शरद केलकर का 'इनविजिबल स्टारडम'; चेहरा किसी और का, लेकिन आवाज ने बना दिया स्टार
बॉलीवुड एक्टर शरद केलकर ने बतौर एक्टर अपनी अलग पहचान बनाई, लेकिन उनकी आवाज ने उन्हें एक अलग पहचान दी. 'बाहुबली' में प्रभास के किरदार को हिंदी आवाज देने के बाद उनकी दमदार आवाज घर-घर पहचानी गई.
यूं तो फिल्म स्टार को पहचान के लिए अपने चेहरे की जरूरत होती है. लेकिन कई ऐसे भी कलाकार हैं, जिन्होंने भले ही कैमरे के सामने एक्टिंग नहीं की. लेकिन बावजूद इसके उनके हर डायलॉग पर जबरदस्त तालियां बजी. यहां हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के ऐसे शख्स की, जिसने अपनी एक्टिंग और दमदार आवाज से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई. और वो जगह इतनी पक्की हुई कि उनके फैंस सिर्फ की वक आवाज से उन्हें पहचानने लगे.
बॉलीवुड एक्टर शरद केलकर वो शख्स हैं, जो अपनी दमदार आवाज और एक्टिंग के लिए जाने जाते हैं. 7 अक्टूबर 1976 को ग्वालियर में जन्मे शरद ने टीवी सीरियल से अपने करियर की शुरुआत की थी. शरद केलकर का नाम एक्टिंग की दुनिया में तो है ही लेकिन उनकी आवाज आज देश की नंबर 1 फिल्म 'बाहुबली 2' के नाम है. यहां सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि शरद ने कभी किसी दूसरे एक्टर की डबिंग नहीं की. वह अपने पूरे करियर में अभी तक सिर्फ प्रभास की ही आवाज बने हैं. यही आवाज बाहुबली से लेकर 'आदिपुरुष' के राम की आवाज बन गई. मानों चेहरे से किसी और को आवाज से शरद को स्टारडम मिला. इसी को इनविजिबल स्टारडम (Invisible Stardom) कहते हैं. आज हम इस पूरे कॉन्सेप्ट को आसान भाषा में समझेंगे. लेकिन उससे पहले थोडा शरद केलकर के बारे में जान लेते हैं...
मॉडलिंग से की थी करियर की शुरुआत
शरद के पिता मध्य प्रदेश सरकार में पीडब्ल्यूडी इंजीनियर थे. केलकर ने एमबीए के बाद शरद ने मुंबई की चकाचौंध वाली दुनिया में कदम रखा. शरद ने साल 2004 में ग्रासिम मिस्टर इंडिया कॉम्पिटिशन में हिस्सा लिया था। इससे पहले शरद फिटनेस ट्रेनर हुआ करते थे। यहां वो शो के फाइनलिस्ट रहे थे, जिसके बाद इसी साल उन्हें दूरदर्शन के शो 'आक्रोश 'में कास्ट कर लिया गया था। फिर साल 2004 में आई फिल्म 'हलचल' में भी कैमियो रोल किया. लेकिन उन्हें पॉपुलैरिटी 'सिंदूर तेरे नाम का' और 'सात फेरे' जैसे टीवी सीरियल से मिली.
फिर साल 2009 में आया शो 'बैरी पिया' में ठाकुर दिग्विजय सिंह भदौरिया का किरदार निभाकर वह मशहूर हुए. इस किरदार के लिए केलकर को 2010 के गोल्ड अवॉर्ड्स में बेस्ट निगेटिव एक्टर का खिताब मिला. फिर साल 2013 में उन्होंने फिल्मी दुनिया में कदम रखा. वो संजय लीला भंसाली की फिल्म 'गोलियों की रासलीला रामलीला' में नजर आए. इस फिल्म में वह एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण के बड़े भाई के किरदार में नजर आए. इसके अलावा 2014 की मराठी ब्लॉकबस्टर 'लई भारी' से वह मराठी सिनेमा के चहेते बन गए.
बॉलीवुड में 'हाउसफुल 4' के सूर्यभान माइकल भाई ने कॉमेडी का जलवा बिखेरा, तो 'तान्हाजी: द अनसंग वॉरियर' में छत्रपति शिवाजी महाराज का दमदार रोल निभाया. इसके अलावा, अक्षय कुमार की फिल्म 'लक्ष्मी' में लक्ष्मी के रोल में अद्भुत क्षमता दिखाई. केलकर ने हिंदी, मराठी के अलावा तमिल और तेलगु फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी है. कभी हकलाने वाले शरद केलकर एक बेहतरीन वॉयसओवर आर्टिस्ट भी हैं. उनके वॉयसओवर का मैजिक 'बाहुबली' सीरीज, हॉलीवुड और साउथ की कई फिल्मों में दिखाई देता है.
'बाहुबली' ने बदली आवाज की पहचान
बाहुबली में शरद ने लीड कैरेक्टर यानी प्रभास की आवाज दी थी. उनकी दमदार, बुलंद आवाज ने लीड कैरेक्टर की ताकत को हिंदी दर्शकों से जोड़ा. रातोरात चर्चा होने लगी कि प्रभास की एक्टिंग के पीछे आवाज किसकी है. शरद ने बाहुबली के दूसरे पार्ट और बाहुबली- क्राउन ऑफ ब्लड में भी अपनी आवाज दी है.
दरअसल, एक्टर शरद की एक्टिंग साथ शुरू से ही आवाज और भाषा पर भी अच्छी पकड़ थी. ऐसे में उनके साउथ इंडियन दोस्त उन्हें डबिंग करने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करते रहते थे। इसी बीच उन्होंने डबिंग डायरेक्टर मोना शेट्टी से मुलाकात की। बता दें कि 'डबिंग' एक कंपनी ही नाम है, जो हॉलीवुड फिल्मों की हिंदी और अन्य भाषाओं में डबिंग करने का काम करती है। इसी बीच साउथ सिनेमा के मशहूर डायरेक्टर राजमौली को तेलुगू फिल्म 'बाहुबली: द कन्क्लूजन' के हिंदी वर्जन के लिए लीड एक्टर प्रभास की जरूरत थी। किसी ने उन्हें शरद को नाम सुझाया। यहां जब उन्हें वॉइस टेस्ट के लिए बुलाया गया, तो कुछ ही देर में उनके नाम का ऐलान भी कर दिया. बताया जाता है कि शरद ने महज 5 दिनों के अंदर फिल्म 'बाहुबली: द क्न्क्लूजन' की डबिंग पूरी कर दी।
आवाज सिर्फ डबिंग नहीं, 'परफॉर्मेंस' क्यों है?
किसी भी फिल्म या शो के लिए जितनी जरूरी एक्टिंग है उतनी ही जरुरी डबिंग भी है. चाहे कितनी भी अच्छी एक्टिंग क्यों ना हो लेकिन जब डबिंग अच्छी नहीं हुई तो, वो बेकार है. डबिंग में किसी भी स्टार का चेहरा नहीं दिखता. लेकिन फिर भी उससे आवाज में भी वो भाव-भंगिमा दिखाना होता है. इसके लिए सबसे जरूरी है डायलॉग डिलीवरी. इसके साथ ही आवाज की स्पीड भी उतना ही जरुरी है.हर डायलॉग एक स्पीड या पेग में नहीं बोला जाता है. साथ ही आवाज में उतार-चढ़ाव भी जरुरी होता है. यही वजह है कि डबिंग कलाकार सिर्फ किसी कैरेक्टर में आवाज नहीं देता.
अगर शरद केलकर की आवाज की खासियत की बात करें तो उनकी सबसे बड़ी खूबी है कि उनकी आवाज में डेप्थ. यानी उनकी आवाज में वो गहराई है, जो नार्मल बातचीत में भी एक ठहराव मशहूर कराती है. यहां समझने वाली बात यह है कि सिर्फ भारी आवाज से कोई स्टार अच्छा वॉइस आर्टिस्ट नहीं बनता. लेकिन उसमें फर्क होता है कि कितनी मोड्यूलेशन है. इसका मतलब ये है कि आवाज में सिचुएशन के मुताबिक बदलना होता है. यही शरद केलकर की आवाज में खासियत है. उन्होंने प्रभास की 'बाहुबली' में वो खासियत देखने को मिली.
इनविजिबल स्टारडम का असली मतलब क्या है?
जब हम किसी एक शख्स की आवाज सुनते हैं, कसी ऐड में, किसी फिल्म में, किसी प्रोजेक्ट में. लेकिन पर्दे पर वो शख्स नजर नहीं आता. ऐसे में वो आवाज ही पहचान बन जाता है. इसी को इनविजिबल स्टारड है. इसका सबसे बड़ा उदहारण है फिल्म 'बाहुबली'. इस फिल्म में भले ही चेहरा प्रभास का दिखा. पॉपुलैरिटी भी प्रभास को मिली. लेकिन बावजूद इसके हिंदी सिनेमा के ऑडियंस के लिए किरदार के साथ-साथ शरद की आवाज को भी उनता ही क्रेडिट मिला.
(आईएएनएस इनपुट के साथ)