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'घाटी की खामोशी अमन नहीं, खौफ है': महबूबा मुफ्ती का केंद्र पर तीखा वार, 1947 विलय के वादों की दिलाई याद

जम्मू-कश्मीर आज विलय दिवस मना रहा है. इस मौके पर पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने आर्टिकल 370 खत्म होने के बाद घाटी के हालात को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला. साथ ही विलय के वक्त किए गए भी वादों को याद दिलाया.

Written By Khalid Hussain Edited By Bhoopendra Rai
Published: Oct 26, 2026, 04:11 PM IST | Updated: Oct 26, 2026, 04:56 PM IST
Image Credit: विलय दिवस के मौके पर पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने घाटी के हालात को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला.
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जम्मू-कश्मीर आज 79वां विलय दिवस मना रहा है. इसे इंग्लिश में 'एक्सेशन डे' कहते हैं. ये वही दिन है जब 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर दस्तखत किए थे और यह रियासत भारत का हिस्सा बनी थी. इस खास मौके पर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला. उनका आरोप है कि बीजेपी उस संविधान को कुचल रही है, जिसने हमें 370 दिया था.  

महबूबा मुफ्ती ने कहा, केंद्र सरकार द्वारा 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को हटाने का फैसला, असल में विलय के समय हुए उन मूल समझौतों को 'रद्दी की टोकरी में डालने' जैसा है, जो कुछ शर्तों के साथ किए गए थे.इसके साथ ही उन्होंने कश्मीरियों के प्रति पैदा हुए अविश्वास के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को जिम्मेदार ठहराया है.

महबूबा मुफ्ती ने कहा, 'लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला द्वारा विलय की पुष्टि ने जम्मू-कश्मीर के लोगों को यह भरोसा दिलाया कि भारत कोई 'कब्जा करने वाली ताकत' नहीं है. हालांकि, जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट संस्कृति की रक्षा के लिए यह विलय कुछ शर्तों के साथ हुआ था, लेकिन इसका मकसद कभी भी भारत संघ के खिलाफ जाना नहीं था. इसे ही अनुच्छेद 370 और 35A के रूप में जाना गया, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर भारत के साथ जुड़ा और नेहरू जैसे नेताओं ने भी इस संबंध में गंभीर आश्वासन दिए थे.'

मुफ्ती ने आगे कहा, 'हमें नहीं पता कि क्या गलत हुआ कि शेख अब्दुल्ला 1953 तक इसके खिलाफ हो गए और उनका मुकाबला करने के लिए आरएसएस ने 'एक राष्ट्र, एक संविधान' अभियान शुरू कर दिया. आज कश्मीर दुनिया का सबसे अधिक सैन्यीकृत क्षेत्र है और यह उस अविश्वास का परिणाम है, जो शेख अब्दुल्ला के जनमत संग्रह अभियान के बाद पैदा हुआ था. इसी वजह से कश्मीरी लोगों पर 'आतंकवादी' होने का ठप्पा लग गया. 

'घाटी में जबरन शांति थोपकर जीत का ढिंढोरा पीट रही बीजेपी'

घाटी में पाबंदियों को लेकर महबूबा मुफ्ती ने सवाल उठाया. उनका आरोप है कि 'हमें सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं है और बीजेपी इस 'जबरन शांति' को जीत के रूप में पेश कर रही है. यह पूरे देश के लिए एक चेतावनी है और आज हम भारत के लोगों को जम्मू-कश्मीर के लोगों से किए गए वादों की याद दिलाना चाहते हैं. आज हम उस दिन का जश्न मनाते हैं, जब हम एक महान राष्ट्र में शामिल हुए थे, लेकिन भारत के लोगों को भी अपने वादे पूरे करने चाहिए, क्योंकि आज हम भारी दबाव और हमलों का सामना कर रहे हैं.' महबूबा मुफ्ती ने चेतावनी दी कि केवल ताकत के दम पर कश्मीर मुद्दे को हल नहीं किया जा सकता. 

'पाकिस्तान ने कबायली हमलावर भेजकर सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल की'

महबूबा मुफ्ती ने 1947 के बंटवारे और पाकिस्तान की तरफ से जम्मू-कश्मीर पर थोपे गए कबायली हमले का ऐतिहासिक संदर्भ समझाया. उन्होंने कहा, 'विभाजन के समय जो राज्य मुस्लिम बहुल थे, उनका फैसला धर्म के आधार पर हुआ था. कुछ मुस्लिम बहुल राज्य पाकिस्तान चले गए और कुछ हिंदू बहुल राज्यों ने भारत के साथ जाने का फैसला किया. चूंकि हम एक मुस्लिम बहुल राज्य थे, इसलिए पाकिस्तान को लगा कि यदि जम्मू-कश्मीर मुस्लिम बहुल राज्य है, तो उसे पाकिस्तान के साथ आना चाहिए. जैसा कि हैदराबाद के मामले में हुआ था, जहां निजाम ने फैसला किया था कि हम पाकिस्तान के साथ जाएंगे, लेकिन उस समय भारत के नेतृत्व ने आपत्ति जताई और कहा कि नहीं, निजाम की मर्जी नहीं चलेगी, बहुसंख्यक लोगों की मर्जी चलेगी. इसी तरह, पाकिस्तान ने सोचा कि अगर हैदराबाद, निजाम के फैसले के बावजूद, हिंदू बहुसंख्या के आधार पर भारत का हिस्सा बन गया, तो यह स्वाभाविक है कि जम्मू-कश्मीर को मुस्लिम बहुल राज्य होने के नाते पाकिस्तान के साथ जाना चाहिए. उस समय उन्होंने जो सबसे बड़ी गलती की, जो ऐतिहासिक भूल की, वह यह थी कि उन्होंने यहां कबायली हमलावरों को भेज दिया."

'हमने गांधी-नेहरू के सेक्युलर विजन को चुना'

मुफ्ती ने आगे कहा, 'उस समय जम्मू-कश्मीर के लोगों पर बहुत बड़ा हमला हुआ था, क्योंकि जम्मू-कश्मीर के लोग सोच-समझकर अपना फैसला लेना चाहते थे. नतीजतन, महाराजा ने भारत सरकार से अनुरोध किया कि हम इस आक्रमण का मुकाबला करें. यह फैसला लिया गया कि जम्मू-कश्मीर, एक मुस्लिम बहुल राज्य होने के नाते, पाकिस्तान जाने के बजाय भारत के साथ जाना चाहता है. उस समय जो नेतृत्व वहां मौजूद था गांधी जी, जवाहरलाल नेहरू, अंबेडकर साहब, मौलाना अबुल कलाम आजाद साहब, सरदार वल्लभभाई पटेल, जो मानते थे कि भारत हिंदू राष्ट्र नहीं बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष देश बनेगा, जहां सभी धर्मों के लोग एक साथ रहेंगे और आगे बढ़ेंगे. लेकिन महाराजा की इच्छा के बावजूद, भारत के नेतृत्व ने कहा कि यह समझौता तब तक अधूरा है जब तक कि जम्मू-कश्मीर का सबसे लोकप्रिय नेतृत्व इसका समर्थन नहीं करता. उस स्थिति में, शेख साहब ने इसका समर्थन किया और जम्मू-कश्मीर के लोगों को लगा कि भारत हमें निगलना नहीं चाहता, हमारे विचारों और हमारी भावनाओं को दबाना नहीं चाहता. इसलिए, उन्होंने यहां के नेतृत्व से कहा कि आप भी हमें इस फैसले में शामिल करें.'

'हमारी साझी संस्कृति बची रहे, इसलिए रखी गई थीं खास शर्तें'

जम्मू-कश्मीर की विरासत और भारत के साथ हुए समझौते की शर्तों पर बात करते हुए महबूबा मुफ्ती ने कहा, 'हमारा जम्मू-कश्मीर क्षेत्र, जो एक विशेष बहुसंख्यक राज्य था, उसकी अपनी एक अनूठी पहचान थी, जो अन्य राज्यों से अलग थी. यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई कई धर्मों के लोग एक साथ रहते थे और हमारी एक मिश्रित संस्कृति थी. उस संस्कृति को जीवित रखने के लिए यह फैसला लिया गया कि हम भारत के साथ जाएंगे. भारत के नेतृत्व पर भरोसा जताया गया, लेकिन हमारी कुछ शर्तें थीं. वे शर्तें यह थीं कि हम देश में शामिल होना चाहते थे, लेकिन वे शर्तें इस बारे में थीं कि हमारी विशिष्टता, हमारी पहचान, एक विशेष बहुसंख्या के रूप में हमारी पहचान बौद्ध, डोगरा, पहाड़ी, कश्मीरी, कश्मीरी पंडितों के रूप में कैसे सुरक्षित रहेगी.'

370 और 35A बनने की वजह बताई

विलय पत्र के तहत स्थानीय अधिकारों, जमीनों और रोजगार के संरक्षण का मकसद समझाते हुए महबूबा मुफ्ती ने कहा, 'एक 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसे आप देख रहे हैं, ताकि बाहरी लोग आकर कौड़ियों के दाम हमारी जमीन न खरीद सकें, क्योंकि हमारी जमीन बहुत सीमित है, हमारे पास जमीन की होल्डिंग बहुत छोटी है. जो रोजगार हमारे पास यहां है, जो नौकरियां हमारे पास यहां हैं, बाहरी लोग आकर उन्हें न छीन लें, क्योंकि उस समय हमारी शिक्षा प्रणाली और अन्य चीजें इतनी अच्छी नहीं थीं कि हम बाहर के लोगों से प्रतिस्पर्धा कर सकें. इसलिए, हमारी नौकरियां हमारे पास ही रहनी चाहिए. ऐसी कुछ शर्तें रखी गईं, जिन्हें 370 और 35A कहा गया और सब कुछ उसी रूप में आया. जम्मू-कश्मीर के लोगों ने बहुत भरोसा करते हुए खुले दिल से देश के साथ हाथ मिलाया और इसमें देश के नेतृत्व ने हमारे साथ जो व्यवहार किया वह बहुत सुंदर था. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, 'मैं जम्मू-कश्मीर को एक शो-विंडो बनाना चाहता हूं, दुनिया के लिए एक खिड़की, ताकि पूरी दुनिया इसे देखती रहे.''

शेख अब्दुल्ला की वजह से कश्मीरियों पर लगा संदिग्ध का ठप्पा

इसके बाद मुफ्ती ने संबंधों में आई गिरावट का जिक्र किया. उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं पता कि बाद में 1970 के दशक में हमारे नेतृत्व, शेख साहब और केंद्र के बीच क्या हुआ. हमें नहीं पता कि बातें इतनी खराब कैसे हो गईं कि शेख साहब, जिन्होंने विलय का समर्थन किया था, पूरी तरह से नाराज हो गए और कहने लगे कि अब हमें भारत नहीं चाहिए. अब हमें पाकिस्तान चाहिए, हमें जनमत संग्रह चाहिए. इस वजह से, भारत में दक्षिणपंथी ताकतों को, जो पहले से ही कहती थीं कि भारत केवल हिंदुओं के लिए है, मुसलमानों को यहां नहीं आना चाहिए, उनके लिए जम्मू-कश्मीर, जो एक मुस्लिम बहुल राज्य था और शर्तों के साथ भारत में शामिल हुआ था, एक बड़ा मुद्दा बन गया. उन्हें एक बहाना मिल गया और फिर 'एक राष्ट्र, एक ध्वज, एक संविधान' के लिए उनका अभियान तेज हो गया. यहां से शेख साहब, जो एक मुस्लिम बहुल राज्य के भारत में विलय के ध्वजवाहक थे, पूरी तरह से नाराज हो गए और जनमत संग्रह की बात करने लगे. अब जनमत संग्रह की वह मांग सिर्फ उनकी बात नहीं थी, इसकी वजह से जम्मू-कश्मीर के लोग जिंदगी भर के लिए भारत की नजरों में संदिग्ध बन गए.'

महबूबा मुफ्ती ने आरोप लगाया, 'यदि आप आज देखें, तो जम्मू-कश्मीर पूरे विश्व में सबसे अधिक सैन्यीकृत क्षेत्र है. यहां सात या आठ लाख सैनिक, सुरक्षा बल, सीआरपीएफ, बीएसएफ आदि तैनात हैं. भले ही शेख साहब बाद में 1975 में समझौते (Accord) के जरिए मुख्यधारा में वापस आ गए, उन्होंने जनमत संग्रह का नारा छोड़ दिया, पाकिस्तान की मांग छोड़ दी, लेकिन जम्मू-कश्मीर के लोगों पर जो संदेह जताया गया था, वह आज भी उनका पीछा नहीं छोड़ता.'

'370 हटाकर हमारे संविधान और अधिकारों के टुकड़े कर दिए'

धारा 370 हटाने को लेकर महबूबा मुफ्ती ने कहा, '2019 में हमारे साथ जो किया गया, जो एजेंडा था, वह पूरा हो चुका है और उसके बाद और भी सख्ती होगी, और भी कठिनाइयां आएंगी. इसलिए, मैं जो कह रही हूं उसका मकसद यह है कि आज जहां 26 अक्टूबर को छुट्टी के रूप में मनाया जाता है, मैं बीजेपी से कुछ नहीं कहना चाहती, क्योंकि हमें उनसे कोई उम्मीद नहीं है. उन्होंने पूरे देश के संविधान को तार-तार कर दिया है, वही संविधान जिसने हमें ये अधिकार दिए थे, जिसने हमें 370 दिया था, उसे उन्होंने 2019 में टुकड़े-टुकड़े कर दिया. आज पूरे देश के कानूनों, संविधान और वोट को तार-तार किया जा रहा है. मुझे उनसे कोई उम्मीद नहीं है, लेकिन इस देश के, हिंदुस्तान के लोगों से मुझे उम्मीद है.'

'यह अमन नहीं है, खौफ है'

महबूबा मुफ्ती ने घाटी के हालातों को लेकर कहा, 'आप लोगों ने थोड़े समय के लिए देखा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ क्या होता है. जब 22 जुलाई को हमारे बच्चों, हमारी लड़कियों के कपड़े फाड़े गए, युवाओं को लहूलुहान किया गया और उसके बाद 10 अक्टूबर को सात हजार लोगों को जेल में डाल दिया गया, उनसे मुचलके लिए गए. वे 2019 से यह काम कर रहे हैं, यह हमारे लिए दिनचर्या बन गया है. हम शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर भी नहीं आ सकते. हमें बाहर निकलने से मना किया जाता है, बोलने से मना किया जाता है. बीजेपी इस चुप्पी को शांति मानती है, इसे सामान्य स्थिति मानती है. यह सामान्य स्थिति नहीं है, यह खौफ है, जिसका स्वाद अब पूरा देश चख रहा है. इस समय पूरे देश में लोग देख रहे हैं कि क्या होता है, किस तरह से सख्ती से निपटा जाता है, वही जो हम, जम्मू-कश्मीर के लोग, सालों से देखते आ रहे हैं.'

'बंदूक के दम पर कब तक चलेगा राज?'

मुफ्ती ने केंद्र सरकार से कहा, 'हम आपको आपके वादों की याद दिलाना चाहते हैं, क्योंकि आपने कहा था कि हम आपको एक खूबसूरत खिड़की की तरह सजाएंगे, लेकिन आज उन्होंने हमारा सब कुछ तबाह कर दिया है. हमारे पास कुछ नहीं बचा है, हमारे युवा जेलों में सड़ रहे हैं. उनकी हालत पूछने वाला कोई नहीं है. जो नेतृत्व बचा है, उसमें से अधिकांश लोग पहले ही इतनी बीमारियों के शिकार हो चुके हैं और अगर उन्हें हाईकोर्ट से जमानत मिलती है, तो आप उसे रोक देते हैं. अगर उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलती है, तो आप उसे रोक देते हैं. यह कैसा रिश्ता है? कब तक आप उन्हें बंदूक के दम पर, कानूनों के दम पर रखेंगे और जम्मू-कश्मीर की सरजमीं पर इस तरह राज करेंगे?'

'विलय पत्र कोई कागज का टुकड़ा नहीं, देश की जनता वादों को याद रखे'

महबूबा मुफ्ती ने देश की जनता से विलय के वक्त किए गए वादों को याद करने को कहा. उन्होंने कहा, 'देश के सभी लोगों से मेरा अनुरोध है कि हमने ऐसे हिंदुस्तान से हाथ मिलाया था जो गांधी का हिंदुस्तान था, जो नेहरू का हिंदुस्तान था, अंबेडकर का हिंदुस्तान था, जिन्होंने हम सभी को अधिकार दिए. वे अधिकार जो छीने जा रहे हैं, मेरा उनसे अनुरोध है कि कृपया इसे याद रखें. यह कागज का टुकड़ा नहीं है, उस समय यहां जो भी लोकप्रिय नेता थे, या महाराजा थे, या आपका नेतृत्व जिसने आपको आजादी दिलाई, जिसने हिंदुस्तान को आजाद कराया, उन्होंने इसे प्रमाणित किया था.' वर्तमान केंद्र सरकार से कोई उम्मीद न जताते हुए, उन्होंने सीधे भारत के लोगों से मूल वादों को याद करने और यह आग्रह करने की अपील की कि जम्मू-कश्मीर के साथ संबंधों को ताकत के बजाय इंसानियत, लोकतंत्र और आपसी सम्मान के आधार पर फिर से बनाया जाए.

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About the Author

सैयद खालिद हुसैन जम्मू-कश्मीर के एक पुरस्कार विजेता पत्रकार हैं, जिन्हें 24 वर्षों से अधिक का अनुभव है. साल 2014 से 'ज़ी न्यूज़' में चीफ  स्पेशल कोरेस्पोंडेंट के रूप में काम कर रहे हैं.जी मीडिया से पहले हुसैन ने न्यूज़ 18 में नौ साल तक सीनियर कोरेस्पोंडेंट के रूप में काम किया. हुसैन ने अपने करियर की शुरुआत डीडी न्यूज से की थी. हुसैन ने अपनी तालीम श्रीनगर के पब्लिक स्कूल और डीएवी हाई स्कूल से हासिल की. फिर ग्रेजुएशन तक का सफ़र एस.पी हायर सेकेंडरी स्कूल और अमर सिंह कॉलेज से पूरा किया. उसके बाद मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई के लिए दिल्ली के सर अरबिंदो इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से पूरी की. इसके अलावा हुसैन लेखक फ़िल्म/ वीडियो कैमरा का स्पेशल कोर्स एफटीआई पुणे से कर चुके हैं.  मुंबई और दिल्ली में कई साल काम करने के बाद 2004 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर में काम करना शुरू किया. डीडी न्यूज़, डीडी कश्मीर, BAG फ़िल्म्स में फ्रीलांस काम किया. हुसैन पिछले दो दशक से भी ज्यादा समय से जम्मू-कश्मीर से जुड़े कई मुद्दों को बेहतरीन तरीके से कवर कर रहे हैं. लद्दाख से लेकर मुंबई तक हुसैन भारत के कई शहरों से रिपोर्टिंग कर चुके हैं.
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