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Radhika Apte Birthday Special: बॉलीवुड में एक लंबा दौर ऐसा रहा है, जब किसी एक्ट्रेस की पहचान अक्सर उसकी खूबसूरती, ग्लैमरस अंदाज और हीरो के साथ रोमांटिक केमिस्ट्री से ही तय की जाती थी. लेकिन इसी इंडस्ट्री में कुछ ऐसी हसीनाएं भी आईं, जिन्होंने इस तयशुदा फॉर्मूले को अपने मनपसंद किरदारों से कड़ी चुनौती दी. 7 सितंबर को अपना जन्मदिन मना रहीं राधिका आप्टे उन्हीं चुनिंदा नामों में शामिल हैं, जिन्होंने अपने करियर में हमेशा ऐसे किरदारों का चयन किया, जिनमें पर्दे पर सिर्फ खूबसूरत दिखना उनका मकसद नहीं था, बल्कि कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनना उनके लिए ज्यादा जरूरी था.
फिल्मों की इस चकाचौंध भरी दुनिया में कदम रखने से पहले राधिका आप्टे ने थिएटर से अपने अभिनय की शुरुआत की थी. शायद यही वजह रही कि उनके लिए अभिनय कभी भी सिर्फ एक 'स्टार' बनने का जरिया नहीं रहा. साल 2016 में वोग इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बेहद साफ शब्दों में कहा था कि उनके लिए स्क्रीन पर वह क्या और कैसा काम कर रही हैं, यह उनकी व्यक्तिगत इमेज या स्टारडम से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.
राधिका ने खुद अपने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि उन्हें बड़े पर्दे पर हमेशा एक 'क्यूट' या एकदम अच्छी लड़की वाले सीधे-सादे किरदार निभाना आसान नहीं लगता. इसके बजाय उन्हें वर्सेटाइल और पेचीदा किरदार निभाना अधिक पसंद है. उनके मुताबिक, ऐसे पेचीदा किरदारों को निभाते समय वे एक कलाकार के तौर पर खुद को ज्यादा लचीला महसूस करती हैं.

फिल्म 'पार्चड' राधिका आप्टे के करियर की उन बेहतरीन फिल्मों में से एक रही, जिसने उन्हें फिल्म जगत में सिर्फ एक सामान्य अभिनेत्री नहीं, बल्कि गंभीर और चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने वाली मंझी हुई कलाकार के रूप में स्थापित किया. इस फिल्म में उन्होंने 'लज्जो' का किरदार निभाया, जिसकी जिंदगी सामाजिक बंधनों, जटिल रिश्तों और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के बीच फंसी हुई थी. राधिका ने बाद में साझा किया था कि फिल्म में लज्जो के वॉर्डरोब (पहनावे) ने उन्हें उस किरदार के आंतरिक संघर्ष और दर्द को गहराई से समझने में बड़ी मदद की थी.

अपनी साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म 'फोबिया' में राधिका ने एक ऐसी महिला का रोल प्ले किया, जो गंभीर एगोराफोबिया की बीमारी से जूझ रही है. यह कोई पारंपरिक ग्लैमरस रोल नहीं था, बल्कि पूरी फिल्म का एक बड़ा हिस्सा एक ही बंद जगह और उनके किरदार के भीतर के गहरे डर के इर्द-गिर्द घूमता है. राधिका ने इसे अपना पहला सोलो लीड प्रोजेक्ट बताते हुए कहा था कि इसके पैनिक अटैक वाले दृश्यों को शूट करना उनके लिए शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद थका देने वाला और चुनौतीपूर्ण था.

राधिका हमेशा एक जैसे किरदारों को बार-बार दोहराने से बचती रही हैं. फिल्म 'बदलापुर' में जहां उनके किरदार ने पूरी कहानी को एक मजबूत भावनात्मक आधार दिया, वहीं 'अंधाधुन' में 'सोफी' के रोल ने फिल्म के रहस्य और सस्पेंस की घटनाओं को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. साल 2018 में उन्होंने अपने करियर के बारे में बात करते हुए कहा था कि कलाकारों को लगातार खुद को चुनौती देते रहना चाहिए, और उन्होंने पैडमैन, पार्चड और सेक्रेड गेम्स को अपने लिए बेहद अलग और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं के रूप में देखा.

भारत में जब ओटीटी (OTT) का शुरुआती दौर था और लोग इसे समझ रहे थे, तब राधिका आप्टे उन चुनिंदा अभिनेत्रियों में शामिल थीं, जिन्होंने इस माध्यम को बेहद गंभीरता से अपनाया. सेक्रेड गेम्स, घोल और लस्ट स्टोरीज जैसे दमदार प्रोजेक्ट्स ने उनकी पहचान को पारंपरिक सिनेमाघरों की सीमाओं से बाहर निकालकर वैश्विक स्तर पर मजबूत किया. 'सेक्रेड गेम्स' में उन्होंने रॉ (RAW) अधिकारी 'अंजलि माथुर' की भूमिका निभाई, जो केवल पुरुष किरदारों के इर्द-गिर्द घूमने वाला कोई कमजोर महिला पात्र नहीं थी, बल्कि उसकी अपनी महत्वाकांक्षा, अपना काम और अपनी अलग सोच थी, जो उस दौर में लैंगिक समानता के लिए भी संघर्ष कर रही थी.

राधिका के करियर का सबसे अनोखा पहलू यह है कि उन्होंने कभी भी 'स्टारडम' को अपनी अंतिम मंजिल नहीं माना. साल 2021 में वोग इंडिया से बात करते हुए उन्होंने खुलकर कहा था कि वे कभी स्टार नहीं बनना चाहती थीं; हां, अगर काम के दम पर स्टारडम मिल जाए और उससे मनपसंद काम चुनने की आजादी मिले, तो वह बात अलग है. उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह हमेशा खुद को खुश करने वाले और चुनौती देने वाले प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बनी रहें, फिर चाहे वह फिल्म हो या ओटीटी प्लेटफॉर्म.

शायद यही राधिका आप्टे के करियर को देखने का सबसे दिलचस्प तरीका है. उन्होंने किसी एक फिल्म से रातोंरात यह बदलाव नहीं किया, बल्कि लगातार लीक से हटकर किरदारों का चयन करके सिनेमा में 'हीरोइन' की परिभाषा को नए सिरे से गढ़ा है. चाहे 'लज्जो' हो, 'फोबिया' की सहमी हुई महिला, 'अंजलि माथुर' हो या 'सोफी'- हर रोल में उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी है. उनका करियर आज की अभिनेत्रियों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है, यदि दो रास्ते हों-एक सिर्फ सुंदर दिखने का और दूसरा चुनौतीपूर्ण किरदारों का- तो क्या दूसरी राह लंबे समय तक याद रखी जाती है? राधिका का अब तक का सफर साबित करता है कि ग्लैमर और ट्रेंड्स समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन मजबूत किरदार हमेशा जिंदा रहते हैं.
वहीं इस मुद्दे पर हमने बॉलीवुड सिंगर शिबानी कश्यप से बात की. उन्होंने राधिका आप्टे की जमकर तारीफ की. शिबानी ने कहा, 'राधिका ने यह साबित किया है कि एक अभिनेत्री की पहचान सिर्फ ग्लैमर या स्क्रीन पर उसकी खूबसूरती से नहीं, बल्कि उसके किरदारों की गहराई और उन्हें निभाने के साहस से होती है. उन्होंने लगातार ऐसे रोल चुने, जो आसान या पारंपरिक नहीं थे और इसी वजह से उन्होंने ‘हीरोइन’ की परिभाषा को खूबसूरती से आगे बढ़ाकर एक मजबूत कलाकार की पहचान दी है.'
शिबानी ने राधिका के बारे में बात करते हुए कहा कि उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी वर्सेटाइल और किसी किरदार में पूरी तरह उतर जाने की क्षमता है. शिबानी को लगता है कि राधिका ने हर चैलेंज का सामना किया है. उन्होंने कहा, 'चाहे किरदार कितना भी चैलेंजिंग क्यों न हो, राधिका उसे बहुत ईमानदारी के साथ निभाती हैं. उनकी चॉइसेज यह दिखाती हैं कि वह सिर्फ एक स्टार के तौर पर नहीं, बल्कि एक कलाकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने में विश्वास रखती हैं.'