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बिल्डिंग में कोई हादसा हो या किसी की मौत, मेरी जिम्मेदारी नहीं... मालिक ने पहले ही 'डेथ एग्रीमेंट' पर करा लिया था साइन!

Delhi Hostel Collapse: दिल्ली में हॉस्टल के रेंट एग्रीमेंट में मिला हैरान करने वाला क्लॉज; इमारत ढहने पर भी मालिक पर नहीं आएगी आंच. जांच में उड़े अफसरों के होश, पढ़ें पूरा मामला.

Written By Ravindra Pratap Singh
Published: Sep 07, 2026, 06:10 PM IST | Updated: Sep 07, 2026, 07:46 PM IST
Image Credit: दिल्ली के बिल्डिंग हादसे के बाद आज हरिराम बंसल के अलावा उनकी पत्नी उर्मिला और बेटा महेश बंसल को गिरफ्तार कर लिया गया है. ये मकान हरिराम बंसल की पत्नी उर्मिला के नाम से दर्ज है जबकि बिजली का कनेक्शन उनके बेटे महेश बंसल के नाम से था.
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दिल्ली के सत्य निकेतन में ढहे ‘Hostel Daze’ को लेकर अब सिर्फ इमारत की हालत और निर्माण की जांच ही सवालों के घेरे में नहीं है. बल्कि हादसे के बाद सामने आया रेंट एग्रीमेंट, जो हादसे के बाद छात्रों का 'डेथ एग्रीमेंट' बन गया, उसको लेकर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है. इस हादसे में हॉस्टल में रहने वाले सात लोगों की जान चली गई थी. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एग्रीमेंट में छात्रों से तीन महीने की सिक्योरिटी और एक महीने का एडवांस किराया लेने की बात लिखी है. लेकिन इसी दस्तावेज में एक ऐसी शर्त भी है, जिसने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है.

मकान मालिक हरिराम बंसल के इस एग्रीमेंट में जो रेंट एग्रीमेंट कम और  'डेथ एग्रीमेंट' ज्यादा था उसमें लिखा है कि किसी भी तरह की दुर्घटना या जोखिम की स्थिति में पीजी प्रबंधन छात्र के प्रति जिम्मेदार नहीं होगा. एग्रीमेंट को पढ़ने पर साफ दिखता है कि छात्र के लिए कई नियम तय किए गए थे. सिक्योरिटी रकम एग्रीमेंट की अवधि खत्म होने से पहले किसी भी स्थिति में वापस नहीं करने की बात कही गई है. कमरे के फर्नीचर या दूसरी चीजों को नुकसान पहुंचने पर उसका खर्च सिक्योरिटी से काटने का प्रावधान भी है.

बिल्डिंग हादसे के बाद आज हरिराम बंसल के अलावा उनकी पत्नी उर्मिला और बेटा महेश बंसल को गिरफ्तार कर लिया गया है. ये मकान हरिराम बंसल की पत्नी उर्मिला के नाम से दर्ज है जबकि बिजली का कनेक्शन उनके बेटे महेश बंसल के नाम से था.

क्या थीं 'डेथ एग्रीमेंट' की शर्तें, जानिए

इस 'हॉस्टल डेज' नाम की इमारत को जिन छात्रों ने किराए पर लिया था उनके 'डेथ एग्रीमेंट' की शर्तों में लिखा था, छात्रों को दीवारों पर पोस्टर या स्टिकर लगाने तक की मनाही थी. इतना ही नहीं, अगर कोई छात्र तय अवधि पूरी होने से पहले हॉस्टल छोड़ता है, तो हॉस्टल फीस और सिक्योरिटी वापस नहीं मिलने की शर्त रखी गई थी. यानी किराएदार के लिए नियम काफी सख्त थे. लेकिन सवाल यह है कि जिस जगह छात्र रह रहे थे, उनकी सुरक्षा को लेकर हॉस्टल प्रबंधन की जिम्मेदारी आखिर कितनी थी?

हादसा, आग या भूकंप… कई स्थितियों में मुआवजे से इनकार

इसी हॉस्टल से जुड़े एक दूसरे टर्म्स एंड कंडीशंस दस्तावेज में भी ऐसी शर्तें हैं, जिन पर अब सवाल उठ रहे हैं. इसमें व्यक्तिगत चोट, सामान के नुकसान या दूसरी घटनाओं के लिए हॉस्टल को जिम्मेदार नहीं मानने की बात कही गई है, अगर घटना ऐसी परिस्थितियों में हुई हो जो प्रबंधन के नियंत्रण से बाहर हों. इनमें आग, भूकंप, भारी बारिश और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं जैसी स्थितियों का जिक्र है. डॉक्यूमेंट्स में प्रबंधन को जरूरत पड़ने पर छात्र का कमरा या हॉस्टल की लोकेशन बदलने का अधिकार भी दिया गया था. अनुशासन से जुड़ी किसी शिकायत पर छात्र को तुरंत बाहर करने और फीस या सिक्योरिटी वापस नहीं करने की शर्त भी मौजूद थी.

जिस इमारत में छात्र रह रहे थे, उसकी उम्र करीब 50 साल थी

अब बात उस इमारत की, जिसके ढहने से सात लोगों की जान चली गई. सत्य निकेतन की यह पांच मंजिला इमारत करीब 50 साल पुरानी बताई जा रही है. एक वरिष्ठ एमसीडी अधिकारी के मुताबिक, यह एक पुनर्वास कॉलोनी में करीब 55 वर्ग गज जमीन पर बनी थी. अधिकारी के मुताबिक, इस जगह पर सिर्फ दो मंजिल तक निर्माण की अनुमति थी. इमारत का कोई स्वीकृत बिल्डिंग प्लान भी नहीं था. इसके बावजूद पुरानी और जर्जर इमारत को दोबारा तैयार किया गया और उसमें छात्रों के रहने की व्यवस्था शुरू कर दी गई.

DU के करीब होने से मिल रहा था ज्यादा किराया

सत्य निकेतन की लोकेशन दिल्ली यूनिवर्सिटी के काफी करीब है. देश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों छात्र पढ़ाई के लिए दिल्ली आते हैं और उन्हें रहने के लिए ऐसे हॉस्टल और पीजी की लगातार जरूरत रहती है. इसी वजह से इलाके में छात्रों के लिए कमरे किराए पर देना बड़ा कारोबार बन चुका है. बताया जा रहा है कि इमारत के मालिक हरिराम बंसल ने कई महीनों तक इसमें निर्माण और मरम्मत का काम कराया. अगस्त में यहां छात्रों को कमरे दिए जाने शुरू हुए. करीब 30 कमरों वाली इस इमारत में ज्यादातर छात्र रह रहे थे. हर कमरे में दो से तीन छात्रों के रहने की व्यवस्था बताई गई है.

कंस्ट्रक्शन पूरा भी नहीं हुआ, रहने लगे थे छात्र

हादसे से जुड़ी सबसे चिंताजनक बातों में से एक यह भी है कि जब इमारत गिरी, तब वहां निर्माण का काम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था. घटना के समय बेसमेंट में मजदूर काम कर रहे थे. मलबे से 11 लोगों को बचाया गया, जिनमें दो मजदूर भी शामिल थे. इनमें से एक मजदूर की बाद में मौत हो गई. ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी. सवाल यह भी है कि निर्माण और मरम्मत का काम चलने के दौरान छात्रों को वहां रहने की अनुमति कैसे मिली?

बगल वाली इमारत को भी MCD ने बताया था खतरनाक

हादसे से एक दिन पहले, 6 सितंबर को दिल्ली नगर निगम ने सत्य निकेतन की बगल की संपत्ति नंबर 13 को लेकर एक आदेश जारी किया था. एमसीडी ने मालिक या कब्जेदार को इमारत गिराने का निर्देश दिया था. आदेश में आसपास रहने वाले लोगों, आने-जाने वालों और पड़ोसी इमारतों के लिए खतरे का हवाला दिया गया था. हालांकि, जिस इमारत के गिरने से हादसा हुआ, वह संपत्ति नंबर 14 थी. यह अंतर अब जांच का एक अहम हिस्सा हो सकता है कि आखिर आसपास की इमारतों की स्थिति को लेकर प्रशासन के पास क्या जानकारी थी और क्या कार्रवाई की गई.

रिहायशी इमारत में चल रहा था हॉस्टल?

एक और बड़ा सवाल इमारत के इस्तेमाल को लेकर है. बताया जा रहा है कि यह इमारत मूल रूप से रिहायशी थी. वहां व्यावसायिक गतिविधि के तौर पर पेइंग-गेस्ट हॉस्टल चलाने की अनुमति नहीं थी. फिर भी उसमें दर्जनों छात्रों को रखा गया. अब जांच एजेंसियों के सामने यह पता लगाना अहम होगा कि इमारत का इस्तेमाल हॉस्टल के तौर पर कब से किया जा रहा था, इसकी जानकारी किन विभागों को थी और जरूरी अनुमति के बिना छात्रों को वहां रहने की इजाजत कैसे मिली.

हाईकोर्ट ने भी हॉस्टलों की हालत पर जताई चिंता

इस हादसे के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले में हाई लेवल जांच के आदेश दिए हैं. सुनवाई के दौरान अदालत ने दिल्ली से बाहर से पढ़ाई करने आने वाले छात्रों के लिए उपलब्ध हॉस्टल सुविधाओं की स्थिति पर भी गंभीर टिप्पणी की और इसे बेहद खराब बताया. यह टिप्पणी सिर्फ एक इमारत तक सीमित नहीं है. यह दिल्ली में छात्रों के लिए चल रहे पीजी और हॉस्टल सिस्टम की निगरानी पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है.

हादसे के बाद एमसीडी के पांच अधिकारी सस्पेंड

घटना के एक दिन बाद दिल्ली नगर निगम ने दक्षिण क्षेत्र के पांच अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया. इनमें डिप्टी कमिश्नर राकेश कुमार, सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर रणवीर सिंह, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ललित कुमार गोयल, असिस्टेंट इंजीनियर सुनील चौहान और जूनियर इंजीनियर आशीष कुमार शामिल हैं. अब जांच का फोकस यही है कि इमारत की हालत की जानकारी प्रशासन को पहले से थी या नहीं, निर्माण के दौरान नियमों का पालन हुआ या नहीं और सबसे अहम, छात्रों को ऐसी इमारत में रहने की अनुमति आखिर कैसे मिली. सात लोगों की मौत के बाद सामने आया रेंट एग्रीमेंट इस पूरे मामले का एक और पहलू सामने रखता है. छात्रों से फीस और सिक्योरिटी लेने के साथ उनकी जिम्मेदारियां तय कर दी गई थीं, लेकिन उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी को लेकर अब कई सवाल पूछे जा रहे हैं.

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About the Author

रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
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