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दुनिया के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित फिल्म अवॉर्ड यानी अकैडमी अवॉर्ड्स (OSCARS) को लेकर हमारे देश में गजब का क्रेज देखने को मिलता है. जैसे ही टीवी चैनलों या सोशल मीडिया पर खबर फ्लैश होती है कि फलां भारतीय फिल्म को ‘ऑस्कर’ के लिए भेजा गया है, ज्यादातर लोग मान बैठते हैं कि फिल्म को ऑस्कर नॉमिनेशन मिल गया, लेकिन असल में हकीकत कुछ और होती है. किसी फिल्म का देश की तरफ से चुना जाना, फिर अकैडमी तक पहुंचना, वहां शॉर्टलिस्ट होना, फिर टॉप पांच में नॉमिनेशन पाना और आखिर में सुनहरी ट्रॉफी अपने नाम करना, ये सब बेहद मुश्किल पड़ाव हैं.
सबसे पहले तो आप ये समझिए कि हर ऑस्कर कैटिगरी में फिल्म भेजने का प्रोसेस अलग होता है. अकैडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज अपने नियमों को समय-समय पर बदलती और सख्त भी करती रहती है, जिसको पार करना हर किसी के बर की बात नहीं होती. इसलिए ही ‘ऑस्कर’ को दुनिया के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित फिल्म अवॉर्ड में गिना जाता है और इसको हासिल करना बॉलीवुड से लेकर साउथ और हॉलीवुड के तमाम फिल्मेमकर्स और स्टार्स का सपना होता है, लेकिन इस सपने को पूरा करना के लिए उनको उस लेवल की कड़ी मेहनत भी करनी पड़ती है.

पहले अकैडमी अवॉर्ड्स का आयोजन 16 मई, 1929 को हॉलीवुड रूजवेल्ट होटल के ब्लॉसम रूम में हुआ था. उस पहले समारोह में सिर्फ करीब 270 मेहमान पहुंचे थे. तब एंट्री टिकट की कीमत महज 5 डॉलर (उस दौर के हिसाब से 14 रुपये) रखी गई थी. उस दौर में 1 अगस्त, 1927 से लेकर 1 अगस्त, 1928 के बीच रिलीज हुई फिल्मों को आंका गया था.
साइलेंट फिल्म ‘विंग्स’ ने उस साल आउटस्टैंडिंग पिक्चर का पहला बड़ा खिताब अपने नाम किया था. शुरुआती दौर में ये आज की तरह चकाचौंध से भरा तड़क-भड़क वाला शो नहीं हुआ करता था. पहले साल तो विजेताओं के नाम कार्यक्रम शुरू होने से तीन महीने पहले ही अखबारों और जनता के सामने आ चुके थे.
साल 2026 तक इस ऐतिहासिक अवॉर्ड शो के शुरू हुए करीब 97 साल पूरे हो चुके हैं. इस सफर में शो ने कई बड़े मोड़ देखे हैं. 1953 में पहली बार इसका लाइव टीवी टेलीकास्ट हुआ, जबकि 1966 में दुनिया ने पहली बार इसे कलर टीवी पर देखा.
साल 1940 के ऑस्कर अवॉर्ड्स में एक भारी गड़बड़ी हो गई थी. दरअसल, ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ अखबार ने तय वक्त से पहले ही विनर्स के नाम की लिस्ट छाप दी थी. नतीजा ये हुआ कि अवॉर्ड नाइट का सारा रोमांच और सस्पेंस एक झटके में खत्म हो गया, जिससे अकैडमी की जमकर फजीहत हुई. इस किरकिरी से सबक लेते हुए आयोजकों ने अगले साल, यानी 1941 में नियमों को पूरी तरह बदल डाला.
नतीजों को सीक्रेट रखने के लिए उन्होंने पहली बार सीलबंद लिफाफे का तरीका आजमाया. बस तभी से शुरू हुआ ये फॉर्मूला आज भी कायम है और स्टेज पर खुलने वाला वही लिफाफा ऑस्कर की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है.
अब ये समझते हैं कि ऑस्कर के लिए फिल्में कैसे चुनी जाती हैं? बहुत से लोग मानते हैं कि देश की तरफ से फिल्म भेजी गई तो वो सीधे ‘नॉमिनेट’ हो गई, पर ऐसा कतई नहीं है. हर कैटेगरीज के नियम अलग होते हैं. जनरल कैटेगरीज के लिए फिल्म के प्रोड्यूसर या डिस्ट्रीब्यूटर अकैडमी के पोर्टल पर जाकर ऑस्कर सबमिशन फॉर्म भरते हैं.
इसमें फिल्म के पूरे क्रेडिट्स, थिएट्रिकल रिलीज, कलाकारों के नाम और तकनीकी काम का पूरा ब्योरा देना पड़ता है. इसके बाद बेस्ट पिक्चर, डॉक्युमेंट्री, एनिमेशन और इंटरनेशनल फीचर जैसी अलग-अलग कैटेगरीज के अपने खास नियमों के हिसाब से फिल्मों की छंटनी होती है. तब जाकर कहीं आखिरी दावेदारों की लिस्ट तैयार की जाती है. वहीं, 99वें ‘ऑस्कर्स’ की इंटरनेशनल फीचर कैटेगरी में शामिल होने के लिए फिल्मों को कुछ खास नियम पूरे करने होते हैं.
सबसे पहली बात तो ये है कि फिल्म की लंबाई कम से कम 40 मिनट से ज्यादा होनी चाहिए. इसके साथ ही फिल्म अमेरिका या उसके एरिया से बाहर बनी होनी चाहिए. भाषा से जुड़ा सबसे अहम नियम ये कहता है कि फिल्म के डायलॉग्स का 50% से ज्यादा पार्ट इंग्लिश के अलावा किसी दूसरी भाषा में होना चाहिए. आखिर में, फिल्म को तय समय सीमा के अंदर सिनेमाघरों में रिलीज होना चाहिए और अंग्रेजी सबटाइटल होने चाहिए.

अगर हम बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटिगरी की बात करें, तो कोई भी डायरेक्टर अपनी मर्जी से सीधे फिल्म अकैडमी को नहीं भेज सकता. इसके लिए देश की ऑफिशियल सिस्टम से गुजरना पड़ता है. भारत में फिल्म प्रोड्यूसर अपनी फिल्मों को फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) के पास भेजते हैं. इसके बाद एफएफआई एक खास जूरी बनाती है, जो सभी फिल्मों को देखती है और वोटिंग के जरिए एक फिल्म चुनती है.
हालांकि, 99वें ऑस्कर्स से नियमों में एक बड़ा बदलाव किया गया है. अब किसी देश की ऑफिशियल कमिटी के अलावा चुनिंदा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स से भी रास्ता खुल गया है. अगर किसी गैर-अंग्रेजी फिल्म ने बर्लिन, कान्स, वेनिस, सनडांस, टोरंटो या बुसान फिल्म फेस्टिवल में अकैडमी का तय क्वालिफाइंग अवॉर्ड जीता है, तो वो भी इंटरनेशनल फीचर की दौड़ में शामिल होने की एलिजिबिलिटी पा सकती है.
बहुत से लोगों को लगता है कि ऑस्कर के लिए भारत की सिलेक्शन जूरी में 12, 13 या 15 मेंबर्स ही होते हैं. पर सच ये है कि अकैडमी ने सदस्यों की कोई गिनती तय नहीं की है. नियमों के मुताबिक, किसी भी देश की कमिटी में चेयरमैन को मिलाकर कम से कम पांच मेबर्स होने चाहिए. पैनल में ज्यादातर लोग फिल्ममेकर होने जरूरी हैं. इसके साथ ही आधी कमिटी में सिनेमा से जुड़े कलाकार या अलग-अलग डिपार्टमेंट्स के तकनीशियन शामिल होने चाहिए.
आसान शब्दों में कहें तो गिनती से ज्यादा तवज्जो इस बात को दी जाती है कि पैनल में सिनेमा को बारीकी से समझने वाले असली स्किल्ड लौग मौजूद हों. साथ ही चयन समिति यानी जूरी के किसी भी मेंबर का उस साल भेजी जाने वाली फिल्मों से कोई पर्सनल जुड़ाव या पर्सनल फायदा बिल्कुल नहीं होना चाहिए. ये फैसला पूरी तरह निष्पक्ष होना जरूरी है, ताकि सही फिल्म आगे बढ़ सके.
इसके साथ ही ये समझना भी बेहद जरूरी है कि हमारे देश की जूरी का काम सिर्फ भारत की तरफ से एक फिल्म को ऑस्कर की रेस में भेजना होता है. वे फिल्म को ऑस्कर अवॉर्ड नहीं दिलाती और न ही विनर तय करती है. असली मुकाबला तो अमेरिका में ‘अकादमी अवॉर्ड्स’ के मंच पर शुरू होता है, जहां दुनियाभर की फिल्मों को परखा जाता है और फिर चुना जाता है.
ऑस्कर की तैयारी किसी एक दिन या हफ्ते का खेल नहीं है. इसके लिए मेकर्स को महीनों पहले से पसीना बहाना पड़ता है. 99वें ऑस्कर्स के लिए भारत में आवेदन 4 अगस्त 2026 से मंगाए गए थे और FFI ने 7 सितंबर 2026 तक की डेडलाइन तय की थी. इसके बाद देश की चुनी हुई ऑफिशियल फिल्म का ऐलान 19 सितंबर के आसपास तय किया गया.
अकैडमी के पास सभी जरूरी दस्तावेज और प्रिंट भेजने की आखिरी तारीख 30 सितंबर 2026 शाम तक रखी गई थी. इस सीजन के लिए फिल्मों की थिएट्रिकल रिलीज की तारीख 1 अक्टूबर 2025 से लेकर 30 सितंबर 2026 के बीच होनी जरूरी थी. यही वजह है कि मेकर्स महीनों पहले से अपनी फिल्म की स्क्रीनिंग और कैंपेन की प्लानिंग बनाने लगते हैं.
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अकैडमी का बुनियादी ढांचा हर जगह एक जैसा ही रहता है, पर ये जरूरी नहीं कि हर देश में FFI जैसी संस्था ही काम करे. अकैडमी के नियमों के तहत ऑफिशियल सिलेक्शन किसी रिकोर्गेनाइस्ड ऑर्गेनाइजेशन, जूरी या कमेटी के जरिए ही हो सकता है. इस कमेटी में कम से कम पांच मेंबर्स का होना जरूरी है और चुनाव के पूरे प्रोसेस को सबके सामने साफ-साफ पब्लिक करना भी जरूरी माना गया है.
इसका मतलब ये है कि अलग-अलग देशों में वहां की लोकल फिल्म अकैडमी, इंडस्ट्री से जुड़ी ऑर्गेनाइजेशन या अकैडमी से मंजूरी पाई कोई भी कमेटी ये जिम्मेदारी आराम से निभा सकती है. इसलिए ‘हर देश में एफएफआई होती है’ कहना बिल्कुल गलत होगा. नियम भले ही अकादमी तय करती है, लेकिन चुनाव करने वाली लोकल इंस्टीट्यूट्स हर जगह अलग हो सकते हैं.
ऑस्कर से जुड़ी खबरों में अक्सर लोग एक बड़ी गलती कर बैठते हैं. किसी देश की तरफ से फिल्म को ‘ऑफिशियल एंट्री’ के तौर पर भेजे जाने का मतलब ये बिल्कुल नहीं होता कि फिल्म नॉमिनेट हो गई है इसका सीधा सा मतलब है कि उस देश ने अपनी फिल्म को मुकाबले के शुरुआती दौर के लिए चुना है. इसके बाद अकैडमी सभी चुनी गई फिल्मों की जांच करती है. फिर शॉर्टलिस्ट तैयार होती है और उसके बाद वोटिंग के जरिए सिर्फ 5 फिल्में फाइनल नॉमिनेशन तक पहुंच पाती हैं. आखिर में इन्हीं पांच में से किसी एक को अवॉर्ड मिलता है.
- ऑफिशियल एंट्री: इसका मतलब सिर्फ इतना है कि किसी देश की जूरी ने उस फिल्म को अपने देश की तरफ से रेस में दौड़ने के लिए आगे भेजा है. ये कोई अवॉर्ड या नॉमिनेशन नहीं है.
- शॉर्टलिस्ट: अकैडमी के मेंबर दुनिया भर से आई दर्जनों फिल्मों को देखकर लगभग 15 बेहतरीन फिल्मों की एक लेयऑफ लिस्ट बनाते हैं.
- नॉमिनेशन: उस शॉर्टलिस्ट में से दोबारा वोटिंग होती है और सिर्फ 5 फाइनल फिल्मों को असली ऑस्कर नॉमिनेशन का तमगा मिलता है.
- विनर: फिर पूरी अकैडमी वोट करती है और उन 5 में से किसी एक को वो गोल्डन ऑस्कर ट्रॉफी हाथ लगती है.
इसका जवाब है हां, भारत से ऑस्कर की रेस में शामिल होने के लिए फिल्ममेकर्स को शुरुआत में कुछ पैसे जरूर चुकाने पड़ते हैं, लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं कि पैसे देकर अवॉर्ड खरीदा जा सकता है. 99वें अकैडमी अवॉर्ड्स के दौरान ‘फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया’ यानी FFI ने अप्लाई करने के लिए 1.25 लाख रुपये और उस पर जीएसटी तय किया था.
इसके साथ ही फिल्म रिलीज का सबूत, उसकी छोटी कहानी और सबटाइटल भी जमा करने होते हैं. ये रकम सिर्फ देश के भीतर जूरी स्क्रीनिंग और कागजी कार्रवाई संभालने के लिए ली जाती है. कोई भी पैसा देकर ऑस्कर नहीं जीत सकता, क्योंकि आगे का रास्ता पूरी तरह फिल्म के दम और अकैडमी मेंबर्स की वोटिंग पर ही निर्भर करता है.
ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारे सामने डायरेक्टर एस.एस. राजामौली की फिल्म ‘RRR’ है. अगर किसी फिल्म को देश की तरफ से इंटरनेशनल फीचर फिल्म के लिए नहीं भी चुना जाता, तो इसका ये मतलब नहीं कि ऑस्कर की दौड़ वहीं खत्म हो गई. अकैडमी के नियम बड़े साफ हैं.
बेस्ट फिल्म, डायरेक्टर, म्यूजिक या बेस्ट ओरिजिनल सॉन्ग जैसी कैटेगरी में कोई भी फिल्म अपने बलबूते पर सीधे उतर सकती है, बस वो जरूरी शर्तें पूरी करती हो.
‘आरआरआर’ के जबरदस्त गाने ‘नाटू नाटू’ ने 95वें अकैडमी अवॉर्ड्स में बेस्ट ओरिजिनल सॉन्ग जीतकर पूरी दुनिया में डंका बजाया था. ये फिल्म भारत की ऑफिशियल एंट्री नहीं थी, फिर भी इसने अपने दम पर ये ऐतिहासिक जीत हासिल कर एक नया इतिहार रचा था.

सबसे पहले यहां ‘भारत’, ‘भारतीय फिल्म’ और ‘भारतीय कलाकार’ के बीच का फर्क समझना बहुत जरूरी है. बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी में भारत की झोली अब तक खाली है. 1957 में महबूब खान की ‘मदर इंडिया’, 1988 में मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे!’ और 2001 में आशुतोष गोवारिकर ‘लगान’ जैसी फिल्में आखिरी दौर के नॉमिनेशन तक तो पहुंचीं, पर ट्रॉफी अपने नाम नहीं कर पाईं.
हालांकि, दूसरी कैटेगरीज में हमारे कलाकारों ने कमाल कर दिखाया है.भानु अथैया ने ‘गांधी’ के लिए कॉस्ट्यूम डिजाइन का ऑस्कर जीता था, तो सत्यजीत रे को सिनेमा में उनके योगदान के लिए मानद ऑस्कर मिला था. आगे चलकर ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ के जरिए ए.आर. रहमान, गुलजार और रसूल पोकुट्टी ने अवॉर्ड्स जीतकर डंका बजाया.
इसके अलावा साल 2023 में राजामौली की फिल्म ‘RRR’ के गाने ‘नाटु नाटु’ और शॉर्ट डॉक्युमेंट्री ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ ने ऑस्कर जीतकर एक नया इतिहास रच दिया.
ये सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि अवॉर्ड किस कैटेगरी के लिए दिया जा रहा है. हर ऑस्कर अवॉर्ड अपने-आप फिल्म के डायरेक्टर के खाते में नहीं जाता. उदाहरण के तौर पर, ‘नाटू नाटू’ गाने को मिला ‘बेस्ट ओरिजिनल सॉन्ग’ का ऑस्कर एम. एम. कीरवानी और चंद्रबोस को मिला था, न कि एस. एस. राजामौली को ‘बेस्ट डायरेक्टर’ का अवॉर्ड मिला था.
दूसरी तरफ, ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ को जब ‘डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट फिल्म’ का ऑस्कर मिला, तो इसकी विनर कार्तिकी गोंसाल्विस और गुनीत मोंगा बनीं. ये समझना इसलिए जरूरी है, क्योंकि आम बातचीत में हम भले ही कह देते हैं कि ‘फिल्म ने पांच ऑस्कर जीते’, पर असल में अलग-अलग कैटेगरीज की ट्रॉफियां उससे जुड़े हकदार लोगों या उनकी खास टीमों को ही दी जाती हैं.
लगभग 100 साल के इतिहास में ऑस्कर का मंच कई बार भारी विवादों का गवाह बना है, जिन्होंने ऑस्कर के इतिहास को दागदार किया.
ऑस्कर्स सो व्हाइट का विवाद: साल 2015 में जब सभी 20 एक्टिंग नॉमिनेशन्स गोरे कलाकारों को मिले, तो तो सोशल मीडिया पर 'ऑस्कर्स सो व्हाइट' आंदोलन छिड़ गया. लगातार 2 साल ऐसा होने पर अकैडमी के रवैये पर भारी सवाल उठे. इसके बाद अकैडमी को अपनी मेंबरशिप में भारी बदलाव करने पड़े.
मार्लन ब्रैंडो का ट्रॉफी ठुकराना: साल 1973 में मार्लन ब्रैंडो ने ‘द गॉडफादर’ के लिए मिला बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड लेने से साफ मना कर दिया. हॉलीवुड में मूल अमेरिकी आदिवासियों के साथ हो रहे गलत बर्ताव के विरोध में उन्होंने अपनी जगह सचीन लिटिलफैदर को मंच पर भेजा था.
गलत लिफाफे की भारी चूक: साल 2017 में लाइव शो के दौरान बड़ी गड़बड़ी सामने आई. गलत लिफाफा खुलने की वजह से बेस्ट पिक्चर के तौर पर ‘ला ला लैंड’ का नाम बोल दिया गया, जबकि असली विजेता ‘मूनलाइट’ फिल्म थी.
विल स्मिथ का जोरदार थप्पड़: साल 2022 में विल स्मिथ ने मंच पर खड़े क्रिस रॉक को थप्पड़ जड़ दिया. उसी शाम स्मिथ को ‘किंग रिचर्ड’ के लिए बेस्ट एक्टर चुना गया, मगर इस हरकत के चलते उन पर दस साल का बैन लगा दिया गया.

इसका कोई एक सीधा जवाब नहीं हो सकता. भारत हर साल अलग-अलग भाषाओं की बेहतरीन फिल्में भेजता है, लेकिन ग्लोबल लेवल पर मुकाबला बहुत कड़ा होता है. वहां दुनिया भर के दिग्गज निर्देशकों की ऐसी-ऐसी फिल्में सामने होती हैं, जो किसी की भी मिनटों में धज्जियां उड़ा दें. कई बार हमारे यहां फिल्मों के गलत चयन पर बहस होती है, तो कई बार इंटरनेशनल लेवल पर सही तरह से फिल्म को प्रमोट न कर पाना भी एक बड़ी वजह बन जाता है.
अब लोगों को ‘ऑस्कर 2027’ यानी 99वां ‘अकादमी अवॉर्ड्स’ का इंतजार है, जो 14 मार्च 2027 रविवार को आयोजित होगा, जो अमेरिका के लॉस एंजिल्स में ओवेशन हॉलीवुड के ‘डॉल्बी थिएटर’ में होगा. अमेरिकी समय के हिसाब से ये शाम को लाइव शुरू होगा, लेकिन समय के फर्क की वजह से भारत में लोग इसे 15 मार्च 2027 की सुबह करीब 4:30 बजे से लाइव देख पाएंगे. अमेरिका में इसका सीधा टेलीकास्ट ‘एबीसी’ चैनल और ‘हुलू’ पर होगा, जबकि दुनिया भर के 200 से ज्यादा देशों में ये दिखाया जाएगा. भारत में इसे ‘स्टार मूवीज’, ‘स्टार मूवीज सेलेक्ट’, ‘कलर्स इन्फिनिटी’ और ‘जियो हॉटस्टार’ पर देखा जा सकेगा.