एक टीचर ने दिखाई अभिनय की राह, मां की तस्वीर के साथ रखी उनकी फोटो; कुछ ऐसा था पृथ्वीराज कपूर का गुरुओं के लिए सम्मान
हिंदी सिनेमा के मशहूर एक्टर पृथ्वीराज कपूर का जिंदगी में एक नया मोड़ तब आया था, जब उनकी जिंदगी में एक टीचर नोरा रिचर्ड्स की एंट्री हुई. उन्हीं को देखने के बाद उनके भीतर अभिनय और थिएटर के प्रति जुनून पैदा हुआ. इतना ही नहीं एक्टर अपनी मां की तस्वीर के साथ टीचर की तस्वीरे के साथ भी हर सुबह दोनों को नमन करते थे.
आज के दौर में जिस नाम को भारतीय सिनेमा की नींव रखने वालों में गिना जाता है, कभी उस शख्स के पास मुंबई में दो वक्त का खाना खाने तक के पैसे नहीं थे. सिनेमा में कुछ ऐसे कलाकार हैं, जिन्होंने सिर्फ फिल्मों में अभिनय करके ही नहीं, बल्कि थिएटर के जरिए भी अपनी अलग पहचान बनाई है और ऐसे ही कलाकारों में पृथ्वीराज कपूर का नाम शामिल है. वे फिल्म इंडस्ट्री के बड़े सितारे होने के साथ-साथ थिएटर के प्रति भी काफी समर्पित थे.
एक वक्त था, जब मुंबई के तारदेव में तीसरी मंजिल पर बने एक तंग कमरे में पृथ्वीराज कपूर बीमार पड़े थे. वे इतने कमजोर थे कि खाना लेने के लिए बाहर भी नहीं जा सकते थे और शहर में नए होने की वजह से किसी को उनके न होने का पता भी नहीं चला. फिर, एक दोपहर उनके दरवाजे पर कमाठीपुरा के पुराने 'बाजार-ए-हुस्न' से जुड़ी एक युवती आई, जो नीचे बने ढाबे पर काम करती थी. वह उनके लिए खाना लेकर आई. उसने देखा था कि वे पिछले दो दिनों से वहां नहीं आए थे.
कपूर ने उसे अंदर आने के लिए कहा, लेकिन वह दरवाजे पर ही ठिठक गई. उसे डर था कि अगर कपूर को पता चल गया कि वह कौन है, तो वह उसे वापस भेज देंगे. इसलिए, कपूर ने एक साधारण धागा उठाया और उसे थमा दिया. उन्होंने कहा, 'इसे मेरी कलाई पर बांध दो. आज से यह एक राखी है.' वह पल उस इंसान की एक झलक था, जो आगे चलकर भारतीय थिएटर और सिनेमा की पहचान बनाने वाला था.
'दास्तान-ए-राज कपूर' जैसी दास्तानगोई प्रस्तुति के लेखक और नाटककार सिब्तैन शाहिदी बताते हैं, 'एक बड़ा नाम बनने से पहले भी उनमें एक ऐसी नैतिक समझ थी, जो उन्हें सबसे अलग बनाती थी. यह कोई दिखावा या बनावटीपन नहीं था. उन्होंने कभी इसलिए मदद नहीं की कि लोग उन्हें मदद करते हुए देखें. वे बस किसी और तरह से बर्ताव कर ही नहीं सकते थे.'
एक पूरे दौर को किया था परिभाषित
बता दें कि पृथ्वीराज कपूर एक बहुत बड़ी हस्ती थे, जिनकी आवाज और मंच तथा पर्दे पर उनकी मौजूदगी ने एक पूरे दौर को परिभाषित किया. वे उन शुरुआती लोगों में से थे, जिन्होंने थिएटर से लेकर मूक फिल्मों, फिर बोलती फिल्मों और आखिर में रंगीन फिल्मों तक का सफर तय किया और शायद वे अकेले ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने यह सब इतनी सहजता से कर दिखाया. 'सिकंदर' (1941), 'आवारा' (1951) और 'मुगल-ए-आजम' (1960) जैसी फिल्मों में उनके काम और साथ ही थिएटर के प्रति उनके समर्पण ने उन्हें भारतीय कथा-परंपरा का एक आधार स्तंभ बना दिया.
नाटककार सिब्तैन शाहिदी 'द प्रिंट' को बताते हैं कि 'पृथ्वीराज कपूर ने सिर्फ अभिनय ही नहीं किया, बल्कि उन्होंने भारत में अभिनय के मायने को और व्यापक बना दिया. वे सिनेमा में रंगमंच की गंभीरता लेकर आए और रंगमंच में सिनेमा जैसी सुलभता.' पृथ्वीराज कपूर ने अपने व्यक्तित्व से भी कहीं बड़ी एक ऐसी विरासत खड़ी की, जो 1972 में कैंसर से उनके निधन के लंबे समय बाद भी कायम रही. इसमें सिर्फ फिल्में और रंगमंच ही नहीं, बल्कि काम करने, जीने और लोगों को देखने का एक खास नजरिया भी शामिल था.
कैसे हुई इन सबकी शुरुआत
दरअसल, इन सबकी शुरुआत डेसडेमोना से हुई थी. पृथ्वीराज कपूर का सफर पाकिस्तान के फैसलाबाद (जो पहले लायलपुर था) के पास, समुंदरी में एक अकेले बच्चे के रूप में शुरू हुआ. वे एक ऐसी दुनिया में पले-बढ़े, जहां कई तरह की भाषाएं और संस्कृतियां मौजूद थीं. जब वे तीन साल के थे, तब उनकी मां का निधन हो गया. शाहिदी, जिन्होंने 1930 और 1940 के दशक के अभिलेखों को खंगालने में घंटों बिताए हैं, बताते हैं कि 'बचपन में उन्हें अपने पिता से बहुत कम मार्गदर्शन मिला. उनके पिता 'इंडियन इंपीरियल पुलिस' में अधिकारी थे और पेशावर शहर में तैनात थे. उनके पिता का चरित्र कुछ ऐसा था कि वे कई महिलाओं के साथ संबंध रखते थे.'
इस वक्त आया था नया मोड़
पृथ्वीराज कपूर की जिंदगी में नया मोड़ तब आया, जब लाहौर के एडवर्ड्स कॉलेज में नोरा रिचर्ड्स नाम की एक शिक्षिका ने उन्हें थिएटर से परिचित कराया. 'ओथेलो' नाटक में नोरा रिचर्ड्स को 'डेसडेमोना' का किरदार निभाते देखकर कपूर के भीतर कुछ बदल गया. जल्द ही, वे थिएटर के प्रति पूरी तरह समर्पित हो गए. शाहिदी बताते हैं कि 'वे अपने दफ्तर में अपनी मां की तस्वीर के बगल में नोरा रिचर्ड्स की दो बड़ी तस्वीरें रखते थे. हर सुबह नहाने और अगरबत्ती जलाने के बाद वे उन दोनों के सामने सिर झुकाते थे. वे अपनी शिक्षिका और अपनी मां को एक साथ सम्मान देते थे.'
15 साल की रामसरनी मेहरा से की थी शादी
17 साल की उम्र में उन्होंने 15 साल की रामसरनी मेहरा से शादी कर ली. 18 साल की उम्र में हाथ में सिर्फ 200 रुपये लेकर, वे अपनी गर्भवती पत्नी को पीछे छोड़ ट्रेन से बॉम्बे (मुंबई) के लिए निकल पड़े. यह शहर बहुत विशाल था. यहां पहुंचते ही उनकी पहली इच्छा बस समुद्र को देखने की थी. अरब सागर के सामने खड़े होकर, उन्होंने खुद से कहा, यह शहर भी इस पानी की तरह ही विशाल है और वे जानते थे कि इस शहर में उन्हें अपनी जगह खुद बनानी होगी.