SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

हिमाचल के गांवों पर पलायन की मार! घर हैं, खेत हैं, लेकिन कम होते जा रहे हैं रहने वाले

हिमाचल के पहाड़ी गांवों में रोजगार और शिक्षा के लिए युवाओं का पलायन बढ़ रहा है. जानिए क्यों लोग गांव छोड़ रहे हैं और इसका खेती, परिवार और ग्रामीण जीवन पर क्या असर पड़ रहा है.

Written By Renu Akarniya
Published: Sep 06, 2026, 08:19 PM IST | Updated: Sep 06, 2026, 08:31 PM IST
Image Credit: क्या सच में खाली हो रहे हैं हिमाचल के गांव?
Join

हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में गांवों की तस्वीर तेजी से बदल रही है. कभी बच्चों की आवाज, खेती-किसानी और सामुदायिक जीवन से गुलजार रहने वाले कई गांवों से युवा पढ़ाई और रोजगार के लिए बाहर जा रहे हैं. हालांकि, इसे सीधे “गांव खाली हो रहे हैं” कहना पूरी तरह सही नहीं होगा. 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन ने हिमाचल के नौ गांवों में 486 परिवारों और 1,894 लोगों का सर्वे किया. इसमें 440 लोग प्रवासी पाए गए, लेकिन अध्ययन किए गए गांवों में स्थायी पलायन या पूरी तरह छोड़े गए घर नहीं मिले.

टीओआई के रिपोर्ट के मुताबिक, हिमाचल में पलायन का सबसे बड़ा संबंध रोजगार और शिक्षा से है. स्थानीय रोजगार के सीमित अवसर युवाओं को दूसरे शहरों की ओर जाने के लिए प्रेरित करते हैं. वहीं, उच्च शिक्षा के लिए भी छात्रों को अपने गांव से बाहर जाना पड़ता है. यानी पहाड़ से होने वाला पलायन केवल मजबूरी की कहानी नहीं है, बल्कि बेहतर अवसरों की तलाश भी इसका बड़ा कारण है.

किन इलाकों में पलायन ज्यादा दिखा?

अध्ययन में मंडी, चंबा, सिरमौर, सोलन, कांगड़ा, कुल्लू, शिमला, किन्नौर और लाहौल-स्पीति के गांव शामिल किए गए. इन गांवों में पलायन की दर अलग-अलग रही. लाहौल-स्पीति के कारदंग में यह दर 41.87 प्रतिशत रही, जबकि सिरमौर के बाटोल में 8.44 प्रतिशत थी. इससे साफ है कि हिमाचल के सभी गांवों में पलायन की स्थिति एक जैसी नहीं है.

क्या बाहर जाने वाले लोग वापस लौटते हैं?

हिमाचल की कहानी का अहम पहलू यह है कि यहां प्रवासन मुख्य रूप से अस्थायी और चक्रीय पाया गया. लोग रोजगार या पढ़ाई के लिए बाहर जाते हैं, लेकिन गांव से उनका रिश्ता पूरी तरह खत्म नहीं होता. इसका मतलब है कि बंद दरवाजे वाला हर घर स्थायी पलायन का संकेत नहीं है. कई परिवारों का आर्थिक और सामाजिक जुड़ाव अब भी अपने गांव से बना हुआ है.

गांव में पीछे कौन रह जाता है?

जब युवा बाहर जाते हैं तो गांव में बुजुर्गों और महिलाओं की भूमिका बढ़ जाती है. खेती, पशुपालन, घर की देखभाल और स्थानीय सामाजिक जिम्मेदारियां अक्सर पीछे रह गए परिवार के सदस्यों के हिस्से आती हैं. दूसरी तरफ, बाहर काम करने वाले लोगों की कमाई गांव में परिवार के खर्च और दूसरी जरूरतों को पूरा करने में मदद करती है. अध्ययन में प्रवासी परिवारों से मिलने वाली रेमिटेंस भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा सामने आई.

क्या यह पलायन पहाड़ की खेती बदल रहा है?

युवाओं के बाहर जाने से खेती और ग्रामीण श्रम व्यवस्था पर असर पड़ना इस कहानी का अहम ग्राउंड एंगल है. Census of India के आधिकारिक आंकड़ों में हिमाचल के प्रवासियों को रोजगार, शिक्षा, विवाह, परिवार के साथ स्थानांतरण और अन्य कारणों के आधार पर दर्ज किया गया है. इससे पता चलता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन एक बहुआयामी प्रक्रिया है, जिसे केवल खेती की समस्या से जोड़कर नहीं देखा जा सकता.

क्या गांव पूरी तरह खत्म हो जाएंगे?

हिमाचल के मामले में फिलहाल उपलब्ध शोध ऐसी सीधी तस्वीर पेश नहीं करता. बल्कि यह बताता है कि गांवों का चरित्र बदल रहा है. युवा बेहतर शिक्षा और नौकरी के लिए बाहर जा रहे हैं, जबकि परिवार और जमीन से उनका रिश्ता बना रह सकता है. इसलिए असली सवाल यह है कि आने वाले वर्षों में ये गांव केवल रहने की जगह रहेंगे या रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं के जरिए युवाओं को वापस आकर्षित भी कर पाएंगे?

Add Zee News as a Preferred Source

About the Author

रेनू अकर्णिया, वर्तमान में Zee News में सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं और दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा की लेटेस्ट, ट्रेंडिंग कंटेंट, यूटिलिटी जुड़ी खबरों पर काम कर रहे हैं. रेनू पिछले 3 सालों से डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं. पत्रकारिता में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने 2022 में Zee News से करियर की शुरुआत की.  लोकल चैनल समाचार प्लस में इंटर्न से शुरुआत की और कारवां बढ़ता हुआ जी न्यूज पहुंचा.
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES