SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

‘BJP-RSS का एजेंडा नहीं चलेगा...’: वक्फ बोर्ड के ‘साझा खुतबे’ पर क्यों भड़के जम्मू-कश्मीर के इमाम और मुफ्ती?

जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की ओर से मस्जिदों में जुमे की नमाज के लिए 'एक समान खुतबा' लागू करने के प्रस्ताव पर घाटी के नेताओं और धार्मिक उलेमाओं में भारी आक्रोश है. सीएम उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और मीरवाइज उमर फारूक ने इसे मुस्लिम धार्मिक मामलों में बीजेपी का सीधा हस्तक्षेप करार दिया है. जानिए क्यों भड़के इमाम और क्या है पूरा मामला.

Written By Khalid Hussain
Published: Oct 15, 2026, 10:13 PM IST | Updated: Oct 15, 2026, 10:55 PM IST
Image Credit: "जम्मू-कश्मीर: वक्फ बोर्ड के 'साझा खुतबे' के फरमान पर विवाद, इस्लामी विद्वानों और इमामों ने जताया कड़ा विरोध"
Join

जम्मू-कश्मीर में शुक्रवार की नमाज़ के लिए एक 'साझा खुतबे' (uniform khutbah) के मुद्दे पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड ने अपने अधीन आने वाली दरगाहों, जामा मस्जिदों और अन्य संस्थानों में शुक्रवार के खुतबों के लिए विषय तय करने के वास्ते मुफ्ती, इमाम और खतीबों की एक कोर कमेटी बनाने का फैसला किया है. इस कदम के कारण कश्मीरी मुस्लिम विद्वानों, मुफ्ती, उलेमा और राजनीतिक नेताओं के साथ वक्फ बोर्ड का तीखा टकराव शुरू हो गया है. वक्फ बोर्ड के प्रशासनिक कार्यों को स्वीकार करते हुए भी, कश्मीरी मुस्लिम विद्वानों और मुफ्ती ने स्पष्ट कर दिया है कि बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में धार्मिक मामलों से जुड़े फैसले थोपना शामिल नहीं है.

उनका आरोप है कि वक्फ बोर्ड एक खास राजनीतिक दल का एजेंडा आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और मस्जिदों के मिंबरों (उपदेश देने के स्थानों) पर अपना नियंत्रण जमाना चाहता है. मुफ्ती का कहना है कि यह कोशिश कई सालों से चल रही थी और अब इसे लागू किया जा रहा है. उनका तर्क है कि BJP और RSS, वक्फ बोर्ड का इस्तेमाल एक आड़ के तौर पर कर रहे हैं ताकि मुस्लिम समुदाय की भावनाओं का फायदा उठाया जा सके. मुफ्ती मियां आदिल नूरानी ने कहा, 'लगभग साढ़े छह सौ साल बीत चुके हैं. तब से लेकर आज तक, हमारे इमाम, कानूनविद और विद्वान बहुत ही बेहतरीन ढंग से अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते आ रहे हैं. तो फिर आज वक्फ बोर्ड की क्या जरूरत पड़ गई?

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है बयान

अगर हम आदरणीय दरख्शां साहिबा का वह बयान सुनें- जिसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, उसमें हाफिज मुहम्मद अकरम और हाफिज तारिक साहब, जो उस बैठक में ऑनलाइन शामिल हुए थे, बताते हैं कि मैडम दरख्शां साहिबा ने कहा कि यह आदेश चार साल पहले दिया गया था और आज हम इसे लागू कर रहे हैं. पहला सवाल यह है कि यह आदेश किसने दिया? और अगर आज तक हमारे विद्वान, हमारे हुफ्फाज (कुरान याद रखने वाले) और हमारे इमाम बहुत अच्छे से अपनी जिम्मेदारी निभाते आ रहे हैं, तो अचानक अब ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी? ऐसा नहीं हो सकता. यह धर्म में दखलंदाजी है. और खुतबा (धार्मिक उपदेश) कौन देगा? क्या हमें बीजेपी की भाषा बोलनी होगी? क्या हमें सदस्यों के बीच आरएसएस के एजेंडे को बढ़ावा देना होगा?

वक्फ बोर्ड को ये अधिकार नहीं है कि वो हमें बताए कि क्या करना है

अंद्राबी साहिबा अपना काम बहुत अच्छे से कर रही हैं, हम इसके लिए उनकी तारीफ करते हैं और सराहना करते हैं. हमारी दरगाहों और अन्य वक्फ संपत्तियों पर उन्होंने जो भी काम किया है, उसमें उन्होंने अपनी जेब से पैसा नहीं लगाया है; यह हमारे अकीदतमंदों (श्रद्धालुओं) का पैसा है, जिसका अब तक इस्तेमाल नहीं हो रहा था, और आज उसका इस्तेमाल हुआ है. हम इसकी सराहना करते हैं. लेकिन वक्फ बोर्ड को यह अधिकार नहीं है कि वह हमें बताए कि हमें क्या करना है. इस मामले में हम वक्फ बोर्ड के निर्देशों को स्वीकार नहीं करते. इसे हम 'केंद्रीय खुतबा' कहेंगे. केंद्र से ऐसा आदेश आना कि हमें अमुक खुतबा देना है, यह कतई स्वीकार्य नहीं है. यह धर्म में दखलंदाजी है.

इससे पहले भी, जब हमने हजरतबल के प्रतीक चिह्न (emblem) का मुद्दा उठाया था, तब भी मेरी उन्हें यही सलाह थी: एक समझदार दुश्मन, एक बेवकूफ दोस्त से कहीं बेहतर होता है. उनके आस-पास बैठे लोग जो हर बात पर 'जी मैम, जी मैम, जी मैम' कहते रहते हैं, वे असल में उनके दोस्त नहीं, बल्कि दुश्मन हैं. वे उनसे ऐसे फैसले करवा रहे हैं जिनसे लोगों के बीच बंटवारा और नफरत बढ़ रही है." हम शांति चाहते हैं. हज़रत शाह हमदान (अल्लाह उन पर रहम करे) यहाँ शांति का संदेश लेकर आए थे. हमारे पैगंबर मुहम्मद (उन पर शांति और आशीर्वाद हो) शांति लेकर आए थे.

जम्मू-कश्मीर के लोग इस माहौल को कभी स्वीकार नहीं करेंगे

देखिए, आज पूरे जम्मू-कश्मीर में कैसा माहौल है? लोग इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे. हर कोई देख रहा है. उपदेश (खुत्बे) के बारे में मुझे यह बताइए: मेरा आपसे सवाल है कि क्या हमारे विद्वान, हमारे हाफ़िज़, हमारे स्नातक और हमारे इमाम इतने सक्षम नहीं हैं कि वे अपनी मर्जी से तय कर सकें कि जुमे के उपदेश में क्या कहना है? क्या उन्हें नहीं पता कि समाज की ज़रूरतें क्या हैं? आज तक हम अपनी आवाज़ उठाते रहे हैं. हमने शराब के बारे में बात की है, हर कोई इस पर बात कर रहा है, हर इमाम और हर विद्वान इस पर बोलता है. हम नशीले पदार्थों, हर तरह की अश्लीलता और हर बुराई के बारे में बात करते रहे हैं- हम इन सभी मुद्दों को उठाते रहे हैं. तो आज यह क्या कहा जा रहा है? नहीं, यह तो एक आदेश है. अभी वे हमसे नशीले पदार्थों के बारे में बात करने को कह रहे हैं, लेकिन इसके पीछे कुछ और ही है जिसे हम अच्छी तरह समझते हैं. हम ऐसा नहीं होने देंगे. हम मुसलमान हैं, इंशाअल्लाह, हमारे रग-रग में अभी भी ईमान दौड़ता है.

रियाज नाइकू ने भारत को आग के हवाले करने का आह्वान किया था

इस्लामिक विद्वानों ने वक्फ बोर्ड से जुड़े मुफ्ती और मौलानाओं द्वारा पिछले एक दशक में दिए गए उपदेशों (खुतबों) की जांच की मांग की है. उनका आरोप है कि इनमें से कुछ लोग कभी बुरहान वानी और रियाज नाइकू जैसे आतंकवादियों के मार्गदर्शक माने जाते थे. वही लोग जिन्होंने हिंसा भड़काने और "भारत को आग के हवाले करने" का आह्वान किया था. आलोचकों का कहना है कि अब उन्हीं लोगों को जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड में निर्णय लेने वाले पदों पर बिठा दिया गया है, जबकि इस बोर्ड के प्रमुख एक भाजपा नेता हैं. इस्लामिक विद्वान फारूक रेंजू शाह ने कहा, "मेरा मानना ​​है कि 'आदेश' का मतलब यह है कि किसी राजनीतिक दल द्वारा जो कुछ भी लिखा जाए, उसे आपको सुनना होगा और इमाम को भी वही बात कहनी होगी. अगर उनका इरादा यह है कि सब कुछ बीजेपी मुख्यालय में लिखा जाए और इमाम उसे लोगों को बताएं, तो मेरी राय में यह पूरी तरह से गलत है."

रियाज नाइकू को बाताया कश्मीर का पीर

वहीं इसका "दूसरा पहलू यह है कि अगर ऐसे मौलाना - जिनका बैकग्राउंड ऐसा है कि रियाज नाइकू (हिज्ब का मारा गया कमांडर) भी यह कह चुका है कि 'वह हमारा पीर है' - अगर ऐसे लोग खुद इसे लिख रहे हैं, तो इसका मतलब है कि उन्होंने इस धार्मिक संस्था को गलत दिशा दी है, और यह भी गलत है." शाह ने आगे कहा, 'मैं आपको बता दूं कि कश्मीर में शेख अब्दुल्ला द्वारा बनाए गए मुस्लिम वक्फ बोर्ड का मूल उद्देश्य (mandate) कुछ और था. यहां की दरगाहें निजी संपत्ति हैं - जैसे दस्तगीर साहब की दरगाह एक निजी संपत्ति है - इसलिए वक्फ बोर्ड का इन पर कोई अधिकार (mandate) नहीं है. असल में, जम्मू-कश्मीर में मुफ्ती मोहम्मद सईद ने वक्फ के पैसे का इस्तेमाल किया.

विश्वविद्यालय का नाम बुलबुल शाह के नाम पर होना चाहिए था

उन्होंने वक्फ का पैसा निकालकर विश्वविद्यालय बनवाए, जो बाद में सरकारी विश्वविद्यालय बन गए. मैंने उस समय कहा था कि विश्वविद्यालय का नाम बुलबुल शाह के नाम पर होना चाहिए था. उन्होंने शेख-उल-आलम के नाम पर विश्वविद्यालय बनाया; उस समय वक्फ ने हमें ऐसा करने की अनुमति नहीं दी थी. इसलिए, वक्फ बोर्ड के लोग जो कुछ भी कर रहे हैं, उसका कश्मीर के असली सूफीवाद से कोई लेना-देना नहीं है. 

वक्फ बोर्ड के पास ये अधिकारी नहीं कि वो किसी और विचारधारा को यहां लाए

वक्फ बोर्ड के पास यह अधिकार नहीं है कि वह किसी अन्य विचारधारा - जैसे कि सऊदी अरब के एजेंडे - को यहां लाए और शुक्रवार की नमाज में उसे लागू करे. बिल्कुल नहीं.' हालांकि, वक्फ बोर्ड ने शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया था कि "एक समान उपदेश" (uniform sermon) के लिए कोई औपचारिक निर्देश जारी नहीं किया गया है. बोर्ड का दावा है कि यह विचार बोर्ड से जुड़े मुफ्ती और मौलानाओं की ओर से आया था.

हमें ड्रग्स के मुद्दे पर बात करनी है हम वही करेंगे

वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन डॉ. दरख्शां अंद्राबी ने कहा, "कोई आदेश नहीं है, कहीं कोई आदेश नहीं है. आप वह प्रेस कॉन्फ्रेंस देखें, सब कुछ आपके सामने है, वह लाइव है. आप खुद देख लें, कोई आदेश नहीं है. वहां मौजूद मुफ्ती और इमाम साहिबान ने यह फैसला लिया था कि अगर हमें ड्रग्स के मुद्दे पर बात करनी है, तो हम ड्रग्स पर बात करेंगे. अगर हमें इस बात पर चर्चा करनी है कि शादियां क्यों नहीं हो पा रही हैं, तो हम उस पर बात करेंगे. 

उपदेशों के जरिए अपनी बात रखना चाहते हैं

अगर बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं, तो वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? हमारे समाज में यह मानसिक तनाव (ट्रॉमा) क्यों है? उन्होंने यही तय किया था, और इसी पर चर्चा होनी थी. वे अपने उपदेशों के जरिए, अपने तरीके से अपनी बात रखना चाहते थे. अब इस पर कोई चर्चा नहीं होगी. हमारे धार्मिक विद्वान जो भी करना चाहें, वे अपने तरीके से कर सकते हैं. इसमें हमारा कोई दखल नहीं है. हमारे धार्मिक गुरु जो भी करना चाहते हैं, वे कर सकते हैं."

वायरल वीडियो में अंद्राबी का बयान

बाद में, इस बैठक का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ. इस वीडियो में चेयरपर्सन दरख्शां अंद्राबी को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि अगले शुक्रवार से एक साझा उपदेश (सर्मन) लागू किया जाएगा. कश्मीरी मुफ्ती और विद्वानों ने बोर्ड के स्पष्टीकरण को चुनौती देने के लिए इसी वीडियो का इस्तेमाल किया है. पूरे कश्मीर में इसे लेकर तीखी और व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली है. 

ये बीजेपी के एजेंडे का हिस्साः उमर अब्दुल्ला

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस मामले को बीजेपी के एजेंडे का हिस्सा बताया और इसे मुसलमानों के धार्मिक मामलों में एक अस्वीकार्य दखल करार दिया. उन्होंने मांग की कि बीजेपी द्वारा नियुक्त चेयरपर्सन इस पहल को तुरंत रोक दें. पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस प्रस्ताव की कड़ी निंदा की और इसका विरोध किया. उन्होंने इसे आस्था में दखल बताया और एकरूपता लाने की इस कोशिश की तुलना बीजेपी के अन्य एजेंडों, जैसे 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' (समान नागरिक संहिता) से की. उन्होंने और अन्य लोगों ने मांग की है कि वक्फ बोर्ड का नियंत्रण जम्मू-कश्मीर की चुनी हुई सरकार को सौंप दिया जाना चाहिए.

ये कोई पहला मौका नहीं जब मुस्लिम आस्था...

धार्मिक संगठनों की मुख्य संस्था, 'मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा' (MMU) ने किसी भी वैधानिक निकाय द्वारा यह तय करने या नियंत्रित करने के प्रयास को खारिज कर दिया है कि 'मिंबर' (मस्जिद में उपदेश देने का स्थान) से क्या उपदेश दिया जाए. अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने भी इस विरोध में अपनी आवाज़ मिलाई है और चेतावनी दी है कि कश्मीर को एक समान धार्मिक प्रथाओं को लागू करने के लिए 'टेस्टिंग ग्राउंड' (प्रयोगशाला) न बनाया जाए. मुफ्ती, मौलाना और विद्वानों का आरोप है कि यह पहली बार नहीं है जब वक्फ बोर्ड ने मुस्लिम आस्था से जुड़े मामलों में दखल दिया है. 

बार-बार हो रही हैं ऐसी घटनाएं

उनका कहना है कि ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं और उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर यह दखलंदाजी नहीं रुकी, तो कश्मीर में वक्फ बोर्ड को लेकर भारी अशांति फैल सकती है. कई विद्वानों और समुदाय के लोगों का संदेश बिल्कुल साफ है: "हम अपनी मस्जिदों में भाजपा-आरएसएस के एजेंडे को नहीं चलने देंगे." यह टकराव जारी है. धार्मिक स्वायत्तता, प्रशासनिक अधिकारों की सीमाएं और 'मिंबर' की स्वतंत्रता इस बहस के केंद्र में हैं, जिसने पूरी घाटी का ध्यान अपनी ओर खींचा है.

यह भी पढ़ेंः 'पूरा मुंब्रा हरा करेंगे' कहने वाली AIMIM पार्षद सहर के पिता शिंदे सेना में शामिल, मिली बड़ी जिम्मेदारी

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:

About the Author

सैयद खालिद हुसैन जम्मू-कश्मीर के एक पुरस्कार विजेता पत्रकार हैं, जिन्हें 24 वर्षों से अधिक का अनुभव है. साल 2014 से 'ज़ी न्यूज़' में चीफ  स्पेशल कोरेस्पोंडेंट के रूप में काम कर रहे हैं.जी मीडिया से पहले हुसैन ने न्यूज़ 18 में नौ साल तक सीनियर कोरेस्पोंडेंट के रूप में काम किया. हुसैन ने अपने करियर की शुरुआत डीडी न्यूज से की थी. हुसैन ने अपनी तालीम श्रीनगर के पब्लिक स्कूल और डीएवी हाई स्कूल से हासिल की. फिर ग्रेजुएशन तक का सफ़र एस.पी हायर सेकेंडरी स्कूल और अमर सिंह कॉलेज से पूरा किया. उसके बाद मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई के लिए दिल्ली के सर अरबिंदो इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से पूरी की. इसके अलावा हुसैन लेखक फ़िल्म/ वीडियो कैमरा का स्पेशल कोर्स एफटीआई पुणे से कर चुके हैं.  मुंबई और दिल्ली में कई साल काम करने के बाद 2004 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर में काम करना शुरू किया. डीडी न्यूज़, डीडी कश्मीर, BAG फ़िल्म्स में फ्रीलांस काम किया. हुसैन पिछले दो दशक से भी ज्यादा समय से जम्मू-कश्मीर से जुड़े कई मुद्दों को बेहतरीन तरीके से कवर कर रहे हैं. लद्दाख से लेकर मुंबई तक हुसैन भारत के कई शहरों से रिपोर्टिंग कर चुके हैं.
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES