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कई बार नॉन-एथलीट सेलिब्रिटी को स्पोर्ट्स ब्रांड के एड्स में ग्लैमरस अंदाज में पेश किया जाता है, तो क्या ब्रांड सिर्फ कपड़े या जूते बेच रहा होता है, या वो खेल की रिलायबिलिटी को सेलिब्रिटी की पॉपुलैरिटी से जोड़कर एक नया कमर्शियल फॉर्मूला तैयार कर रहा होता है? सवाल ये भी है कि जिस एथलीट ने सालों ट्रेनिंग, चोट, हार और जीत के बाद अपनी पहचान बनाई, क्या उसकी जगह एक पॉपुलर सेलिब्रिटी ज्यादा आसानी से ले सकती है या सिर्फ इसलिए क्योंकि कैमरा उसे ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकता है?
स्पोर्ट्स ब्रांड्स के लिए सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट कोई नया एक्सपेरिमेंट नहीं है. फर्क सिर्फ इतना है कि सोशल मीडिया के दौर में सेलिब्रिटी की कीमत अब केवल उसकी पॉपुलैरिटी से नहीं, बल्कि उसकी अटेंशन वैल्यू से तय होने लगी है. एक स्टार का फोटो, वीडियो या कॉन्ट्रोवर्शियल एड कुछ घंटों में लाखों स्क्रीन तक पहुंच सकता है. वहीं एक बेहतरीन एथलीट का पर्फोमेंस जरूरी नहीं कि उतनी ही डिजिटल क्यूरोसिटी पैदा करे. मार्केटिंग की लैग्वेंज में यही वो जगह है, जहां एल्गोरिदम गेज एंटर करता है.
एक्ट्रेस सिडनी स्वेनी को एक स्पोर्ट्स प्रेडिक्शन कंपनी के एक नए एड को लेकर ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है. एड में स्वेनी बेहद कम कपड़ों में अलग-अलग खेलों को करते हुए नजर आती हैं. कैंपेन के वायरल होते ही कई महिला एथलीटों ने सवाल उठाया कि खेल को बेचने के लिए अब भी महिला शरीर को अट्रैक्शन का जरिया क्यों बनाया जा रहा है? चार बार की ओलंपिक गोल्ड मेडल विनर एरियार्ने टिटमस ने भी कैंपेन पर तीखा रिएक्शन देते हुए कहा कि वो इससे बेहद नाराज हैं. विवाद सिर्फ एक एड तक सीमित नहीं है.
इसको लेकर एक बड़ा सवाल उठता है कि जब खेल मेहनत, डिसिप्लिन और परर्फोमेंस का नाम है, तो उसकी मार्केटिंग में ग्लैमर और सेक्सुअलाइजेशन को इतनी जगह क्यों मिल रही है? क्या ब्रांड्स अब स्पोर्ट्स से ज्यादा सोशल मीडिया की वायरलिटी और एल्गोरिद्म की नजर को प्रायोरिटी दे रहे हैं?

कंपनियां पहले ये सोचकर एड बनाती थीं कि मेल ऑडियंस क्या देखना चाहता है, इसे मेल गेज के रूप से समझा गया. अब ब्रांड के सामने एक और ऑडियंस है, सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म. ऐसी तस्वीर, पोज, कॉन्सेप्ट या कैंपेन, जिस पर लोग रुकें, कमेंट करें, बहस करें, शेयर करें और दोबारा पोस्ट करें, उसकी पहुंच तेजी से बढ़ सकती है. यानी कैमरे के सामने सिर्फ इंसान नहीं, पीछे एक बिना दिखाई देने वाला एल्गोरिद्म भी मौजूद है, जो तय करता है कि किस तस्वीर को कितनी आंखें यानी व्यूज मिलेंगे.
मेल गेज की बहस में सवाल था कि महिलाओं को एड और पॉपुलर ट्रैडिशनल में किस तरह पुरुषों की आंखों के मुताबिक प्रजेंट किया जाता है. लेकिन डिजिटल एरा ने इसमें बदलाव लाया और खेल में एक नया खिलाड़ी एड दिया है. अब सवाल ये भी है कि क्या महिलाएं और सेलिब्रिटीज ऐसी इमेज में प्रजेंट की जा रही हैं, जिन्हें इंसान से ज्यादा एल्गोरिद्म पसंद करता है? ग्लैमर, बॉडी, उकसाने वाले विजुअल और कॉन्ट्रोवर्सी. ये सभी सोशल मीडिया पर बातचीत पैदा करने वाली चीजें बन सकती हैं. यही कारण है कि स्पोर्ट्स की ब्रांडिंग अब केवल परर्फोमेंस की कहानी नहीं रह गई है.

वो अब लाइफस्टाइल, फैशन, सेक्स अपील और वायरैलिटी के बीच घूम रही है. सिडनी स्वीनी से जुड़ा विवाद इसी बदलाव को समझने का एक केस स्टडी बन सकता है. अगर एक एड पर लोग खेल से ज्यादा उसके विजुअल, सेलिब्रिटी की इमेज या उसकी कथित सैक्सुअलाइजेशन पर बात कर रहे हैं, तो ब्रांड को फिर भी वही मिल रहा है जिसकी उसे जरूरत थी और वो अटेंशन हैं. यहां एड की सफलता इस बात से नहीं तय की जाती कि लोगों ने मैन्यूफैक्चर के फीचर याद रखे या नहीं, बल्कि इस बात से भी कि कितने लोगों ने उसके बारे में बात की और इसे री-शेयर किया.
इंडिया में भी स्पोर्ट्स, फैशन और सेलिब्रिटी ट्रैडिशन के बीच की बाउंड्री लगातार धुंधली हुई हैं. कैटरीना कैफ, कंगना रनौत, जान्हवी कपूर, करीना कपूर खान और अनुष्का शर्मा जैसी एक्ट्रेसेस अलग-अलग मौकों पर ऐसे ब्रांड कैंपेन का हिस्सा रही हैं, जिनमें फिटनेस, स्पोर्ट्सवियर, एथलीजर और बॉडी-फोकस्ड विजुअल्स को ग्लैमर के साथ जोड़ा गया है. लेकिन यहां एक बड़ा अंतर समझना जरूरी है कि सेलिब्रिटी का स्पोर्ट्स ब्रांड का चेहरा बनना अपने आप में गलत नहीं है. आखिर स्पोर्ट्स अब सिर्फ स्टेडियम तक ही सीमित नहीं है. ये फैशन, फिटनेस और पॉप कल्चर का भी हिस्सा बन चुका है.

लेकिन असली समस्या तब शुरू होती है, जब खेल का असली योगदान पीछे चला जाता है और खिलाड़ी की जगह सिर्फ उसका ग्लैमरस ब्रांड एंबेसडर दिखाई देता है. अगर एक एथलीट की सफलता ब्रांड की कहानी में सिर्फ बैकग्राउंड बन जाए और सेलिब्रिटी का चेहरा पूरी कहानी पर हावी हो जाए, तो सवाल उठना तो तय है कि आखिर ब्रांड किस चीज को बेच रहा है, स्पोर्ट्स या स्पोर्ट्स के एस्थेटिक्स दिखाने की कोशिश?
सोशल मीडिया ने एड की पुरानी स्ट्रेटजी बदल दी है. पहले ब्रांड कैंपेन लॉन्च करता था, एड मीडिया में चलता था और लोग उसे देखते थे. अब कई कैंपेन ऐसे बनाए जाते हैं जिन्हें देखकर लोग खुद रिएक्शन दें. कोई कहे, 'ये बहुत बेल्ड है', कोई लिखे, 'इसमें एथलीट क्यों नहीं?', कोई कैंपेन की तारीफ करे और कोई उसकी ट्रोलिंग हर रिएक्शन डिजिटल ट्रैफिक बनाती है. विवाद का मतलब हमेशा ब्रांड के लिए नुकसान नहीं होता. कई बार विवाद उसे वो फ्री मीडिया कवरेज दे देता है, जिसके लिए नॉर्मली करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं. इसलिए आज का उकसाने वाले कैंपेन कभी-कभी सिर्फ एड नहीं, बल्कि सोशल मीडिया बातचीत का नया तरीका होता है. ब्रांड का सीधा गोल होता है कि लोग एड को पसंद करें या नापसंद, लेकिन उसे नजरअंदाज न करें.

आज के डिजिटल एड्स में एक कैंपेन बनाने से पहले कई सवाल पूछे जाते हैं, क्या लोग इसे रोककर देखेंगे? क्या ये रील्स में काम करेगा? क्या इसका थमनेल अंटेशन खींचेगा? क्या लोग इस पर बहस करेंगे? क्या इंफ्लुएंसर इसे री-पोस्ट करेंगे? इन सवालों ने एडवरटाइजिंग क्रिएटिविटी की दिशा बदल दी है. अब क्रिएटिव टीम के साथ एल्गोरिद्म परर्फोमेंस भी कहानी लिखने लगा है. यही एल्गोरिद्म गेज की असली ताकत है. मेल गेज में सीन इस तरह बनाया जाता था कि वो एक खास नजर को खुश करे, एल्गोरिद्म गेज में सीन इस तरह डिजाइन हो सकता है कि वो ज्यादा एंगेजमेंट हासिल करे. लेकिन दोनों का रिजल्ट कभी-कभी समान हो सकता है, वूमन बॉडी को उसके पर्फोमेंस, कड़ी मेहनत या एजेंसी से अलग करके एक विजुअल कॉमोडिटी में बदल देना.

आखिर में ये बहस सेलिब्रिटी वर्सेस एथलीट की नहीं है. एक सेलिब्रिटी स्पोर्ट्स ब्रांड के लिए शानदार एंबेसडर हो सकती है और एक एथलीट भी शानदार फैशन आइकॉन बन सकती है. समस्या तब पैदा होती है, जब कमर्शियल विजिबिलिटी का स्कैल स्पोर्टिंग अचीवमेंट से इतना दूर चला जाए कि असली प्लेयर सिर्फ प्रोडक्ट की क्रेडिबिलिटी का साइन बनकर रह जाए. स्पोर्ट्स ब्रांड अगर खेल की एनर्जी बेचते हैं, तो उन खिलाड़ियों को भी कहानी का हिस्सा बनाना चाहिए, जिन्होंने उस एनर्जी को मैदान पर जिया है. और अगर किसी कैंपेन का गोल कॉन्ट्रोवर्सी पैदा करना है, तो ब्रांड्स को ये समझना होगा कि वायरल होना और सही तरीके से वायरल होना एक ही बात नहीं है.