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Opinion: डायन प्रताड़ना के खिलाफ कब तक नाकाफी साबित होंगे कानून?

भारत में डायन प्रताड़ना के खिलाफ अलग से कोई केंद्रीय कानून नहीं है. ऐसे मामलों में हत्या जैसे गंभीर अपराधों के लिए भारतीय न्याय संहिता की आपराधिक धाराओं का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसी कमी को देखते हुए कई राज्यों ने अपने-अपने विशेष कानून बनाए हैं.

Opinion: डायन प्रताड़ना के खिलाफ कब तक नाकाफी साबित होंगे कानून?
Image Credit: Zee Creative

असम की एक अदालत ने 1995 में 80 साल की मारिया बोरो की हत्या के मामले में गत बुधवार को छह लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई. अभियोजन के मुताबिक, मारिया बोरो को डायन बताकर पीटा गया और जला दिया गया था. घटना के करीब 31 साल बाद अदालत का फैसला आया.  

ये मामला पुराना था लेकिन आज भी डायन के नाम पर हिंसा पर रोक नहीं लग पाई है. हाल ही में 22 अगस्त को झारखंड के गढ़वा जिले में 55 साल की दिलबसिया देवी के साथ कथित तौर पर मारपीट की गई और उनके शरीर पर खौलता पानी डाल दिया गया. आरोप था कि वह डायन हैं.

घटना के बाद पुलिस ने छह लोगों को गिरफ्तार किया. आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता के साथ डायन-प्रथा रोकथाम कानून के तहत भी मामला दर्ज किया गया. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए जिला प्रशासन और पुलिस से रिपोर्ट मांगी.

मार्च 2026 में झारखंड के गोड्डा में एक आदिवासी दंपति और उनके करीब 12 साल के बेटे की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई. पुलिस की शुरुआती जांच में हत्या के पीछे जादू-टोने का शक सामने आया. इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था. पुलिस के मुताबिक आरोपियों ने पूछताछ में बताया कि उन्हें शक था कि परिवार जादू-टोना करता है.

जुलाई में खूंटी में 75 वर्षीय एतवारी देवी की हत्या का मामला सामने आया. पुलिस ने दो युवकों को गिरफ्तार किया. पुलिस के मुताबिक आरोपियों को शक था कि महिला के गोद में एक बच्चे के आने के बाद उसके बीमार पड़ने और परिवार में हुई दूसरी घटनाओं के पीछे उसका जादू-टोना था.

जनवरी में इसी जिले में छह वर्षीय विष्णु मुंडा की हत्या का मामला सामने आया था. बच्चे के पिता ने आरोप लगाया कि यह हत्या उस विवाद से जुड़ी थी जिसमें पहले उसकी पत्नी को गांव में डायन बताया गया था. पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया.

इन घटनाओं को अलग-अलग अपराध की तरह देखा जा सकता है लेकिन एक साथ देखने पर एक बड़ा सवाल सामने आता है कि क्या भारत में डायन बताकर होने वाली हिंसा सिर्फ अंधविश्वास का मामला है या इसके पीछे कानून, स्वास्थ्य व्यवस्था, सामाजिक संबंध और संपत्ति जैसे कई दूसरे कारण भी काम कर रहे हैं?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने मुद्दे को फिर केंद्र में ला दिया

हाल ही में 13 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के 1998 के एक मामले में हत्या के दोषी की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी. मामला पुनी नाइक की हत्या से जुड़ा था.

आरोप था कि परिवार में एक बच्ची की मौत के बाद पुनी नाइक पर जादू-टोना करने का आरोप लगाया गया और उसे घर से खींचकर लाठी से पीटा गया, जिससे उसकी मौत हो गई.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सिर्फ दोषसिद्धि पर फैसला नहीं दिया, बल्कि डायन के नाम पर होने वाली हिंसा की सामाजिक पृष्ठभूमि पर भी टिप्पणी की.

अदालत ने कहा कि डायन के नाम पर उत्पीड़न अभी भी समाज के उन हिस्सों में मौजूद है, जहां पूर्वाग्रह, अंधविश्वास और अतार्किक भय कानून के शासन तथा संवैधानिक नैतिकता पर हावी हो जाते हैं.

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी हिंसा सिर्फ हत्या तक सीमित नहीं रहती, महिलाओं को मारपीट, यातना, यौन हिंसा और सामाजिक बहिष्कार का सामना भी करना पड़ सकता है.

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह था कि मुश्किल परिस्थितियों में किसी महिला को दोषी ठहराना आसान रास्ता बन जाता है यानी समस्या का समाधान खोजने के बजाय एक व्यक्ति को जिम्मेदार बना देना.

यही शायद इस पूरे मुद्दे को समझने की सबसे जरूरी कुंजी है.

आखिर डायन कौन बनती है?

किसी गांव में अचानक किसी बच्चे की तबीयत खराब होती है. किसी बुजुर्ग की मौत हो जाती है. परिवार में कोई दुर्घटना हो जाती है. मवेशी मर जाता है.

इन घटनाओं का कारण बीमारी, संक्रमण, दुर्घटना या कोई दूसरी वास्तविक वजह हो सकती है. लेकिन जब वैज्ञानिक जानकारी और चिकित्सा सुविधा तक पहुंच सीमित होती है तो घटना की व्याख्या अंधविश्वास के जरिए होने लगती है.

फिर किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने की जरूरत महसूस होती है. और कई मामलों में वह एक महिला होती है.

खूंटी के एतवारी देवी मामले में भी पुलिस की शुरुआती जांच में बच्चे के बीमार पड़ने और परिवार में हुई दूसरी घटना को महिला के खिलाफ शक का आधार बताया गया था. इस तरह एक बीमारी या मौत से शुरू हुई बात आरोप तक पहुंचती है और आरोप हिंसा में बदल जाता है.

लेकिन कहानी सिर्फ अंधविश्वास की नहीं है. डायन के आरोपों को सिर्फ अंधविश्वास का परिणाम मानना इस समस्या को अधूरा समझना होगा. जमीनी अध्ययनों और मामलों की जांच में कई बार व्यक्तिगत दुश्मनी, पारिवारिक विवाद, जमीन-संपत्ति और सामाजिक वर्चस्व जैसे पहलू भी सामने आते हैं.

झारखंड में डायन के नाम पर उत्पीड़न मामलों पर किए गए हालिया अध्ययन में भी यह बताया गया है कि कई मामलों में पुराने पारिवारिक या पड़ोसी विवाद, बीमारी और मौत के बाद पैदा हुए आरोपों के साथ मिल जाते हैं.

यानी यह जरूरी नहीं कि किसी महिला को डायन मानने वाला व्यक्ति केवल अंधविश्वासी हो. कई बार पहले से मौजूद विवाद को अंधविश्वास का आधार मिल जाता है.

कानून की कमी कितनी बड़ी समस्या है?

भारत में डायन प्रताड़ना के खिलाफ अभी कोई अलग व्यापक केंद्रीय कानून नहीं है. हत्या, चोट, धमकी और दूसरे अपराधों के लिए सामान्य आपराधिक कानून लागू किए जाते हैं. हालांकि कई राज्यों ने अपने विशेष कानून बनाए हैं.

  • बिहार में 1999 में डायन प्रथा प्रतिषेध कानून आया.
  • झारखंड में 2001 में कानून बना.
  • छत्तीसगढ़ में टोनही प्रताड़ना के खिलाफ कानून है.
  • ओडिशा ने 2013 में Prevention of Witch-hunting Act बनाया.
  • राजस्थान में 2015 में विशेष कानून आया.
  • असम में भी डायन-प्रथा  के खिलाफ विशेष कानून बनाया गया.

इसके बावजूद घटनाएं सामने आ रही हैं. इसका मतलब यह नहीं कि कानून बेअसर हैं बल्कि यह दर्शाता है कि कानून बनाने और उसे धरातल पर लागू करने में गहरा अंतर है.

NCRB के आंकड़े क्या कहते हैं?

NCRB के उपलब्ध आंकड़ों में डायन-प्रथा  को हत्या के मकसद के रूप में अलग से दर्ज किया गया है.

2000 से 2021 के बीच उपलब्ध आंकड़ों को जोड़ने पर ऐसे 3,077 हत्याकांड सामने आते हैं जिनमें पुलिस रिकॉर्ड में डायन-प्रथा को मोटिव बताया गया था. इनमें 2011 में 240 मामले दर्ज हुए थे जबकि 2021 में यह संख्या 68 थी.

लेकिन इन आंकड़ों को सावधानी से समझना होगा. ये डायन-प्रताड़ना के कुल मामले नहीं हैं. ये केवल वे हत्याएं हैं जिनमें जादू-टोना को मोटिव के रूप में दर्ज किया गया. मारपीट, सामाजिक बहिष्कार, संपत्ति से बेदखली, धमकी और दूसरी तरह की प्रताड़ना इसमें पूरी तरह शामिल नहीं हैं.

इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि सरकारी आंकड़े समस्या का न्यूनतम दिखाई देने वाला हिस्सा बताते हैं.

हालांकि उपलब्ध आंकड़ों को ही देंखे तो भी झारखंड डायन-बिसाही के संदेह में हत्या के मामले में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में रहा है.

2001 से 2021 के बीच अकेले झारखंड में 593 महिलाओं की हत्या  जादू-टोना के आरोप से जुड़ी बताई गई है. हाल की घटनाएं भी इस चिंता को बढ़ाती हैं.

समाधान क्या है? इस समस्या का कोई एक समाधान नहीं है. 

पहला, पुलिस को डायन के आरोप वाली हर शिकायत को गंभीरता से लेना होगा. इसे गांव का निजी विवाद मानकर छोड़ना खतरनाक हो सकता है.

दूसरा, एफआईआर में केवल हत्या या मारपीट दर्ज करने के बजाय अगर घटना की पृष्ठभूमि  जादू-टोना है तो उसे जांच में स्पष्ट रूप से दर्ज करना जरूरी है. इससे भविष्य के सरकारी आंकड़े भी बेहतर होंगे.

तीसरा, ऐसे मामलों में जमीन और संपत्ति विवाद की भी जांच होनी चाहिए.

चौथा, प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन और पुलिस मिलकर जागरूकता अभियान चलाएं.

पांचवां, पीड़ित महिलाओं के लिए सिर्फ कानूनी सहायता नहीं, बल्कि सुरक्षित आवास, आर्थिक सहायता और पुनर्वास की व्यवस्था हो.

छठा, स्कूलों तथा स्थानीय समुदायों में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना होगा.

गढ़वा में छह गिरफ्तारियां, गोड्डा में त्वरित पुलिस कार्रवाई और खूंटी में आरोपियों की गिरफ्तारी यह दिखाती है कि कानून लागू किया जाए तो कार्रवाई संभव है लेकिन दूसरी तरफ लगातार सामने आते मामले बताते हैं कि रोकथाम की व्यवस्था अभी पर्याप्त नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अगस्त 2026 के फैसले में कहा कि अंधविश्वास और अतार्किक डर को कानून के शासन तथा संवैधानिक नैतिकता पर हावी नहीं होने दिया जा सकता. यही इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है.

डायन के नाम पर हिंसा को खत्म करने के लिए सिर्फ अंधविश्वास से लड़ना पर्याप्त नहीं है.

हमें उस व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा जो बीमारी के समय डॉक्टर उपलब्ध कराए, विवाद के समय पुलिस उपलब्ध कराए, संपत्ति के मामले में महिला के अधिकार की रक्षा करे और पहली शिकायत पर ही हिंसा को रोक दे.

क्योंकि किसी महिला को डायन कहने का आरोप भले एक गांव से शुरू हो लेकिन उसे रोकने की जिम्मेदारी पूरे राज्य की है.

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About the Author

Amit Singh

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अमित सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकारों और डिजिटल मीडिया संपादकों में शामिल हैं. राजनीति, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति और सामाजिक मुद्दों पर लेखन का उन्हें 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. अपने लंबे पत्रकारिता करियर में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों की रिपोर्टिंग, विश्लेषण और संपादकीय नेतृत्व किया है. उनकी पहचान तथ्यों पर आधारित, संतुलित और गहन विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. वर्तमान में अमित सिंह Zee News की हिंदी वेबसाइट के संपादक हैं. इस भूमिका में वे संपादकीय दिशा तय करने, विशेष कवरेज की रणनीति बनाने और डिजिटल न्यूज़रूम के संचालन का नेतृत्व करते हैं.पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए अमित को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards से सम्मानित किया जा चुका है. यह सम्मान उनकी पेशेवर विश्वसनीयता, खोजी दृष्टि और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभावशाली पत्रकारिता का प्रमाण है.अमित ने अपने करियर के दौरान भारत के अग्रणी मीडिया संस्थानों The Wire, Tehelka, Dainik Jagran, Hindustan और Aaj Tak में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है. उन्हें प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है. आप अमित सिंह से सीधे amit.singh@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं.
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