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रजाई बिना रतिया... कैरेबियन से भोजपुरी इंडस्ट्री तक कैसे पहुंचा ये गाना? गिरमिटिया मजदूरों से है गहरा कनेक्शन

Bhojpuri Song Connection With Caribbean: 'रजाई बिना रतिया...' गाने के बोल सुनते ही लगता है कि ये कोई पुराना देसी गीत होगा, जिसमें गांव की सर्द रात, रजाई और जुदाई का दर्द घुला हुआ है. लेकिन भोजपुरी म्यूजिक की दुनिया की कहानी सिर्फ बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश या झारखंड तक ही सीमित नहीं है. इसकी एक धुन हजारों किलोमीटर दूर कैरेबियाई देशों तक गई और वहां के लोकसंगीत से मिलकर फिर एक नए रंग में वापस आई.

रजाई बिना रतिया... कैरेबियन से भोजपुरी इंडस्ट्री तक कैसे पहुंचा ये गाना? गिरमिटिया मजदूरों से है गहरा कनेक्शन
Image Credit: कैरेबियन से भोजपुरी इंडस्ट्री तक कैसे पहुंचा ये गाना?

ये कहानी सिर्फ किसी गाने की नहीं, बल्कि उन लोगों की है जो करीब डेढ़-दो सौ साल पहले रोजी-रोटी की तलाश में अपना घर-गांव छोड़कर समुद्र पार चले गए थे. यही लोग आगे चलकर 'गिरमिटिया मजदूर' कहलाए और अपने साथ अपनी भाषा, गीत, दुख और यादें भी ले गए. 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन के दौर में भारत से बड़ी संख्या में मजदूरों को मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना और टोबैगो जैसे इलाकों में ले जाया गया. इन मजदूरों से एक तरह का एग्रीमेंट कराया जाता था, जिसे बोलचाल में गिरमिट कहा जाने लगा. इन्हीं करारबद्ध मजदूरों को बाद में गिरमिटिया कहा गया. खेतों और गन्ने के बागानों में कठिन मेहनत करने वाले इन लोगों के लिए घर से दूर जिंदगी आसान नहीं थी. दिनभर पसीना बहाने के बाद जब रात आती, तो गांव की याद सताती. ऐसे में गीत उनके लिए सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि अपनेपन का सहारा बन गए.

इन मजदूरों के पास उस समय न कोई रेडियो था, न मोबाइल और न ही इंटरनेट जैसी कोई चीज. लेकिन उनके पास एक चीज थी, लोकगीत. शादी-ब्याह के गीत, कजरी, बिरहा, सोहर, फगुआ और भोजपुरी की दूसरी लोकधुनें उनके साथ समुद्र पार चली गईं. खेतों में काम करते हुए या शाम को खाली समय में लोग वही गीत गाते, जो उन्होंने अपने गांव में सुने थे. धीरे-धीरे वहां की लोकल भाषाओं और संगीत का असर इन गीतों पर पड़ने लगा.

कैसे कैरेबियाई ताल में शामिल हुई भोजपुरी भाषा?

धीरे-धीरे शब्दों में थोड़ा बदलाव आया, धुनों में नया रंग जुड़ा और भोजपुरी संगीत ने एक नया सफर शुरू कर दिया. यही वजह है कि कैरेबियाई देशों में आज भी भारतीय मूल के कम्युनिटी के बीच भोजपुरी की पुरानी छाप दिखाई देती है. समुद्र पार जाकर भोजपुरी गीत वहां के म्यूजिक से टकराए तो दोनों ने एक-दूसरे को इंस्पायर किया. कैरेबियाई म्यूजिक में अफ्रीकी, यूरोपीय और इंडियन ट्रैडिशन का अनोखा मेल पहले से मौजूद था.

भारतीय मजदूरों के लोकगीतों ने इस दुनिया में अपनी जगह बनाई और बदले में वहां की लिरिक्स और म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट का असर भारतीय मूल के गीतों पर पड़ा. यही ट्रैडिशन आगे चलकर चटनी म्यूजिक जैसी कैटेगरी में भी नजर आया. इस म्यूजिक में भोजपुरी या हिंदुस्तानी बोलों के साथ कैरेबियाई ताल सुनाई देती है. यानी जो गीत भारत से बाहर गया था, वो वहां की मिट्टी में घुलकर एक नए रूप में खिल उठा.

'रजाई बिना रतिया' में छिपी है घर की याद

'रजाई बिना रतिया...' जैसे गानों को अगर सिर्फ प्यार या सर्दी के गीत के तौर पर सुना जाए, तो कहानी अधूरी रह जाती है. इन बोलों में उस दौर की भावनाओं की झलक भी देखी जा सकती है, जब परदेस गए लोगों के लिए रातें लंबी हुआ करती थीं. घर से हजारों किलोमीटर दूर बैठे मजदूरों के लिए गांव की चौपाल, परिवार, खेत और मौसम सब यादों का हिस्सा बन गए थे. भोजपुरी लोकगीतों की खासियत ही यही रही है कि वो बड़े-बड़े इतिहास को आम आदमी की भाषा में बयान कर देते हैं. कभी प्रेमिका की याद बनकर, कभी मां की पुकार बनकर और कभी गांव की मिट्टी की खुशबू बनकर ये गाना हर जनरेशन चलता और सुना गया.

संगीत बना पहचान बचाने का जरिया

गिरमिटिया मजदूरों के लिए भोजपुरी सिर्फ बोलचाल की भाषा नहीं रही, बल्कि अपनी पहचान बचाने का एक मजबूत तरीका था. नई जनरेशन वहां पैदा हुईं, लोकल भाषाएं सीखीं और आसपास की संस्कृति का हिस्सा बनीं, लेकिन गानों ने उन्हें अपने पूर्वजों की कहानी से जोड़े रखा. यही वजह है कि आज मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे देशों में भारतीय लोगों की सांस्कृतिक पहचान में भोजपुरी लोकगीतों की अहम जगह है. समय के साथ इन गीतों में नए शब्द,  नए इंस्ट्रूमेंट और नई धुनें जुड़ती गईं, लेकिन उनके भीतर छिपी जड़ों की कहानी कभी खत्म नहीं हुई.

समुद्र पार का सफर आज भी जारी है

भोजपुरी म्यूजिक का ये सफर दरअसल पलायन की मजबूरी से शुरू होकर सांस्कृतिक ताकत की कहानी बन गया. जिन मजदूरों को कभी अपने घर से दूर जाना पड़ा था, उन्होंने अपनी भाषा और गीतों को वहां जिंदा रखा और अगली जनरेशन तक पहुंचाया. आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में कैरेबियन और भोजपुरी म्यूजिक की ये आवाज फिर नए लोगों तक पहुंच रही है. 'रजाई बिना रतिया...' जैसे बोल इसलिए खास हैं क्योंकि इनके पीछे सिर्फ एक धुन नहीं, बल्कि बिछड़ने, याद करने और अपनी मिट्टी को बचाए रखने की पूरी कहानी छिपी है. एक तरह से देखें तो गिरमिटिया मजदूर जहाज से सिर्फ भारत से बाहर नहीं गए थे, ब्लकि वो अपने साथ भोजपुरी की धड़कन भी लेकर गए थे, जो समुद्र पार जाकर भी कभी खामोश नहीं हुई.

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About the Author

Jyoti Rajput

Jyoti Rajput

ज्योति सिंह राजपूत जी न्यूज में सब एडिटर हैं और पिछले 1 साल से ज्यादा से डिजिटल मीडिया में काम कर रही हैं. दैनिक जागरण प्रिंट और सहारा न्यूज नेटवर्क में ट्रेनिंग लेने के बाद अब Zee News में काम कर रही हैं. कुछ समय तक लाइफस्टाइल की खबरों में काम करने के बाद अब एंटरटेनमेंट में काम कर रही हैं. वहीं हॉलीवुड की खबरों और फिल्मों पर पैनी नजर रखती हैं. उन्होंने पंडित माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी (MCU) से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर डिग्री हासिल की है. आप Jyoti.Rajput@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं.
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