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