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BRICS Summit: भारत की अगुवाई में नया मोड़ लेगा BRICS? इन 4 बड़े एजेंडों से पश्चिमी देशों को लग सकती है मिर्ची

क्या भारत के नेतृत्व में ब्रिक्स नया मोड़ लेने जा रहा है? जानिए वे 4 प्रमुख एजेंडे लोकल करेंसी ट्रेड से लेकर ग्लोबल साउथ के नए समीकरण तक, जो पश्चिमी देशों और अमेरिकी डॉलर के दबदबे को सीधी चुनौती दे सकते हैं.

Written By Ravindra Pratap Singh
Published: Sep 02, 2026, 08:23 PM IST | Updated: Sep 02, 2026, 08:34 PM IST
Image Credit: BRICS शिखर सम्मेलन में भारत की कोशिश है कि सदस्य देशों के बीच सभी अहम मुद्दों पर सहमति बनाई जाए
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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 की अध्यक्षता इस साल भारत कर रहा है और इसी क्रम में 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा. इस बैठक में ब्रिक्स के सदस्य देशों और साझेदार देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ उन देशों के नेता भी शामिल होंगे, जिन्हें आउटरीच कार्यक्रम के तहत आमंत्रित किया गया है. सम्मेलन के दौरान वैश्विक और साझा हितों से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है. BRICS अब सिर्फ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह नहीं रह गया है. दुनिया की बदलती भू-राजनीति के बीच यह मंच लगातार अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है.

भारत भी BRICS को लेकर अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने में जुटा है. ऐसे में अगर नई दिल्ली की सोच के मुताबिक संगठन के एजेंडे को दिशा मिलती है, तो इसका असर वैश्विक राजनीति और आर्थिक व्यवस्था दोनों पर दिखाई दे सकता है. खास बात यह है कि BRICS के भीतर जिन मुद्दों पर जोर बढ़ रहा है, उनमें से कुछ सीधे तौर पर पश्चिमी देशों की मौजूदा आर्थिक और रणनीतिक व्यवस्था को चुनौती दे सकते हैं. यही वजह है कि भारत की सक्रिय भूमिका पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की नजर बनी हुई है.

डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश

BRICS के एजेंडे में सबसे अहम मुद्दों में से एक स्थानीय मुद्राओं में कारोबार को बढ़ावा देना है. भारत लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अलग-अलग देशों की अपनी मुद्राओं के इस्तेमाल के विकल्प बढ़ने चाहिए. अगर BRICS देश आपसी कारोबार में डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो लंबे समय में इसका असर मौजूदा वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर पड़ सकता है. हालांकि इसे डॉलर का तत्काल विकल्प मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसकी दिशा पश्चिमी देशों के लिए चिंता का विषय जरूर बन सकती है.

ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती

भारत लगातार ग्लोबल साउथ के देशों की चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है. BRICS के जरिए भी विकासशील देशों की आवाज को ज्यादा प्रभावी बनाने की कोशिश हो रही है. कर्ज, विकास, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को सामने लाना भारत के एजेंडे का अहम हिस्सा है. अगर BRICS इस दिशा में और मजबूत होता है, तो वैश्विक संस्थाओं में पश्चिमी देशों के प्रभाव को संतुलित करने की मांग भी तेज हो सकती है.

कारोबार और सप्लाई चेन में नई तस्वीर

दुनिया में जिस तरह व्यापारिक तनाव बढ़ा है, उसके बीच सप्लाई चेन को मजबूत करना भी BRICS देशों के लिए अहम हो गया है. भारत चाहता है कि सदस्य देश आपसी व्यापार और निवेश को बढ़ाएं और जरूरी वस्तुओं के लिए कुछ चुनिंदा देशों पर निर्भरता कम करें. ऊर्जा, खाद्य पदार्थ, खनिज और तकनीक जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने से BRICS देशों के बीच आर्थिक रिश्ते और गहरे हो सकते हैं. इसका असर वैश्विक व्यापार के मौजूदा समीकरणों पर भी पड़ सकता है.

पश्चिमी दबदबे के बीच नई वैश्विक व्यवस्था?

BRICS की सबसे बड़ी चर्चा अब इसी सवाल को लेकर है कि क्या यह समूह धीरे-धीरे मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के सामने एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र बन सकता है. भारत का रुख हालांकि किसी एक देश या समूह के खिलाफ मोर्चा बनाने से ज्यादा बहुध्रुवीय दुनिया को बढ़ावा देने का रहा है. यही अंतर BRICS की पूरी कहानी को दिलचस्प बनाता है. भारत एक तरफ पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ BRICS और ग्लोबल साउथ के मंचों पर अपनी स्वतंत्र भूमिका भी बनाए हुए है. आने वाले समय में अगर इन चारों एजेंडों पर BRICS के भीतर ठोस प्रगति होती है, तो वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन की तस्वीर बदल सकती है. फिलहाल इतना तय है कि BRICS अब ऐसा मंच नहीं है, जिसे पश्चिमी देश नजरअंदाज कर सकें.

पश्चिम देशों के खिलाफ मंच नहीं बनेगा BRICS

BRICS शिखर सम्मेलन में भारत की कोशिश है कि सदस्य देशों के बीच सभी अहम मुद्दों पर सहमति बनाई जाए और बैठक के अंत में साझा सहमति से एक संयुक्त बयान जारी हो. हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष इस राह में सबसे बड़ी अड़चन बन सकता है. सूत्रों के मुताबिक, भारत ने अपनी अध्यक्षता को लेकर रुख साफ कर दिया है. उसका कहना है कि BRICS को अमेरिका या किसी पश्चिमी देश के विरोध में खड़े मंच के तौर पर पेश नहीं किया जाना चाहिए. इसी वजह से पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष को लेकर संयुक्त बयान में शामिल की जाने वाली भाषा पर भारत काफी सावधानी बरत रहा है.

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About the Author

रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
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