भारत में 'रावण दहन' की परंपरा कितनी पुरानी है? आखिर कब हुई थी 'लंकेश' का पुतला जलाने की शुरुआत
दशहरे पर देशभर में घमंड और दुराचार के प्रतीक रावण का पुतला जलाया जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि देश में रावण दहन की शुरुआत कब और कैसे हुई थी.
दशहरा यानी विजयदशमी त्योहार को लेकर दो कथाएं हैं. पहला, रामायण में वर्णित है कि राम-रावण युद्ध के दसवें दिन राम ने रावण का वध किया. इसलिए इस दिन को विजयादशमी अर्थात् विजय का दसवां दिन कहा जाता है. दूसरी, कई क्षेत्रों (खासकर बंगाल, असम, ओडिशा और दक्षिण भारत) में दशहरा नवरात्रि का समापन दिवस माना जाता है. मान्यता है कि माता दुर्गा ने नौ दिनों की तपस्या और युद्ध के बाद दसवें दिन राक्षस महिषासुर का वध किया था. इसलिए इसे मां दुर्गा की विजय का दिन भी माना जाता है.
कुल मिलाकर, दशहरा इसलिए मनाया जाता है क्योंकि ये हमें याद दिलाता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में सत्य और धर्म की ही जीत होती है. भगवान राम और माता दुर्गा, दोनों की विजय इस बात का प्रमाण हैं.
वाल्मीकि रामायण में रावण वध का प्रसंग क्या है?
वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में रावण वध का विस्तृत वर्णन है. ये मुख्य रूप से सर्ग 107-111 (कुछ पाठों में 108-112 के आसपास) में आता है. रामायण में वर्णन है कि राम और रावण के बीच अंतिम युद्ध बहुत लंबा और भीषण था. राम बार-बार रावण के सिर काटते थे, लेकिन वो तुरंत फिर से उग जाते थे. रावण के पास ब्रह्मा का वरदान था, जिसके कारण साधारण अस्त्र-शस्त्र से उसकी मृत्यु संभव नहीं थी.
अंत में इंद्र के सारथि मातलि ने भगवान राम को याद दिलाया कि अब ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करने का समय आ गया है. राम ने धनुष पर वो दिव्य बाण चढ़ाया और उसे रावण पर छोड़ दिया. वो बाण रावण के हृदय में लगा और उसके प्राण हर लिए. बाण रावण के रक्त से सना हुआ वापस राम के तरकश में लौट आया. रावण रथ से नीचे गिर पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई. रावण के गिरते ही राक्षस सेना भयभीत होकर भाग गई और वानरों में हर्षोल्लास फैल गया. देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की.
रावण की मृत्यु के बाद राम ने विभीषण से कहा:
मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्.
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव॥
अर्थ - शत्रुता मृत्यु के साथ समाप्त हो जाती है. हमारा उद्देश्य पूरा हो चुका है. अब रावण का अंतिम संस्कार करो. ये तुम्हारा भाई है तो मेरा भी उतना ही है. विभीषण शुरू में इनकार करना चाहता था क्योंकि रावण ने अधर्म किया था. लेकिन भगवान राम की बातों से प्रभावित होकर विभीषण ने पूर्ण वैदिक विधि-विधान से रावण का अंतिम संस्कार किया. चंदन, पद्मक आदि की चिता बनाई गई, यज्ञीय कर्म किए गए और सभी रीति-रिवाज पूरे किए गए.
रामचरित मानस में रावण का अंत कैसे हुआ?
किंतु वाल्मिकी रामायण के विपरीत रावण वध का वर्णन रामचरित मानस में तुलसीदास ने किया है. रामचरितमानस के लंकाकाण्ड में रावण वध का वर्णन अधिक भक्ति-प्रधान शैली में किया गया है. तुलसीदास ने इसे चौपाइयों और दोहों में बहुत जीवंत और भावपूर्ण ढंग से लिखा है. तुलसीदास लिखते हैं:
काटत बढ़हिं सीस समुदाई.
जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई॥
अर्थात् — जैसे लाभ होने पर लोभ बढ़ता जाता है, वैसे ही सिर काटने पर भी वे बढ़ते जाते हैं. (युद्ध बहुत लंबा और भयंकर चलता है. राम बार-बार रावण के सिर और भुजाएं काटते हैं, लेकिन वे फिर से उग जाते हैं.)
सायक एक नाभि सर सोषा.
अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥
अर्थ: एक बाण ने रावण की नाभि में स्थित अमृत (अमृत कुंड) को सुखा दिया और बाकी बाणों ने क्रोधपूर्वक उसकी दस सिर और बीस भुजाएं काट डालीं. सिर और भुजाएं कट जाने के बाद भी रावण का धड़ (रुंड) पृथ्वी पर नाचता और गर्जना करता हुआ इधर-उधर दौड़ता रहा. तब राम ने एक और बाण से उसे दो टुकड़े कर दिया.
इस प्रकार वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में रावण वध में भिन्नता है. वाल्मीकि रामायण में रावण की मृत्यु हृदय में तीर लगने से होती है जबकि रामचरितमानस में नाभि में. संक्षेप में, रामचरितमानस में रावण वध को केवल युद्ध की घटना नहीं, बल्कि अहंकार, अधर्म और कामना के नाश के रूप में चित्रित किया गया है. इसलिए मौजूदा दशहरा त्योहार का भाव तुलसी के रामचरितमानस से अधिक प्रेरित है.
भारत में रावण दहन की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई?
यहीं ये प्रश्न उठता है कि दशहरा में रावण दहन की परंपरा कब-कहां-कैसे आरंभ हुई? वास्तव में, तुलसीदास (1532 ईस्वी से 1623 ईस्वी) के बाद उनके अनुयायियों ने उत्तर भारत में रामलीला की परंपरा शुरू की. इसके कोई सौ वर्ष बाद अंग्रेज सिविल सेवक थॉमस ट्विनिंग (Thomas Twining, 1776–1861) 1792 में भारत आए. उन्होंने 1790 के दशक में बिहार, दिल्ली समेत भारत के दूसरे क्षेत्रों की यात्रा की. उनकी यादें और नोट्स बाद में उनके बेटे ने संपादित कर “Travels in India a Hundred Years Ago” (1893) नाम से प्रकाशित की.
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कई ऐतिहासिक लेखों और स्रोतों (जैसे कुछ हिंदी समाचार और सांस्कृतिक इतिहास संबंधी सामग्री) में कहा गया है कि ट्विनिंग के यात्रा-वृत्तांत में दशहरा/रामलीला और रावण के पुतले जलाने की परंपरा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है. ये उल्लेख 18वीं शताब्दी के अंत में उत्तर भारत में रामलीला और रावण दहन की सार्वजनिक परंपरा के अस्तित्व का एक महत्वपूर्ण अंग्रेजी स्रोत माना जाता है. उस समय दिल्ली, बिहार और आसपास के क्षेत्रों में रामलीला का आयोजन और अंतिम दिन विशाल पुतले जलाने का रिवाज पहले से प्रचलित था.
ट्विनिंग ने मुख्य रूप से प्रशासनिक, सामाजिक और भौगोलिक विवरण लिखे हैं. रामलीला का जिक्र उनके देखे गए त्योहारों और स्थानीय रीति-रिवाजों के संदर्भ में आता है. ये वर्णन वाल्मीकि या तुलसीदास की कथा के नाट्य रूप को सार्वजनिक रूप से मंचित किए जाने और रावण के प्रतीकात्मक दहन को दर्शाता है. इस प्रकार, ये पता चलता है कि कम से कम 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, उत्तर भारत में रामलीला और रावण दहन की परंपरा मौजूद थी.
इसी प्रकार, जेम्स प्रिंसेप (James Prinsep, 1799–1840) के 1834 में बनाई गई लिथोग्राफ का शीर्षक है:
“Ram Leela Mela, As Performed before at Ram Nugur before the Raja of Benares”
(रामनगर में काशी नरेश के समक्ष प्रस्तुत रामलीला मेला). ये प्रिंसेप की प्रसिद्ध श्रृंखला “Benares Illustrated” (1830–1834) का हिस्सा है, जिसमें उन्होंने बनारस के विभिन्न घाटों, मंदिरों, त्योहारों और सामाजिक दृश्यों को चित्रित किया था.
31 दिनों तक चलती थी रामलीला
लिथोग्राफ ब्रिटिश लाइब्रेरी और विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम (V&A) जैसे संग्रहालयों में संरक्षित है. लिथोग्राफ के अनुसार 19वीं शताब्दी की शुरुआत में रामनगर रामलीला को शाही संरक्षण प्राप्त था. ये बनारस के राजा के संरक्षण में होती थी. उस समय काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह (शासनकाल लगभग 1796–1835) के संरक्षण में ये रामलीला पहले से चली आ रही थी. उस समय ये एक भव्य, सार्वजनिक और शाही संरक्षित आयोजन थी, जिसमें रामचरितमानस पर आधारित लीलाएं मंचित होती थी.
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आधुनिक रामनगर रामलीला (जो आज भी 31 दिनों तक चलती है और UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल है) की परंपरा इसी काल से जुड़ी हुई है. रामलीला देखने भारी भीड़ उमड़ती थी. राजा स्वयं आयोजन के दौरान उपस्थित रहते थे. कई दिनों तक उत्सव का माहौल रहता था.
इसके बाद दिल्ली के इम्पीरियल गजेटियर (Gazetteer of the Delhi District, 1883-84) में शाहजहांनाबाद (पुरानी दिल्ली) में यमुना नदी के किनारे और लाल किले के पास रामलीला/दशहरा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है.
ब्रिटिश दस्तावेज़ में लिखा है: दशहरा या रामलीला का त्योहार अश्विन (सितंबर-अक्टूबर) महीने में मनाया जाता है. शाहजहांनाबाद (पुरानी दिल्ली) में यमुना नदी के किनारे और लाल किले के पास रामलीला का आयोजन होता है, जहां अंतिम दिन (विजयादशमी) रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के बांस और कागज से बने विशाल पुतले आतिशबाजी के साथ जलाए जाते हैं.
पाकिस्तान (तत्कालीन भारत में भी होता था दशहरा दहन)
ये गजेटियर ब्रिटिश शासनकाल का आधिकारिक रिकॉर्ड है और रामलीला और रावण दहन की परंपरा के ऐतिहासिक प्रमाणों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. इससे स्पष्ट होता है कि लाल किले के आसपास यमुना किनारे यह उत्सव उस समय नियमित रूप से मनाया जाता था.
इस तरह, ब्रिटिश कालीन दस्तावेजों के अनुसार रामलीला परंपरा लगभग 1800 या उससे पहले (मुगल काल के संदर्भों सहित) से चली आ रही है. कोटा (राजस्थान) का दशहरा मेला 1723 से जुड़ा बताया जाता है. 20वीं सदी की शुरुआत में (1920-40 के दशक) पाकिस्तान के क्वेटा, लाहौर, कराची, एबोटाबाद आदि (तब ब्रिटिश भारत के पंजाब/उत्तर-पश्चिम क्षेत्र) में रावण दहन की तस्वीरें मौजूद हैं.
ऐसे में प्रश्न उठता है कि आधुनिक रूप में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले को आतिशबाजी के साथ जलाने की परंपरा कब से शुरू हुई. वास्तव में, कई लोकप्रिय लेखों में दावा किया जाता है कि बड़े पैमाने पर सार्वजनिक रावण दहन 1948 में रांची (तब बिहार) में पाकिस्तान (बन्नू) से आए शरणार्थियों ने शुरू किया. इसके अलावा, दिल्ली में रामलीला मैदान में 17 अक्टूबर 1953 को, पटना के गांधी मैदान में 1955 के आसपास रावण के विशाल पुतले का दहन हुई.
क्या पुतला दहन का इतिहास 250 साल पुराना है?
ये शहरों में बड़े आयोजनों की शुरुआत या विस्तार थे. किंतु, ये पहले से थी. 1947 के बाद आतिशबाजी/पटाखों का अधिक इस्तेमाल, विशाल पुतले (50-200+ फीट) और देशभर में व्यापक प्रसार बढ़ा. संक्षेप में रावण दहन की प्रतीकात्मक सार्वजनिक परंपरा कम से कम 200-250 साल से अधिक पुरानी है.
पौराणिक विजय उत्सव हजारों साल पुराना है, लेकिन विशाल पुतले और आतिशबाजी वाला आधुनिक भव्य रूप मुख्यतः 19वीं-20वीं शताब्दी में विकसित हुआ और स्वतंत्रता के बाद और लोकप्रिय हुआ. ये बुराई (अहंकार, काम, क्रोध आदि रावण के दस सिरों के प्रतीक) पर अच्छाई की जीत का सांस्कृतिक उत्सव है.