एसआईआर (SIR) पर विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और केंद्र के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का आगाज हो चुका है. दो अक्टूबर यानी 'गांधी जयंती' से चालू हुए देशव्यापी प्रदर्शन शुरू होने से पहले दिग्गज मैदान में उतर चुके हैं. इसी सिलसिले में कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार खुद ईसी के खिलाफ धरने पर बैठ गए. शिवकुमार का सीधा आरोप है कि बीजेपी के लोग भारी संख्या में वोटर लिस्ट से नाम कटवा रहे हैं और चुनाव आयोग आंख मूंदकर हाथ पर हाथ धरे बैठा है.
कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष वी के हरिप्रसाद के साथ बेंगलुरु में मुख्य चुनाव अधिकारी के दफ्तर के बाहर धरने पर बैठने से पहले मुख्यमंत्री शिवकुमार ने राज्य के हर जिले के आंकड़े देते हुए बताया कि बीजेपी के एक-एक कार्यकर्ता को उन लोगों के नामों की लिस्ट दी गई है जिनके वोट कटवाने हैं. गौरतलब है कि गुरुवार को ही राहुल गांधी ने एसआईएर के साथ फॉर्म-6 को लेकर आयोग को फटकार लगाई थी, थोड़ी देर बाद डीके शिवकुमार फॉर्म-7 को लेकर चुनाव आयोग के खिलवाफ अड़ गए.
शिवकुमार ने आगे कहा, 'दिल्ली के इशारे पर कर्नाटक में बीजेपी के नेता अपने कार्यकर्ताओं के मार्फत अलग-अलग बूथों पर वोटर लिस्ट से लोगों का नाम कटवाने के लिए 80 से 200 फॉर्म-7 जमा करवा रहे हैं.
डीके शिवकुमार ने चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर अपने आरोपों से जुड़े सबूत सौंपते हुए उन सभी लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने की मांग की है, जिन लोगों ने बेंगलुरू समेत पूरे कर्नाटक में थोक के भाव फॉर्म -7 जमा करवाए हैं.
आगे चुनाव आयोग ने लीगल ओपिनियन लेने के बाद एक्शन लेने का भरोसा दिलाया लेकिन शिवकुमार इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुए, तो वहीं धरने पर बैठ गए. आगे उन्होंने कहा कि जब तक बीजेपी के लोगों के खिलाफ केस दर्ज नहीं होते, तब तक वो चुनाव आयोग के दफ्तर के बाहर ही बैठे रहेंगे.
फॉर्म-7 वोटर लिस्ट से नाम कटवाने के लिए भरा जाता है. शिवकुमार ने आगे बताया कि कर्नाटक में SIR से ज्यादा लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कट चुके हैं. इसके बाद भी 45 लाख से ज्यादा वोटर्स को नोटिस भेजे गए हैं और अब बीजेपी की तरफ से लाखों की संख्या में फॉर्म-7 भरे जा रहे हैं. ये लोकतंत्र के साथ मजाक है. इसलिए ऐसा करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए.
कल राहुल गांधी ने फॉर्म-6 में कथित बदलाव का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग को घेरा था. फॉर्म-6 जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और मतदाता पंजीकरण नियमों के तहत निर्धारित प्रारूप का हिस्सा है. जो मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए भरा जाता है.
भारत के लीगल सिस्टम के तहत वोटर लिस्ट में वोटर्स को शामिल करने से जुड़े 3 मुख्य फॉर्म हैं. पहला फॉर्म-6, दूसरा फॉर्म-7 और तीसरा फॉर्म-8.
फॉर्म-6 वोटर लिस्ट में नए वोटर को शामिल करने से जुड़ा है, फॉर्म 7 मौजूदा वोटर को शामिल करने/हटाने पर आपत्तियों से जुड़ा है और फॉर्म 8 मौजूदा वोटर की एंट्री में सुधार से जुड़ा है.
पिछले साल जून, 2025 में चुनाव आयोग ने बिहार राज्य में SIR की घोषणा करते हुए एक आदेश जारी किया था. उस आदेश के साथ 'एनेक्सर D' जुड़ा था, जिसमें डिक्लेरेशन फॉर्म था जिसे नए वोटर के तौर पर एनरोलमेंट/राज्य के बाहर से शिफ्ट होने के लिए फॉर्म 6/ फॉर्म 8 के साथ जमा करना था. इसके तहत आवेदक को अपनी उम्र, सामान्य निवास और नागरिकता के बारे में डिक्लेरेशन देना था. कोई भी गलत डिक्लेरेशन देने पर RP Act की धारा 31 के तहत सजा हो सकती थी. इसी डिक्लेरेशन पर विपक्षी दलों से सवाल उठाए थे.
देखिए - डिक्लेरेशन फॉर्म

यानी SIR के दौरान फॉर्म-6 के साथ जो एक अलग घोषणा-पत्र जोड़ा गया था, उसमें चुनाव आयोग ने आवेदक से ये जानकारी भी मांगी थी कि उनका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछले SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं. इस बदलाव को अवैध बताते हुए राहुल गांधी ने एक अक्टूबर को चुनाव आयोग को निशाने पर लेते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखा था.