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पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. लेकिन उससे पहले ही राज्य की राजनीति में नई सियासी टक्कर देखने को मिल रही है. दशकों तक पंजाब में राज करने वाली शिरोमणि अकाली दल को चुनौती मिल रही है अमृतपाल की अगुआई वाले संगठन वारिस पंजाब दे से. यह टक्कर खास तौर पर पंथिक राजनीति के दायरे में अहम है, जो पारंपरिक रूप से अकाली दल से जुड़ा रहा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में खडूर साहिब से अमृतपाल सिंह की जीत ने 'वारिस पंजाब दे' को एक बड़ी राजनीतिक पहचान दिलाई है. अब यह संगठन 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
SAD अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने राजनीतिक रैलियों में बार-बार अमृतपाल सिंह और 'वारिस पंजाब दे' पर निशाना साधा है और इस समूह को अपने प्रचार का मुख्य निशाना बनाया है. बादल ने 'वारिस पंजाब दे' को एक 'वायरस' बताया है और अमृतपाल की राजनीतिक साख पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने 2023 की अजनाला घटना और दुबई से लौटने के बाद अमृतपाल के राजनीतिक उभार को लेकर भी उनकी आलोचना की है.
सुखबीर बादल ने यह भी आरोप लगाया है कि आम आदमी पार्टी पंथिक वोटों को बांटने के लिए 'वारिस पंजाब दे' का इस्तेमाल कर रही है. उन्होंने दावा किया है कि AAP और इस संगठन के बीच कोई समझौता है. यह एक ऐसा आरोप है, जिस पर दोनों ही पार्टियों को जवाब देना होगा. बता दें कि शिरोमणि अकाली दल ने पंजाब में विभिन्न गठबंधनों और अकेले कुल 7 बार (1967, 1969, 1977, 1985, 1997, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों के बाद) सरकार बनाई है.
'वारिस पंजाब दे' के खेमे में डाखा के MLA मनप्रीत सिंह अयाली के शामिल होने से इस राजनीतिक मुकाबले में एक नया मोड़ आ गया है. अयाली के इस कदम से मालवा क्षेत्र में संगठन की पहचान बढ़ी है और मुकाबला अमृतपाल के खडूर साहिब वाले गढ़ से आगे निकल गया है. इसके बाद सुखबीर ने अमृतपाल और अयाली दोनों पर अपने हमले तेज कर दिए हैं, और खास तौर पर उनके राजनीतिक और धार्मिक रुख पर सवाल उठाए हैं.
यह टक्कर छप्पर मेले में भी दिखी, जहां SAD और 'वारिस पंजाब दे' प्रमुख प्रतिस्पर्धी राजनीतिक ताकतों के तौर पर उभरे, जिससे पंथिक वोटरों को लेकर बढ़ती होड़ साफ नजर आई. इसलिए, अकाली दल के लिए चुनौती सिर्फ AAP, कांग्रेस और BJP तक ही सीमित नहीं है. यह एक ऐसे नए संगठन के खिलाफ अपनी पारंपरिक राजनीतिक जगह बनाए रखने की भी लड़ाई है जो एक वैकल्पिक पंथिक पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है. 'वारिस पंजाब दे' के लिए 2027 का चुनाव पहली बड़ी परीक्षा होगी कि क्या अमृतपाल सिंह के चुनावी आकर्षण को एक बड़े राजनीतिक संगठन में बदला जा सकता है. इसलिए, SAD और 'वारिस पंजाब दे' के बीच की लड़ाई 2027 के चुनावों का एक अहम पहलू बन सकती है क्योंकि यह मुकाबला रैलियों और बयानों से आगे बढ़कर विधानसभा क्षेत्रों में जमीनी स्तर की लड़ाई में बदलता जा रहा है.
पंजाब की बात करें तो यहां भारत में सबसे ज्यादा 32 प्रतिशत दलित आबादी रहती है. वहीं जाट सिख समुदाय की हिस्सेदारी 20-22 फीसदी के आसपास है. जाट सिखों का दबदबा कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सियासत पर ज्यादा है. इसके अलावा 38-29 फीसदी हिस्सेदारी पंजाब की आबादी में हिंदुओं की है, जो ब्राह्मण, बनिया, खन्ना, खत्री और महाजन समुदाय से आते हैं.