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श्वेता त्रिपाठी आज हिंदी सिनेमा और ओटीटी की सबसे बेहतरीन और संजीदा एक्ट्रेसेस में से एक बन चुकी हैं. उनके सफर की शुरुआत थिएटर, एड्स और टीवी से हुई थी. फिल्म ‘मसान’ ने उन्हें एक अलग पहचान दी और ‘मिर्जापुर’ की ‘गोलू गुप्ता’ ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया. हाल ही में जी न्यूज से खास बातचीत में श्वेता ने अपने करियर, स्ट्रगल और पर्सनल लाइफ पर दिल खोलकर बात की. उन्होंने साफ कहा कि एक्टिंग उनके लिए सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि खुद को बयां करने का जरिया है.
काम में बेहद बिजी रहने के बाद भी श्वेता के लिए उनका परिवार और रिश्ते सबसे पहले आते हैं. उन्होंने पति चैतन्य शर्मा के साथ अपनी बॉन्डिंग और थिएटर को लेकर अपने लगाव पर भी बात रखी. उनका मानना है कि थिएटर उन्हें जमीन से जोड़े रखता है और हमेशा कुछ नया सिखाता है. एक्टिंग के साथ-साथ अब वो प्रोडक्शन में भी हाथ आजमा रही हैं और लगातार कुछ नया सीखने की कोशिश में रहती हैं. चलिए आपको भी बताते हैं कि उन्होंने जी न्यूज से और क्या-क्या बात की और क्या-क्या बताया?
सवाल: आपने 2009 में डिज्नी चैनल के शो ‘क्या मस्त है लाइफ’ से शुरुआत की थी, जिसमें आपका रोल एक टॉमबॉय का था. फिर 2015 में ‘मसान’ से बॉलीवुड में डेब्यू हुआ. इस बीच का जो वक्त था, वो आपके लिए कितना बड़ा टर्निंग पॉइंट रहा, आपको कब लगा कि अब आगे क्या करना है?
श्वेता: मुझे एक्टिंग बचपन से ही करनी थी, पर मैंने खुद कभी खुलकर ये बात मानी नहीं थी. स्कूल-कॉलेज के दिनों से स्टेज और थिएटर से जुड़ी थी. जब मुंबई आई, तो पहले एक मैगजीन में नौकरी कर रही थी. दिन में जॉब करती और शाम को हमारा एक थिएटर ग्रुप था, जहां हम सब मिलकर प्लेस पर बात करते और यूथ थिएटर फेस्टिवल 'थिएस्पो' के लिए ऑडिशन देते थे. फिर मैंने वो नौकरी छोड़ दी, क्योंकि मुझे क्रिएटिव फील्ड को पूरा वक्त देना था. इसके बाद मैंने एक पोस्ट-प्रोडक्शन स्टूडियो जॉइन किया.
जहां हम ट्रेलर्स की एडिटिंग करते थे. उसी दौरान पृथ्वी थिएटर में कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा की टीम से किसी ने मुझे डिज्नी के शो के बारे में बताया. मैंने ऑडिशन दिया और मेरा सिलेक्शन हो गया. वो रोल मिलने के बाद मैंने जॉब छोड़ दी. हां, ‘क्या मस्त है लाइफ’ और ‘मसान’ के बीच लंबा इंतजार जरूर रहा, क्योंकि मेरे दिमाग में बिल्कुल साफ था कि मुझे किस तरह का काम नहीं करना है. उस खाली वक्त में मैंने कास्टिंग का काम भी संभाला और अपना थिएटर जारी रखा.
सवाल: आप कैमरे के सामने भी एक्टिंग करती हैं और थिएटर भी करती आई हैं. थिएटर का वो पुराना डिसिप्लिन स्क्रीन पर काम करते वक्त कितनी मदद करता है?
श्वेता: थिएटर की सबसे खूबसूरत बात यही है कि वहां सब एक-दूसरे की मदद करते हैं. पूरी टीम बस शो को बेहतर बनाने में जुटी रहती है. जब आप स्टेज पर लाइव परफॉर्म कर रहे होते हैं, तो आपके साथी कलाकार ही आपको संभालते हैं. थिएटर की ये सीखा, ‘सब एक के लिए और एक सबके लिए’, इसने मुझे इंसान के तौर पर बहुत कुछ सिखाया है.
थिएटर में जो डिसिप्लिन होता है, वो कमाल का है. मैं अभी भी ‘एक्सटर्नल अफेयर्स’ नाम का एक प्ले कर रही हूं, जिसके शो के लिए हम कोलकाता और पुणे जा चुके हैं और आगे चेन्नई भी जा रहे हैं. इसके साथ ही एक नया नाटक भी शुरू कर रही हूं, जिसका प्रीमियर पृथ्वी थिएटर फेस्टिवल में होगा.
सवाल: ‘मिर्जापुर’ के पहले सीजन में ‘गोलू गुप्ता’ किताबों में खोई रहने वाली सीधी लड़की थी, लेकिन आगे चलकर उसके हाथों में बंदूक आ गई और दिल में बदला. किरदार के इस डार्क साइड को पर्दे पर जीना कितना मुश्किल था?
श्वेता: सच कहूं तो ये बहुत मुश्किल था, क्योंकि गोलू की दुनिया में बहुत अंधेरा है. उससे न सिर्फ उसके अपने लोग छीने गए, बल्कि उसके सपने भी टूट गए. वो कॉलेज प्रेसिडेंट बनकर चीजें सुधारना चाहती थी और मुन्ना जैसे लोगों के खिलाफ लड़ना चाहती थी, लेकिन जब अपनों को आंखों के सामने मरते देखते हैं, तो इंसान अंदर से पूरी तरह बदल जाता है.
गोलू के अंदर बहुत दर्द, डर और अकेलापन है, लेकिन हमारे राइटर्स, डायरेक्टर गुरमीत सिंह और डीओपी संजय कपूर ने मेरा बहुत साथ दिया. साथ ही अली फजल यानी हमारे 'गुड्डू भैया' के साथ ये पूरा सफर बहुत खास रहा. ये रोल निभाना आसान नहीं था, क्योंकि जो दर्द और गुस्सा गोलू महसूस करती है, वो मेरी असल जिंदगी से कोसों दूर है.
सवाल: पर्दे पर कोई भी बोल्ड या इंटीमेट सीन शूट करते वक्त एक एक्टर के तौर पर खुद को सहज रखना कितना बड़ा चैलेंज होता है?
श्वेता: ये बात सिर्फ इंटीमेट सीन पर नहीं, बल्कि किसी इमोशनल या एक्शन सीन पर भी उतनी ही लागू होती है. ऐसे सीन्स में सबसे जरूरी होता है भरोसा. अपने को-एक्टर और डायरेक्टर के साथ खुलकर बात करना बहुत जरूरी है. साथ ही कॉस्ट्यूम टीम से बात करना भी जरूरी है ताकि आप पूरी तरह सिक्योर महसूस करें.
अगर आपको किसी भी बात में झिझक या अनकंफर्टेबल लग रही है, तो वहां रुकना जरूरी है. चाहे महिला कलाकार हो या पुरुष, दोनों के लिए ये तय होना चाहिए कि सीन में क्या होगा, कैसे होगा और कब होगा. आजकल सेट्स पर इंटीमेसी कोऑर्डिनेटर्स भी होते हैं. अपनी पसंद-नापसंद और कम्फर्ट को लेकर खुलकर बोलना बहुत जरूरी है.
सवाल: ‘मिर्जापुर’ को ओटीटी सीरीज के बाद अब बड़े पर्दे पर ले जाने का एक्सपीरियंस कैसा रहा?
श्वेता: पिछले 9 सालों में सीजन 1 से सीजन 3 तक गोलू का किरदार जिस तरह बदला है, उसके बाद दोबारा उसी पुराने जोन में लौटना एक अलग चुनौती थी, लेकिन सबसे अच्छी बात ये है कि पिछले 9 सालों से हम एक ही टीम और कलाकारों के साथ काम कर रहे हैं, तो सब एक परिवार जैसे बन गए हैं.
शीबा चड्ढा, अली फजल और रसिका दुगल सबने कमाल का काम किया है. फिल्म की शूटिंग किसी फेस्टिवल की तरह लगी और मुझे पूरा यकीन है कि जब ऑडियंस इसे सिनेमाघरों में एक साथ देखेंगे, तो उन्हें स्टेडियम में मैच देखने जैसा मजा आएगा.
सवाल: एक्टिंग के बाद अब आप प्रोडक्शन में भी कदम रख रही हैं. बतौर प्रोड्यूसर आप क्या नया करना चाहती हैं?
श्वेता: मेरी बस यही कोशिश है कि हम अपनी तरफ से सबसे बेहतरीन काम ऑडियंस के सामने रखें, चाहे वो शॉर्ट फिल्म हो, थिएटर हो, ओटीटी हो या कोई बड़ी फिल्म. मैं ऐसी कहानियां कहना चाहती हूं जो लोगों के दिलों को छुएं. लोग उन पर बात करें, सवाल उठाएं और आपस में चर्चा करें.
आजकल हर कोई फोन और स्क्रीन में इतना उलझ गया है कि अपने ही दायरे में सिमट कर रह गया है. मैं चाहती हूं कि लोग उस दायरे से बाहर निकलें, किरदारों से जुड़ें, हंसे-रोएं और दूसरों की जिंदगी को भी समझें.
(बता दें, एक प्रोड्यूसर के तौर पर एक्ट्रेस अपनी पहली फिल्म ‘क्वीर लव स्टोरी’ ला रही हैं)
सवाल: कोई ऐसा खास किरदार या जॉनर है, जिसे आप बहुत शिद्दत से करना चाहती हैं?
श्वेता: मैं किसी पीरियड ड्रामा फिल्म में काम करना चाहती हूं. मुझे ऐसे किरदार बहुत पसंद आते हैं, जो मुश्किल वक्त में भी डटकर खड़े रहते हैं और जिनकी पर्सनैलिटी में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलता है. इसके अलावा, मैं पर्दे पर एक टीचर का रोल निभाना चाहती हूं, क्योंकि मेरा परिवार टीचर्स का रहा है. एक वकील का रोल भी मेरी लिस्ट में है, क्योंकि मैंने खुद लॉ की पढ़ाई की थी और सिस्टम में कुछ बदलाव लाना चाहती थी. इसके साथ ही कोई सुपरहीरो या जासूस का रोल करना भी मेरा सपना है.
सवाल: आपने तमिल फिल्म ‘मेहंदी सर्कस’ में काम किया है. आगे दूसरी भाषाओं के सिनेमा को लेकर आपकी क्या प्लानिंग है?
श्वेता: बिल्कुल, मैं बंगाली और साउथ की फिल्मों में और काम करना चाहती हूं. मुझे एक स्टूडेंट बनकर नई चीजें सीखने में बहुत मजा आता है. जब आप किसी नई भाषा में काम करते हैं, तो आपका एक्सपीरियंस दोगुना हो जाता है. मेरी तमिल फिल्म के लिए डबिंग भी मैंने खुद ही की थी. जज्बात तो हर भाषा में एक जैसे होते हैं, इसलिए मैं रीजनल सिनेमा में खूब काम करना चाहती हूं.
सवाल: आप अपने पति चैतन्य शर्मा के साथ प्ले ‘एक्सटर्नल अफेयर्स’ में काम कर रही हैं. लाइफ पार्टनर के साथ स्टेज शेयर करना कितना अलग एक्सपीरियंस है?
श्वेता: हम दोनों ही काम के मामले में बहुत संजीदा हैं, इसलिए घर की बातें कभी रिहर्सल या स्टेज पर नहीं आतीं. बस एक ही पेंच है कि उन्हें पता होता है कि मैंने कितनी तैयारी की है, तो मैं उनके सामने कोई बहाना नहीं बना सकती. चैतन्य काम को लेकर बहुत पक्के हैं. स्टेज पर उनकी एनर्जी और ऑडियंस से जुड़ने का अंदाज इतना शानदार होता है कि उनके साथ कदम मिलाने के लिए मुझे भी अपनी मेहनत बढ़ानी पड़ती है.
सवाल: आपकी डाइट और लाइफस्टाइल को लेकर सुना है कि आपने खानपान में काफी बदलाव किया है और अब शाकाहारी खाना पसंद कर रही हैं?
श्वेता: जब मैं फिल्म ‘कंजूस मक्खीचूस’ की शूटिंग कर रही थी, तब कुणाल खेमू को देखकर मैंने शाकाहारी बन गई थी. तब मुझे समझ आया कि वेज खाने में कितनी सारी चीजें हैं लौकी, तोरई, तरह-तरह की दालें, सत्तू, छाछ और घर की चटनियां. पहले मेरी डाइट में 80% नॉन-वेज और सिर्फ 20% वेज खाना होता था, लेकिन अब मामला बिल्कुल उलट चुका है. अब 80% शाकाहारी खाना खाती हूं और कभी-कभार ही नॉन-वेज का मन करता है.
सवाल: पर्दे पर ‘गोलू दीदी’ जैसा गंभीर और भारी किरदार निभाने के बाद असल जिंदगी में आप इतनी शांत और सिंपल कैसे रह पाती हैं?
श्वेता: मेरे दोस्त और मेरे पति मुझे हमेशा जमीन से जोड़कर रखते हैं. आप कैसे लोगों के बीच उठते-बैठते हैं, इसका असर आप पर पड़ता ही है. डाइट सिर्फ थाली के खाने से नहीं बनती, बल्कि आप क्या देखते हैं, किससे मिलते हैं और आपकी सोच कैसी है, ये सब चीजें आपको बनाती हैं. मेरे ज्यादातर करीबी दोस्त फिल्म लाइन से बाहर के हैं. उनकी सादगी, उनका जीवन और उनका नजरिया मुझे हमेशा एक बेहतर और सुलझा हुआ इंसान बने रहने में मदद करता है.