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हिमाचल के सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या क्यों घट रही है? क्या विलय समाधान है?

हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों में घटते छात्र नामांकन और कम छात्र संख्या वाले स्कूलों के विलय की नीति पर नजर डालें. जानें, स्कूलों में बच्चे क्यों कम हो रहे हैं और क्या विलय शिक्षा व्यवस्था की सही दिशा है?

हिमाचल के सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या क्यों घट रही है? क्या विलय समाधान है?
Image Credit: बच्चे सरकारी स्कूलों से क्यों दूर हो रहे हैं?


हिमाचल प्रदेश में सरकारी स्कूलों के सामने घटते नामांकन की चुनौती लगातार चर्चा में है. शिक्षा मंत्रालय के यूडीआईएसई+ 2024-25 आंकड़ों के अनुसार राज्य में कुल 17,330 स्कूलों में करीब 14.25 लाख विद्यार्थी दर्ज हैं. वहीं राज्य में 2,964 एकल-शिक्षक स्कूल भी हैं. औसत नामांकन प्रति स्कूल करीब 82 विद्यार्थियों का है.

कम छात्र संख्या के पीछे कई कारण हो सकते हैं. पहाड़ी क्षेत्रों में आबादी का बिखराव, गांवों से शहरों की ओर पलायन, निजी स्कूलों की ओर बढ़ता रुझान और कुछ क्षेत्रों में कम होती बाल आबादी सरकारी स्कूलों के नामांकन को प्रभावित कर सकती है. इसलिए इसे केवल स्कूलों की गुणवत्ता से जोड़कर देखना सही नहीं होगा.

कितने स्कूलों में छात्र बहुत कम हैं?

2024-25 के यूडीआईएसई+ आंकड़ों के आधार पर हिमाचल प्रदेश में 1,818 ऐसे सरकारी स्कूल बताए गए हैं, जहां विद्यार्थियों की संख्या 10 से कम है या नामांकन बेहद कम है. ऐसे स्कूलों में संसाधनों और शिक्षकों की तैनाती को लेकर सरकार के सामने युक्तिकरण की चुनौती आती है.

कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का मतलब यह नहीं कि उनकी जरूरत खत्म हो गई है. खासकर पहाड़ी इलाकों में नजदीकी स्कूल बच्चों के लिए शिक्षा तक पहुंच का महत्वपूर्ण साधन हो सकता है.

क्या स्कूलों का विलय किया जा रहा है?

हिमाचल सरकार ने कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को आसपास के स्कूलों में मिलाने की प्रक्रिया पर काम किया है. जनवरी 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 10 से कम विद्यार्थियों वाले 316 माध्यमिक विद्यालयों के विलय का प्रस्ताव रखा गया था. इन स्कूलों में 2,116 विद्यार्थी और 813 शिक्षक बताए गए थे.

इस तरह के कदम को सरकार संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल और शिक्षकों की तैनाती को अधिक प्रभावी बनाने के नजरिए से देखती है.

विलय से शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी?

विलय का एक तर्क यह है कि बहुत कम विद्यार्थियों वाले अलग-अलग स्कूलों की जगह एक बड़े स्कूल में विद्यार्थियों और शिक्षकों को एक साथ लाने से बेहतर शैक्षणिक माहौल बनाया जा सकता है. इससे पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल सुविधाएं और दूसरे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल भी संभव हो सकता है.

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. यदि नए स्कूल तक पहुंचने के लिए बच्चों को ज्यादा दूरी तय करनी पड़े, तो खासकर छोटे बच्चों और दूरदराज के गांवों के विद्यार्थियों के लिए मुश्किल बढ़ सकती है.

क्या पहाड़ों में विलय आसान समाधान है?

हिमाचल की भौगोलिक स्थिति इसे दूसरे राज्यों से अलग बनाती है. मैदानी इलाकों में दो स्कूलों के बीच कुछ किलोमीटर की दूरी सामान्य हो सकती है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र में वही दूरी कठिन रास्ते, मौसम और परिवहन की वजह से बड़ी चुनौती बन सकती है.

इसलिए केवल विद्यार्थियों की संख्या के आधार पर स्कूल का भविष्य तय करने के बजाय दूरी, सड़क, सार्वजनिक परिवहन, मौसम और स्थानीय आबादी जैसे पहलुओं को भी देखना जरूरी होगा.

क्या सरकार को स्कूल बचाने और गुणवत्ता बढ़ाने दोनों पर ध्यान देना होगा?

सरकारी स्कूलों में घटता नामांकन केवल स्कूलों की संख्या घटाने से हल नहीं होगा. बेहतर शिक्षण, पर्याप्त शिक्षक, डिजिटल सुविधाएं, सुरक्षित भवन, खेल और कौशल आधारित शिक्षा जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है. शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि हिमाचल में विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात 14 है, लेकिन एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या 2,964 है.

यानी चुनौती केवल यह नहीं है कि स्कूल में कितने बच्चे हैं, बल्कि यह भी है कि अलग-अलग क्षेत्रों में शिक्षक और सुविधाएं कितनी संतुलित तरीके से उपलब्ध हैं.

तो क्या स्कूल विलय ही समाधान है?

स्कूल विलय कुछ कम-नामांकन वाले स्कूलों के लिए संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल का विकल्प हो सकता है, लेकिन इसे हर जगह एक जैसा समाधान नहीं माना जा सकता. हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में स्कूल की दूरी और बच्चों की शिक्षा तक पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी शिक्षक और सुविधाओं की उपलब्धता.

इसलिए बेहतर रास्ता यह हो सकता है कि सरकार प्रत्येक स्कूल का स्थानीय स्तर पर आकलन करे. जहां विलय से बच्चों की पहुंच प्रभावित नहीं होती, वहां इसे अपनाया जा सकता है; लेकिन दुर्गम क्षेत्रों में छोटे स्कूलों को मजबूत करना ज्यादा प्रभावी विकल्प हो सकता है.

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About the Author

Gaurav Pandey

Gaurav Pandey

Gaurav is a multimedia journalist writing across a wide range of subjects, including politics, sports, cinema, explainers, opinion and Delhi Haryana civic issues. With analysis, he regularly covers social issues and public policy through in-depth. With around nine years of experience, he has worked with India Today, Hindustan Times, and Network18, producing stories with a strong focus on facts and ground reality. He studied journalism at IIMC Delhi.
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