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साल 1993 के उस दौर को भला कौन भूल सकता है, जब रविवार की सुबह टीवी स्क्रीन पर बांसुरी की धुन गूंजते ही गलियों में सन्नाटा पसर जाता था. रामानंद सागर का शो ‘श्री कृष्ण’ भारतीय टेलीविजन के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ. बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सब काम छोड़कर टीवी के सामने हाथ जोड़कर बैठ जाते थे. बाल कृष्ण के रूप में स्वप्निल जोशी की मासूम मुस्कान और बड़े कृष्ण के किरदार में सर्वदमन बनर्जी की शांत मुस्कुराहट ने करोड़ों लोगों के दिलों पर राज किया, लेकिन घर-घर में पूजे जाने वाले इस शो को टीवी तक पहुंचने के लिए बड़ी जंग लड़नी पड़ी.
रामानंद सागर के बेटे प्रेम सागर ने अपने पिता की बायोग्राफी ‘एन एपिक लाइफ: रामानंद सागर’ में इस शो के पीछे के संघर्ष का दर्द बयां किया है. बायोग्राफी के मुताबिक, शो का ऑनएयर होना बिल्कुल वैसा ही चैलेंजिंग था, जैसे कंस के कड़े पहरे वाली मथुरा की जेल में कान्हा का जन्म हुआ था. ‘रामायण’ जैसे हिस्टोरिकल और सुपरहिट शो को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले रामानंद सागर को खुद कान्हा की लीलाओं को टीवी पर दिखाने के लिए सरकारी महकमों और दूरदर्शन के कड़े नियमों के आगे लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी थी. दूरदर्शन प्रशासन की बेरुखी ने इस जंग और मुश्किल बना दिया था.
हाल ही में सिंगर, वॉइस एक्टर और क्रिएटिव प्रोड्यूस यतिन सांगोई ने भी अपने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर कर उन पुराने मुश्किल वक्त को याद किया. उन्होंने बताया कि ‘रामायण’ और ‘उत्तर रामायण’ की जबरदस्त सक्सेस के बाद रामानंद सागर को उम्मीद थी कि उनके नए सीरियल ‘श्री कृष्ण’ को भी दूरदर्शन पर आसानी से स्लॉट मिल जाएगा. हालांकि, नियमों में बदलाव के चलते दूरदर्शन ने रविवार सुबह का स्लॉट देने से मना कर दिया. इसके बावजूद रामानंद सागर पीछे नहीं हटे और उन्होंने इसे वीडियो कैसेट पर रिलीज करने का फैसला किया. डाबर और हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसे बड़े ब्रांड्स ने इस प्रोजेक्ट को स्पॉन्सर किया, जिससे 2 करोड़ 34 लाख रुपये जुटाए गए.
उन्होंने आगे बताया कि 22 अप्रैल 1992 को उज्जैन में बड़े पर्दे पर इसका पहला एपिसोड दिखाया गया, जो अगले दिन अखबारों की बड़ी सुर्खी बन गया. इटली के रिमिनी सिनेमा में जब ‘श्री कृष्ण’ को सिल्वर मेडल मिला, तो ये खबर भारत में चर्चा का विषय बन गई. इसके बाद देश भर में ये सवाल उठने लगा कि जिस देश में भगवान कृष्ण करोड़ों लोगों के आराध्य हैं, वहां ये सीरियल क्यों नहीं दिखाया जा रहा? रामानंद सागर के बेटे प्रेम सागर ने मॉरिशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ से संपर्क कर वहां इस शो का वर्ल्ड प्रीमियर कराया. इसके बाद ये मामला सीधे भारतीय संसद (पार्लियामेंट) तक पहुंच गया और सरकार पर शो को भारत में टेलीकास्ट करने का भारी दबाव बनने लगा.

उन्होंने आगे बताया कि इसी दौरान दूरदर्शन ने अपना नया चैनल ‘डीडी 2’ (मेट्रो) शुरू किया था. एडवरटाइजिंग जगत के दिग्गज आर. के. स्वामी ने दूरदर्शन से बिना सीरियल का नाम बताए रविवार सुबह का स्लॉट अपने लिए बुक करा लिया. 20 अगस्त, 1993 को जब अधिकारियों ने पूछा कि कौन सा शो टेलीकास्ट होगा, तो जवाब में ‘श्री कृष्ण’ का नाम सुनकर उनके होश उड़ गए. चूंकि सीरियल पहले से ही वीडियो रिलीज के लिए सेंसर पास कर चुका था, इसलिए दूरदर्शन इसे मना नहीं कर सका. आखिरकार 22 अगस्त 1993 को, चार साल के लंबे संघर्ष और रणनीति के बाद, ‘श्री कृष्ण’ का टेलीकास्ट दूरदर्शन पर शुरू हुआ, जो आज भी लाखों लोगों की यादों और दिल में बसा हुआ है.
‘श्री कृष्ण’ केवल एक टीवी शो नहीं था, बल्कि भारतीय लोगों की अटूट आस्था का जीवंत दस्तावेज बन गया था. इस शो की सक्सेस ने ये साबित कर दिया कि जब भावना सच्ची हो और इरादे नेक हों, तो कोई भी रुकावट ज्यादा देर तक टिक नहीं सकती. ठीक उसी तरह जैसे ‘श्री कृष्ण’ के जन्म के समय मथुरा के कारागार के सारे ताले टूट गए थे और नंद गांव के लिए वासुदेव जी को यमुना ने राह दे दी थी, ठीक वैसे ही हर प्रशासनिक अड़चन को पार कर रामानंद सागर की ये सीरियल लोगों के घरों के साथ-साथ उनके दिलों तक भी पहुंचा. आज भी जब भारतीय टेलीविजन के स्वर्णिम दौर की बात होती है, तो ‘श्री कृष्ण’ की वो संघर्ष गाथा गर्व से याद की जाती है.