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अमेरिका में पहले मुस्लिम सीनेटर की जीत पर गदगद हुए ओवैसी, कहा-'अब अब्दुल नहीं बिछाएगा दरी'

अमेरिका में मुस्लिम नेता अब्दुल अल-सैयद की जीत पर AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने खुशी जाहिर की है. उन्होंने यूपी के मुस्लिम मतदाताओं से अपनी सियासी ताकत पहचानने और सियासी पार्टियों के लिए दरी बिछाने के बजाय नेतृत्व संभालने की अपील की है.

अमेरिका में पहले मुस्लिम सीनेटर की जीत पर गदगद हुए ओवैसी, कहा-'अब अब्दुल नहीं बिछाएगा दरी'
Image Credit: असदुद्दीन ओवैसी का बड़ा बयान, 'अमेरिका में अब्दुल जीता, अब नहीं बिछाएंगे दरी'

अमेरिका के मिशिगन में हाल ही में एक राजनीतिक जीत ने दुनिया भर के लोगों का ध्यान खींचा है. इस जीत के बाद से भारत में, खासकर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में एक नई चर्चा छिड़ गई है. सोशल मीडिया और राजनीतिक बहसों में अब यह सवाल गहराई से उठने लगा है कि जब समंदर पार एक 'अब्दुल' अपनी मेहनत और ताकत से मुकाम हासिल कर सकता है, तो फिर उत्तर प्रदेश के अब्दुल को अपनी सियासी और सामाजिक पहचान को मजबूत करने के लिए आगे क्यों नहीं आना चाहिए?

बीते कुछ सालों में एक खास राजनीतिक विचारधारा और विरोधी ताकतों ने 'अब्दुल' नाम का इस्तेमाल एक तंज या राजनीतिक प्रतीक के रूप में करने की भरपूर कोशिश की है. इस नाम को एक खास खांचे में फिट करने और समाज के एक बड़े वर्ग को कमतर दिखाने का प्रयास लगातार किया गया है. लेकिन अब समय बदल रहा है. इस तरह के तंज और फब्तियों का जवाब देने के लिए केवल नाराजगी काफी नहीं है, बल्कि अपनी काबिलियत और एकता से एक मजबूत संदेश देने की जरूरत है.

 

 

यूएस में पहली जीते से उत्साहित ओवैसी- अब दरी नहीं बिछाएंगे

ओवैसी ने अमेरिका में अब्दुल की जीत को लेकर उत्साह जताते हुए अपने सोशल मीडिया के एक्स हैंडल पर लिखा, 'एक अब्दुल मिशिगन में जीत गया, अब उत्तर प्रदेश के अब्दुल को अपनी सियासी पहचान मजबूत करनी होगी. संघियों ने 'अब्दुल' को एक तंज में बदलने की बहुत कोशिश की है. वक्त आ गया है कि हम दिखाएं कि अब्दुल अल्लाह के सिवा किसी की गुलामी नहीं करता. अब दरी नहीं बिछाएंगे.' इस सोच के पीछे मुख्य भावना यह है कि हर इंसान, चाहे उसकी आस्था या नाम कुछ भी हो, सिर्फ और सिर्फ सर्वशक्तिमान ईश्वर के आगे झुकता है. वह किसी अन्य शक्ति या विचारधारा का गुलाम नहीं बन सकता. यही स्वाभिमान उत्तर प्रदेश के युवाओं और राजनीतिक रूप से जागरूक लोगों की सबसे बड़ी ताकत बनना चाहिए.

सत्ता में अपनी हिस्सेदारी तय करने का वक्त आ गया

उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास गवाह है कि दशकों तक एक बड़े समुदाय को सिर्फ रैलियों में भीड़ जुटाने, नारे लगाने और नेताओं के आने पर 'दरी बिछाने' तक सीमित रखा गया. चुनाव के वक्त इस्तेमाल होने और उसके बाद हक की बात आने पर हाशिए पर धकेल दिए जाने की इस संस्कृति ने समाज का बहुत नुकसान किया है. अब वक्त आ गया है कि इस दबे-कुचले दायरे से बाहर निकला जाए. सिर्फ चुनाव जिताने का जरिया बनने के बजाय, नीति-निर्माण और सत्ता की मुख्यधारा में अपनी हिस्सेदारी तय करनी होगी. जब तक समाज के लोग खुद आगे आकर अपनी नुमाइंदगी मजबूत नहीं करेंगे, तब तक हालात नहीं बदलेंगे.

आत्मनिर्भरता और नेतृत्व की ओर कदम

मिशिगन की जीत ने यह साबित कर दिया है कि अगर दिशा साफ हो और मेहनत सही दिशा में हो, तो कोई भी रुकावट लंबी नहीं टिक सकती. उत्तर प्रदेश के युवाओं को शिक्षा, रोजगार, और राजनीतिक साक्षरता के जरिए अपनी पहचान को और मजबूत करना होगा. अब पिछलग्गू बनकर राजनीति करने के बजाय लीडरशिप की भूमिका निभानी होगी. यह समय एकजुट होने, अपनी योग्यताओं को निखारने और लोकतांत्रिक दायरे में रहते हुए अपने अधिकारों के लिए मुखर होने का है. जब उत्तर प्रदेश का हर 'अब्दुल' अपने आत्मसम्मान और हक के साथ खड़ा होगा, तो कोई भी तंज या राजनीतिक चाल उसकी उड़ान को रोक नहीं पाएगी. बदलाव की इस बयार में अब पीछे मुड़कर देखने का कोई सवाल ही नहीं उठता.

US का पहला मुस्लिम सीनेटर बन अब्दुल अल-सैयद ने रचा इतिहास

मिशिगन सीनेट चुनाव के नतीजे सामने आ चुके हैं. डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता अब्दुल अल-सैयद ने जीत दर्ज कर अमेरिकी इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है. वह अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बन गए हैं. कड़े मुकाबले में उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के माइक रोजर्स को 1,27,412 वोटों के अंतर से हराया. अल-सैयद को 50.74% (18,72,595) वोट मिले, जबकि रोजर्स 47.29% (17,45,183) वोटों पर सिमट गए. तीसरे स्थान पर रहे निर्दलीय उम्मीदवार क्रिस्टेंसन को महज 1.04% वोट मिले. उल्लेखनीय है कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान अल-सैयद को 'जिहादी' तक कह दिया था.

हार से नहीं मानी हिम्मत, स्वास्थ्य को बनाया मुख्य मुद्दा

यह अल-सैयद की पहली बड़ी चुनावी कोशिश नहीं थी. इससे पहले 2018 में उन्होंने गवर्नर पद की दावेदारी पेश की थी, पर डेमोक्रेटिक प्राइमरी में ग्रेचेन व्हिटमर से हार गए थे. इस बार पेशे से डॉक्टर अल-सैयद ने प्रगतिशील नीतियों, खासकर 'मेडिकेयर फॉर ऑल' (सबके लिए सरकारी फंड से मुफ्त स्वास्थ्य सेवा) को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया, जिसे जनता का भरपूर समर्थन मिला.

कर्नाटक से है गहरा नाता

इस ऐतिहासिक जीत की गूंज भारत में भी सुनाई दे रही है, क्योंकि अल-सैयद का भारत से बेहद करीबी रिश्ता है. उनकी पत्नी डॉ. सारा जुकाकू कर्नाटक के तटीय शहर भटकल के एक प्रतिष्ठित परिवार से हैं. सारा, मैसूर राज्य के पूर्व वित्त उपमंत्री जुकाकू शमशुद्दीन की पोती हैं. अल-सैयद अपनी इस भारतीय विरासत को गर्व से अपनाते हैं. उन्होंने एक इंटरव्यू में हल्के-फुल्के अंदाज में कहा था कि दक्षिण भारतीय परिवार में 20 साल शादी निभाने के बाद वह इसमें पूरी तरह रम चुके हैं और शायद अरब होने से ज्यादा भारतीय महसूस करते हैं.

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Ravindra Pratap Singh

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रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
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