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एक एयर होस्टेस, एक कैप्टन और दो असाधारण कहानियां; स्मित मच्छार की कहानी ने क्यों याद दिलाई नीरजा भनोट की?

कैप्टन स्मित मच्छार की कहानी सामने आने के बाद 1986 के Pan Am Flight 73 हादसे में यात्रियों की जान बचाने वाली नीरजा भनोट की याद ताजा हो गई. आइए जानते हैं, कैसे दो अलग संकट के बीच अपने साहस के दम पर कैसे दो कहानियों ने एक इमोशनल कनेक्शन दे दिया.

Written BySwati Singh
Published: Oct 01, 2026, 07:17 PM IST|Updated: Oct 01, 2026, 07:23 PM IST
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एक एयर होस्टेस, एक कैप्टन और दो असाधारण कहानियां; स्मित मच्छार की कहानी ने क्यों याद दिलाई नीरजा भनोट की?
Image Credit: फिर स्मित मच्छार की कहानी में नीरजा क्यों याद आईं?

About the Author

Swati Singh

Swati Singh

स्वाति सिंह एक वरिष्ठ डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें न्यूज़ मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वह Zee News Hindi की डिजिटल टीम के एंटरटेनमेंट (मनोरंजन) सेक्शन में काम कर रही हैं. स्वाति की एक्सपर्टीज बॉलीवुड न्यूज़, सिनेमा, एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के ट्रेंड्स और सेलेब्स की इन-डेप्थ रिपोर्टिंग में है.अपने करियर के दौरान स्वाति ने आयुष्मान खुराना, नीना गुप्ता, गजराज राव और ध्वनि भानुशाली जैसी कई जानी-मानी बॉलीवुड और म्यूजिक इंडस्ट्री की हस्तियों के एक्सक्लूसिव इंटरव्यू किए हैं. Zee News से पहले उन्होंने अमर उजाला, लाइव हिंदुस्तान और लोकमत जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं, जहां काम के लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया है.माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU) से मास कम्युनिकेशन और सुरेश ज्ञान विहार यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (MBA) की डिग्री हासिल करने वाली स्वाति, मनोरंजन जगत की खबरों को पाठकों तक रोचक और सटीक ढंग से पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं.आप स्वाति सिंह से swati.kumari@india.com पर सीधे ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और लिंक्डइन पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.
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ऐसा कई बार होता है कि जब हम कोई नई कहानी पढ़ते हैं तो हमे किसी पुरानी किसी कहानी की याद आ जाती है. फिर भले ही चाहे वक्त बदल गया हो, किरदार अलग हो और कहानी बिलकुल नई हो. लेकिन फिर भी कोई एक कड़ी ऐसी होती है, जो दोनों कहानियों को जोड़ती है.

ऐसा ही कुछ है कैप्टन स्मित मच्छार की कहानी के साथ. आज भले ही सबकी जुबान पर उनकी बहादुरी की कहानी है. लेकिन फिर भी उनकी यह कहानी जब सामने आई तो नीरजा भनोट की याद आ गई. ये वही एयर होस्टेस है, जिनका नाम भारतीय इतिहास में साहस और कर्तव्य की मिसाल के तौर पर दर्ज है. लेकिन दोनों के बीच के कनेक्शन को समझने के लिए पहले दोनों की कहानी को समझना पड़ेगा. आखिर क्यों जब दोनों परिस्थितियां अलग थीं. अलग समय पर हुई और दोनों की भूमिकाएं भी अलग थीं. फिर भी स्मित मच्छार की कहानी सुनते हुए नीरजा भनोट का नाम याद दिलाता है?

दरअसल, 30 सितंबर को दुबई से तेल-अवीव जा रहे 'फ्लाई दुबई' के विमान में उस समय हड़कंप मच गया, जब बुधवार को कॉकपिट में कैप्टन और को-पायलट के बीच हिंसक झड़प हो गई. आरोप है कि को-पायलट ने कैप्टन पर चाकू से हमला किया, जिससे वह खून से लथपथ हो गए. घटना के बाद विमान को सऊदी अरब के तबूक की तरफ मोड़ दिया गया, जहां उसकी इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई. विमान में 174 यात्री और क्रू मेंबर सवार थे. बाद में यात्रियों की मदद से बड़ा विमान हादसा टाल दिया गया. घटना के बाद विमान का रुख बदला गया और उसे सऊदी अरब के तबुक में सुरक्षित उतारा गया. स्मित को अस्पताल ले जाया गया और उनकी स्थिति स्थिर बताई गई.

अब आते हैं  5 सितंबर 1986 के उस दिन पर....

5 सितंबर 1986 को पैन एम की फ्लाइट 73 कराची एयरपोर्ट पर आतंकवादियों ने हाईजैक किया था. तब फ्लाइट में लगभग सैकड़ों यात्री सवार थे. हाइजैक के बाद उनकी स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही थी. तब फ्लाइट में एक फ्लाइट पर्सर नीरजा भनोट ने अपने साहस से एक उदाहरण पेश कर दिया.

जैसे ही आतंकियों ने फ्लाइट को अपने कब्जे में लिया. तब क्रू के निकल जाने के बाद यात्रियों की जिम्मेदारी नीरजा और उनके साथियों पर आ गई थी. फिर आतंकवादियों की मांग के अनुसार नीरजा ने यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा किया. लेकिन एक अमेरिकी नागरिकों की पहचान छिपाने के लिए कई पासपोर्ट को अलग कर दिया. इतना ही नहीं, जैसे ही हालात बिगड़े और फ्लाइट के अंदर गोलीबारी शुरू हुई. नीरजा ने तुरंत साहस दिखाते हुए यात्रियों को आपातकालीन निकास की ओर जाने में मदद की.

सभी पैसेंजर आसानी से निकल गए. लेकिन आखिर में तीन बच्चों को बचाने की कोशिश में वह खुद आतंकवादियों की गोली का शिकार हो गई. जिसकी वजह से उनकी मौत हो गई. बाद में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया. इतना ही नहीं, उस घटना के दौरान साहस दिखाने वाली नीरजा को पाकिस्तान ने भी सम्मानित किया. उन्हें मरणोपरांत 'तमगा-ए-इंसानियत' से नवाजा.

आज जब समय बदल गया है, जमाना बदल गया है. लेकिन फिर भी भारतियों का जज्बा आज भी बरकरार है. परिस्थिति चाहे कैसी भी क्यों ना हो, भारतीय कुछ भी कर गुजरने का जज्बा रखते हैं. नीरजा भनोट वाले हादसे के लगभग चार दशक बाद एक ऐसी ही घटना सामने आई, जिसमें एक भारतीय पायलट ने साहस दिखाते हुए अपनी जान की बाजी लगाकर 174 लोगों की जिंदगियां बचाई.

स्मित मच्छार और नीरजा भनोट में कनेक्शन

5 सितंबर 1986 के बाद 30 सितंबर 2026 का भी दिन भारत के सीने पर  खुरच कर लिख दिया गया है. जब फ्लाईदुबई की दुबई-तेल अवीव उड़ान के दौरान कॉकपिट में एक गंभीर हिंसक वारदात हुई और भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार पर उनके साथी पायलट ने कथित तौर पर चाकू से हमला कर दिया. घायल होने के बाद भी स्मित ने फ्लाइट में सवार यात्रियों की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी उठाई.

नीरजा और स्मित, दोनों की घटनाओं में लगभग 40 साल का अंतर है. तब की परिस्थितियां और आज की परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं. तब नीरजा के सामने हथियारबंद आतंकी थे. वहीं, आज स्मित का दुश्मन उनका साथी पायलट ही था. फिर भी दोनों घटनाओं में एक बात जो समान है. वो है, 'संकट की घड़ी में दूसरों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना और अपना कर्तव्य निभाना.'

एक तरफ जहां नीरजा की कहानी बलिदान की कहानी बन गई. वो यात्रियों को बचाते हुए खुद अपनी जिंदगी हार गईं. वहीं, स्मित की कहानी में भी खतरा उतना ही था, लेकिन वह विमान को सुरक्षित उतारने और यात्रियों की जान बचाने के बाद इलाज के लिए अस्पताल पहुंच सके. अगर इन दोनों घटनाओं पर गौर करेंगे तो, दिखेगा कि इनमें बहादुरी किसी युद्धक्षेत्र में नहीं दिखाई गई. एक फ्लाइट के अंदर, जहां सीमित जगह है. वहां दो बहादुरों के साहस ने इन भारतीयों को यादगार बना दिया.

(आईएएनएस इनपुट के साथ)

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